Karauli Leather Shoes:ब्रांडेड जूतों के दौर में कायम है इस देसी जूती का जलवा, हाट में लगती है खरीदारों की भीड़

Karauli Leather Shoes:ब्रांडेड जूतों के दौर में कायम है इस देसी जूती का जलवा, हाट में लगती है खरीदारों की भीड़


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Karauli Leather Shoes: करौली के सोमवार हाट बाजार में आज भी पारंपरिक चमड़े की जूती अपनी खास पहचान बनाए हुए है. हाथों से तैयार होने वाली यह देसी जूती 200 से 1000 रुपए तक की कीमत में मिलती है और मजबूत चमड़े के कारण लंबे समय तक चलने का दावा किया जाता है. आधुनिक ब्रांडेड जूतों के दौर में भी किसान और ग्रामीण इस पारंपरिक जूती को पसंद कर रहे हैं.

आधुनिक दौर में जूतों के बाजार में भले ही डिजाइन और ब्रांड की भरमार हो गई हो, लेकिन करौली में आज भी एक ऐसी जूती लोगों के बीच अपनी पहचान बनाए हुए है, जिसका रिश्ता पुराने दौर और पारंपरिक कारीगरी से जुड़ा बताया जाता है. शुद्ध चमड़े से हाथों से तैयार होने वाली यह जूती करौली की पारंपरिक हस्तशिल्प कला का अनूठा उदाहरण है.

इस जूती की बिक्री आम दुकानों पर नहीं, बल्कि करौली के पारंपरिक हाट बाजार में होती है, जो हर सोमवार को लगता है.इस वजह से इस जूती को खरीदने के लिए लोगों को सप्ताह में एक ही दिन का इंतजार करना पड़ता है. महीने में चार सोमवार आने के कारण इसके शौकीनों को इसे खरीदने के लिए महीने में केवल चार मौके मिलते हैं. यही वजह है कि करौली के हाट बाजार में आज भी इस पारंपरिक जूती की अलग पहचान बनी हुई है.

करौली में चमड़े की इस जूती का चलन पुराने समय से रहा है. पहले के दौर में बुजुर्ग और किसान वर्ग के लोग इसे काफी पसंद करते थे. समय के साथ पहनावे में बदलाव आया और बाजार में आधुनिक जूतों की कई किस्में आ गईं, लेकिन पारंपरिक चमड़े की इस जूती की मांग अब भी बनी हुई है.

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कारीगर गोविंद कुमार बताते हैं कि इस जूती को तैयार करने में मशीनों की बजाय पारंपरिक तरीके से हाथों की मेहनत अधिक होती है. सबसे पहले अच्छी गुणवत्ता का पक्का चमड़ा लिया जाता है.इसके बाद उसे तैयार कर आवश्यक आकार दिया जाता है और हाथों से जोड़कर जूती तैयार की जाती है. मजबूत चमड़े की वजह से यह जूती लंबे समय तक चलती है. नियमित इस्तेमाल के बावजूद करीब दो साल तक इसके चलने का दावा किया जाता है.

करौली के सोमवार हाट बाजार में इस पारंपरिक चमड़े की जूती अलग-अलग डिजाइन और गुणवत्ता के अनुसार करीब 200 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक की कीमत में उपलब्ध होती है.स्थानीय लोगों के साथ आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले लोग भी हाट बाजार में इसे खरीदते हैं.

चमड़े की यह जूती पैरों में आरामदायक महसूस होती है और ग्रामीण इलाकों में लंबे समय तक चलने के लिए उपयोगी मानी जाती है.इसे पहनने वाले किसान बताते हैं कि उनके परिवार में भी बुजुर्ग लंबे समय तक इसी तरह की जूती पहनते रहे हैं. यही वजह है कि नई पीढ़ी के फैशन के दौर में भी पारंपरिक जूती से लोगों का जुड़ाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.

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