Ajit Doval and S Jaishankar: हर क्राइसिस में हिमालय की तरह नजर आते हैं भारत सरकार के राम-लक्ष्मण, कहां से की पढ़ाई, क्या ली डिग्री?

Ajit Doval and S Jaishankar: हर क्राइसिस में हिमालय की तरह नजर आते हैं भारत सरकार के राम-लक्ष्मण, कहां से की पढ़ाई, क्या ली डिग्री?


नई दिल्ली (Ajit Doval and S Jaishankar). जब भी देश के सामने कोई बड़ी कूटनीतिक चुनौती या राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर संकट खड़ा होता है तो देशवासियों की नजरें 2 ऐसे दिग्गजों पर टिक जाती हैं जिन्हें भारत का ‘राम-लक्ष्मण’ कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी. यह जोड़ी अजीत डोभाल और एस जयशंकर की है. BRICS समिट से ठीक पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के चीन दौरे का मकसद साफ था- सम्मेलन के सुचारू आयोजन से पहले भारत-चीन के बीच जमी बर्फ पिघलाकर रिश्ते ठीक करना.

कूटनीति की इस बिसात पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इन दोनों सबसे भरोसेमंद सिपाहियों ने हमेशा साबित किया है कि देशहित सर्वोपरि है. इन दोनों शख्सियतों का तालमेल किसी अचूक स्ट्रैटेजी की तरह काम करता है. जहां अजीत डोभाल अपनी खुफिया रणनीतियों और दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए जाने जाते हैं, वहीं एस जयशंकर अपनी बेबाक कूटनीति और वैश्विक मंचों पर भारत का पक्ष मजबूती से रखने के लिए दुनियाभर में मशहूर हैं. जानिए देश के इन 2 महान रणनीतिकारों की पढ़ाई-लिखाई का स्टेटस.

नेशनल क्राइसिस में संकटमोचक जैसी ढाल बन जाते हैं अजीत डोभाल और एस जयशंकर

जब भी भारत सरकार के सामने कोई भी ‘क्राइसिस’ या संकट आता है तो एनएसए प्रमुख अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर हिमालय की तरह अडिग नजर आते हैं.

‘भारत के जेम्स बॉन्ड’ अजीत डोभाल

अजीत डोभाल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) के तौर पर भारत की सुरक्षा रीढ़ बने हुए हैं. उनकी शुरुआती शिक्षा अजमेर मिलिट्री स्कूल (राजस्थान) से हुई. इसे पहले किंग जॉर्ज रॉयल इंडियन मिलिट्री स्कूल कहा जाता था. फिर 1967 में उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय (अब डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय) से इकोनॉमिक्स में MA की डिग्री हासिल की. वह अपनी क्सास के टॉपर थे. पढ़ाई पूरी करने के बाद 1968 में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा पास कर केरल कैडर के आईपीएस अधिकारी बने.

रॉ में मिली बेहद खतरनाक प्रोजेक्ट्स की जिम्मेदारी

साल 1972 में अजीत डोभाल देश की खुफिया एजेंसी रॉ (RAW) और इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) से जुड़ गए. अपने करियर के दौरान उन्होंने कई सालों तक अंडरकवर (गुप्तचर) रूप में भी बेहद खतरनाक काम किए. इसके चलते उन्हें ‘भारत का जेम्स बॉन्ड’ भी कहा जाता है. वे 2004 से 2005 तक इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के निदेशक रहे. इसके बाद मई 2014 से देश के पांचवें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) के रूप में देश की सुरक्षा की कमान संभाल रहे हैं.

कूटनीति के माहिर खिलाड़ी डॉ. एस जयशंकर

भारत के विदेश मंत्री डॉ. सुब्रह्मण्यम जयशंकर का शैक्षणिक और राजनयिक करियर बेहद शानदार रहा है. उनकी शुरुआती स्कूली शिक्षा नई दिल्ली के एयर फोर्स स्कूल (सुब्रतो पार्क) से हुई. इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध सेंट स्टीफंस कॉलेज से केमिस्ट्री में बीएससी की डिग्री ली. उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), नई दिल्ली का रुख किया. वहां से राजनीति विज्ञान में एमए, एमफिल और अंतर्राष्ट्रीय संबंध (International Relations) में पीएचडी की उपाधि हासिल की.

आईएफएस अफसर से बने विदेश मंत्री

डॉ. जयशंकर ने 1977 में भारतीय विदेश सेवा (IFS) में कदम रखा. उन्होंने 4 दशकों से अधिक समय तक कुशल राजनयिक के रूप में देश की सेवा की. वे सिंगापुर में भारत के उच्चायुक्त (2007-2009) रहे. चेक गणराज्य, चीन (2009-2013) और USA (2013-2015) में भारत के राजदूत के रूप में देश का प्रतिनिधित्व किया. जनवरी 2015 से जनवरी 2018 तक उन्होंने देश के विदेश सचिव की जिम्मेदारी संभाली. मई 2019 में उन्हें भारत का विदेश मंत्री नियुक्त किया गया. वर्तमान में वह गुजरात से राज्यसभा के सांसद हैं.

एक साथ घूमता है कूटनीति और सुरक्षा का पहिया

अजीत डोभाल और जयशंकर की जोड़ी ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की साख को नए मुकाम पर पहुंचाया है. हाल ही में ब्रिक्स समिट से पहले एनएसए अजीत डोभाल की चीन यात्रा इसी रणनीति का हिस्सा थी, जिससे क्षेत्रीय तनाव को कम किया जा सके और भारत अपने राष्ट्रीय हितों को साधते हुए ग्लोबल बैठकों को सफल बना सके. कूटनीतिक मोर्चे पर डॉ. जयशंकर दुनिया को भारत की मजबूत विदेश नीति से रूबरू कराते हैं तो सुरक्षा के मोर्चे पर अजीत डोभाल हर नापाक साजिश का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार रहते हैं.

किसी के आगे झुकते नहीं दोनों

अजीत डोभाल और एस जयशंकर की सबसे बड़ी खूबी है कि वे किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकते. चाहे सरहद पार आतंकवाद से निपटना हो या पश्चिमी देशों की आंखों में आंखें डालकर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर टिके रहना हो.. इन दोनों ने हमेशा साबित किया है कि मजबूत लीडरशिप देश को किस बुलंदी पर ले जा सकती है. यही वजह है कि संकट के हर दौर में देश की जनता और सरकार इन दोनों चेहरों पर आंख मूंदकर भरोसा करती है.



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