नहीं चाहिए SC का टैग, तमिलनाडु का DKV समुदाय क्यों छोड़ना चाहता है कोटा?

नहीं चाहिए SC का टैग, तमिलनाडु का DKV समुदाय क्यों छोड़ना चाहता है कोटा?


होमताजा खबरदेश

नहीं चाहिए SC का टैग, तमिलनाडु का DKV समुदाय क्यों छोड़ना चाहता है कोटा?

Last Updated:

तमिलनाडु का देवेंद्रकुल वेल्लालर यानी DKV समुदाय आरक्षण की बहस में अलग वजह से चर्चा में है. समुदाय के एक हिस्से के नेता SC सूची से बाहर निकलने की मांग कर रहे हैं. पुथिया तमिलगम के नेता के कृष्णासामी का कहना है कि पहले SC से OBC और फिर सामान्य श्रेणी की ओर जाने का लक्ष्य है. उनका तर्क है कि SC पहचान का सामाजिक कलंक समुदाय के विकास में बाधा बन रहा है. वहीं अनंथन अय्यासामी इसे आर्थिक संपन्नता नहीं बल्कि आत्मसम्मान का सवाल बताते हैं. DKV समुदाय की मांग 1996 से उठती रही है. 2021 में सात उपजातियों को देवेंद्रकुल वेल्लालर नाम के तहत एकीकृत किया गया था. अब पहचान और आरक्षण को लेकर यह मांग फिर चर्चा में है.

ख़बरें फटाफट

Zoom

तमिलनाडु के देवेंद्रकुल वेल्लालर यानी DKV समुदाय के एक हिस्से की SC सूची से बाहर निकलने की मांग क्यों है? (फाइल फोटो)

भारत में आमतौर पर आरक्षण की चर्चा होते ही तस्वीर उलटी नजर आती है. अलग-अलग समुदाय खुद को आरक्षित श्रेणी में शामिल कराने की मांग करते हैं. मकसद होता है शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मिलने वाले अवसरों का फायदा उठाना. लेकिन तमिलनाडु का देवेंद्रकुल वेल्लालर यानी DKV समुदाय इसी बहस में एक अलग वजह से चर्चा में है. समुदाय के एक हिस्से की मांग है कि उसे अनुसूचित जाति यानी SC की सूची से बाहर किया जाए. सवाल सीधा है. जब आरक्षण सामाजिक और आर्थिक मुश्किलों से निकलने का एक जरिया माना जाता है तो कोई समुदाय इससे बाहर क्यों जाना चाहेगा? DKV नेताओं के मुताबिक इसकी वजह सिर्फ आर्थिक स्थिति नहीं है. उनके लिए यह पहचान और आत्मसम्मान का सवाल है. इसी मांग ने आरक्षण की पूरी बहस में एक अलग पहलू जोड़ दिया है.

इंडियन टुडे की रिपोर्ट के अनुसार DKV समुदाय अभी अनुसूचित जाति की सूची में शामिल है. समुदाय के नेताओं का कहना है कि वे लंबे समय से SC पहचान से बाहर निकलने की मांग कर रहे हैं. पुथिया तमिलगम के संस्थापक के कृष्णासामी के मुताबिक उनकी मांग पहले SC से OBC श्रेणी में जाने की है. इसके बाद उनका लक्ष्य सामान्य श्रेणी में जाना है. उनका तर्क है कि दशकों तक SC आरक्षण मिलने के बावजूद समुदाय के सामने सामाजिक पहचान और भेदभाव की समस्या बनी हुई है. वहीं तेनकासी में बीजेपी के जिला अध्यक्ष अनंथन अय्यासामी ने SC/ST कानून के इस्तेमाल को लेकर भी अपनी अलग राय रखी है. उन्होंने कहा कि DKV समुदाय ने इस कानून के तहत मामले दर्ज नहीं करने का सिद्धांत अपनाया है. हालांकि यह पूरे समुदाय की सर्वसम्मत राय है या इसके भीतर अलग-अलग मत हैं इसे समझना भी जरूरी है.

DKV समुदाय कौन है और इसकी पहचान का सवाल क्या है?

  • देवेंद्रकुल वेल्लालर तमिलनाडु का प्रमुख समुदाय है. इसकी बड़ी आबादी राज्य के दक्षिणी और मध्य हिस्सों में रहती है. रामनाथपुरम, तूतीकोरिन, तिरुनेलवेली और विरुधुनगर इसके प्रमुख क्षेत्र हैं. इसके अलावा तिरुचिरापल्ली, डिंडीगुल, तिरुवरुर, तंजावुर, थेनी, मदुरै, शिवगंगा और करूर में भी इसकी आबादी है. समुदाय की बड़ी आबादी कृषि से जुड़ी है. देवेंद्रकुलम नाम समुदाय की वंश और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है जबकि वेल्लालर शब्द का संबंध खेती से बताया जाता है.
  • इतिहासकार केए मणिकुमार के अनुसार समुदाय ने लंबे समय तक सामाजिक और आर्थिक मुश्किलों का सामना किया है. उनके शोध में कृषि व्यवस्था और जातिगत भेदभाव के कारण समुदाय के लोगों के पिछड़ने का उल्लेख मिलता है. 1968 के कीझवेनमणि नरसंहार सहित तमिलनाडु के कई जातीय संघर्षों ने भी समुदाय की राजनीति और सामाजिक चेतना को प्रभावित किया.

सात उपजातियों को मिलाकर बना देवेंद्रकुल वेल्लालर नाम

DKV की पहचान को लेकर एक बड़ा बदलाव 2021 में हुआ. संसद ने सात उपजातियों को देवेंद्रकुल वेल्लालर नाम के तहत एकीकृत करने से जुड़ा विधेयक पारित किया. इसमें पल्लर समेत कई समुदाय शामिल थे. समुदाय के नेताओं की लंबे समय से मांग थी कि उन्हें पल्लर जैसे पुराने नाम से अलग एक साझा सांस्कृतिक पहचान मिले. 2015 में तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी समुदाय की इस पहल की सराहना की थी. उस समय उनके हवाले से कहा गया था कि आमतौर पर जातियां सामाजिक और सरकारी लाभ हासिल करने के लिए खुद को निचली सामाजिक श्रेणी में शामिल कराने की कोशिश करती हैं लेकिन यहां एक समुदाय सामाजिक पहचान के लिहाज से ऊपर उठने की कोशिश कर रहा है.

SC से बाहर निकलने की मांग आखिर क्यों?

  • पुथिया तमिलगम के संस्थापक के कृष्णासामी इस मांग को लंबे समय से उठा रहे हैं. उनके मुताबिक समुदाय ने 1996 से सरकारों के सामने SC से OBC श्रेणी में जाने की मांग रखी है. कृष्णासामी ने कहा, ‘हमारे नेताओं ने आजादी के तुरंत बाद समुदाय को एससी सूची में शामिल किए जाने का विरोध नहीं किया. 1996 से हम राज्य और केंद्र सरकारों से हमें एससी से ओबीसी श्रेणी में ले जाने की मांग कर रहे हैं.’
  • उन्होंने आगे कहा, ‘यह ऊपर की ओर सामाजिक गतिशीलता होगी और देवेंद्रकुल वेल्लालरों को समायोजित करने के लिए एससी और ओबीसी के बीच एक नई श्रेणी बनाई जा सकती है.; कृष्णासामी के मुताबिक अंतिम लक्ष्य सामान्य श्रेणी में जाना है. उनका कहना है कि समुदाय को सीधे SC से सामान्य श्रेणी में ले जाना व्यावहारिक नहीं होगा. पहले 10 से 15 साल OBC श्रेणी में रहने के बाद समुदाय सामान्य श्रेणी की ओर बढ़ सकता है.

नेताओं का तर्क- आरक्षण से ज्यादा आत्मसम्मान की चिंता

  • अनंथन अय्यासामी इस मांग को आर्थिक संपन्नता से जोड़ने से इनकार करते हैं. उन्होंने कहा, ‘अधिकांश समुदाय अभी भी गरीबी में रहता है. एससी सूची छोड़ने की मांग समृद्धि के बारे में नहीं है. यह आत्मसम्मान के बारे में है. यही कारण है कि समुदाय एससी/एसटी अधिनियम पर निर्भर नहीं रहना चाहता.’
  • अय्यासामी ने यह भी कहा, ‘कृपया हमें दलित कहकर संबोधित न करें.’ उनका कहना है कि DKV समुदाय अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान को महत्व देता है. उनके अनुसार समुदाय कृषि प्रधान है लेकिन आर्थिक श्रृंखला में किसानों को अक्सर उतना फायदा नहीं मिलता जितना व्यापारियों और बिचौलियों को मिलता है. शिक्षा में सुधार हुआ है लेकिन जाति का असर कारोबार तक दिखाई देता है.

SC/ST एक्ट को लेकर भी DKV नेताओं की अलग राय

DKV की यह मांग सिर्फ आरक्षण तक सीमित नहीं है. अय्यासामी ने SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम के इस्तेमाल को लेकर भी अपनी स्थिति रखी है. उन्होंने कहा, ‘हमने देखा है कि इस अधिनियम के तहत मामलों को कैसे हथियार बनाया जाता है और यह जमीन पर दुश्मनी को कैसे बढ़ाता है.’ उनके मुताबिक DKV समुदाय ने किसी के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज नहीं करने का एक स्वैच्छिक और सैद्धांतिक रुख अपनाया है. यहां यह फर्क समझना जरूरी है कि यह अय्यासामी और समुदाय के कुछ नेताओं द्वारा व्यक्त किया गया रुख है. इसे पूरे DKV समुदाय की सर्वसम्मत स्थिति मानना जरूरी नहीं है. SC/ST अधिनियम अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को जातिगत अत्याचार से कानूनी सुरक्षा देने वाला कानून है.

क्या DKV कोटा छोड़कर सामान्य वर्ग में जाना चाहता है?

  • के कृष्णासामी के बयानों के मुताबिक हां. उनकी मांग का रास्ता पहले SC से OBC और फिर सामान्य श्रेणी की ओर जाने का है. उनका तर्क है कि SC की पहचान के साथ जुड़ा सामाजिक कलंक समुदाय के आर्थिक और कारोबारी विकास में बाधा बन रहा है. उन्होंने कहा, ‘हमारे लोग आरक्षण के कारण कुछ सरकारी नौकरियां हासिल कर सकते हैं लेकिन एससी का कलंक हमारे समग्र विकास में बाधा है. लोग इसके कारण कारोबार नहीं कर सकते.’
  • यही वह तर्क है जो DKV की मांग को मौजूदा आरक्षण बहस से अलग बनाता है. हालांकि समुदाय के भीतर इस मांग की सीमा और समर्थन को लेकर अलग-अलग राय हो सकती है. इसलिए इसे पूरे समुदाय की एकमत मांग के तौर पर पेश करने के बजाय इसके प्रमुख नेताओं की मांग के रूप में देखना ज्यादा सटीक होगा.

DKV की मांग के पीछे राजनीति भी एक बड़ा पहलू

  • तमिलनाडु में जाति और राजनीति का रिश्ता काफी गहरा रहा है. DKV समुदाय से जुड़े नेताओं ने भी समय-समय पर अलग राजनीतिक मंच बनाए हैं. अय्यासामी के मुताबिक 1957 के मुदुकुलाथुर दंगों से लेकर 1995 के कोडियानकुलम और 1999 के थामिराबरानी-मंजोलाई तथा 2011 के परमकुडी पुलिस कार्रवाई तक की घटनाओं ने समुदाय की राजनीतिक सोच को प्रभावित किया.
  • उन्होंने कहा, ‘इन घटनाओं ने समुदाय को यह विश्वास दिलाया कि न तो कांग्रेस और न ही द्रविड़ पार्टियां उसकी रक्षा करेंगी. इससे समुदाय आधारित पार्टियों का उदय हुआ.’ अय्यासामी ने 2021 में DKV नाम बदलने के लिए बीजेपी के प्रति समुदाय की ओर आभार भी जताया है. ऐसे में SC सूची से बाहर निकलने की मांग सिर्फ आरक्षण की गणित नहीं है. इसमें पहचान और सामाजिक सम्मान के साथ तमिलनाडु की जातीय राजनीति का पहलू भी जुड़ा हुआ है.



Source link