ज्ञानेश कुमार ECs को हटाने की सिफारिश करेंगे? जानें मनमोहन सरकार का चावला केस?
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Gyanesh Kumar Can Recommend Removal Of Other Two ECs: निर्वाचन आयोग में अनबन की रिपोर्ट से हड़कंप मचा हुआ है. दो चुनाव आयुक्तों ने कई मसलों पर सवाल उठाए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक बीते 10 माह में उन्होंने आयोग के फैसले पर 14 बार लिखित असहमति जताई है. विपक्ष के साथ अब NDA के कुछ सहयोगी दलों ने आयोग से स्थिति साफ करने को कहा. इस बीच सवाल यह है कि यह अनबन आगे कहां तक जाएगी. क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अपने साथी चुनाव आयुक्तों को हटाने की सिफारिश कर सकते हैं क्या? ऐसी ही घटना 2009 में घटी थी, जब मुख्य चुनाव आयोग रहे गोपालस्वामी ने आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की थी.
2009 में चुनाव की घोषणा करते मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी और चुनाव आयुक्त नवीन चावला. फोटो- रायटर
Gyanesh Kumar Can Recommend Removal Of Other Two ECs: निर्वाचन आयोग में अनबन की रिपोर्ट से पूरे देश में हड़कंप मचा हुआ है. दो चुनाव आयुक्तों डॉ. सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई मसलों पर सवाल उठाए हैं. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि बीते 10 महीने में कम से कम 14 बार इन दोनों ने आयोग के फैसले को लेकर अपनी लिखित असहमति जताई. मामले के खुलासे के बाद विपक्ष चुनाव आयोग पर हमलावर है. इतना ही नहीं अब एनडीए के कुछ सहयोगी दलों ने भी कहा है कि आयोग को पूरी स्थिति साफ करनी चाहिए. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आयोग के भीतर पैदा इस अनबन का नतीजा क्या होगा? दरअसल, संविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य आयुक्तों को बराबर का दर्जा दिया गया है. लेकिन, इनमें से सबसे पहले नंबर पर मुख्य चुनाव आयुक्त आते हैं.
इस व्यवस्था के लिए अंग्रेजी में फर्स्ट एमॉन्ग्स इक्वल्स (First among equals) शब्द है. इसके साथ ही मुख्य चुनाव आयुक्त के पास आयोग के प्रशासनिक मामलों में कई विशेष अधिकार प्राप्त हैं. लेकिन, संविधान में ही सीईसी के पास एक और अधिकार है. वह अपने साथी आयुक्तों के कामकाज से संतुष्ट न होने पर उनको हटाने की सिफारश राष्ट्रपति से कर सकता है. यह अधिकार साथी आयुक्तों के पास नहीं है. लेकिन, यहां एक और झोल है. दोनों साथी चुनाव आयुक्त, अगर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कोई प्रस्ताव भेज दें तो क्या होगा? इसको लेकर संवैधानिक स्थिति स्पष्ट नहीं है.
लेकिन, चुनाव आयुक्तों को हटाने का प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास पहुंचने के बावजूद उन्हें किसी कार्यकारी आदेश यानी सरकार के आदेश से नहीं हटाया जा सकता. इसके लिए भी सरकार को संसद के जरिए महाभियोग का रास्ता अपनाना पड़ेगा. ऐसी ही घटना 2009 में घट चुकी है. जब केंद्र में सरकार मनमोहन सिंह की थी. वह मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी थे और नवीन चावला आयुक्त थे. नवीन चावला पर आयोग की मीटिंग की बातें कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाने के आरोप लगे थे. इसके बाद गोपालस्वामी में नवीन चावला को हटाने के लिए राष्ट्रपति से सिफारिश कर दी.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार. फोटो- चुनाव आयोग वेबसाइट
आगे क्या हुआ
जनवरी 2009 में सीईसी गोपालस्वामी ने नवीन चावला को हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के पास भेजा. इससे देश में एक सियासी भूचाल आ गया था. राष्ट्रपति ने इस सिफारिश को कानूनी राय के लिए मनमोहन सरकार के पास भेज दिया. इस पर केंद्रीय कानून मंत्रालय ने सलाह दी कि मुख्य चुनाव आयुक्त के पास यह अधिकार केवल तब होता है जब मामला बेहद गंभीर हो. वह इसका इस्तेमाल साथी चुनाव आयुक्तों के खिलाफ एक हथियार के तौर पर नहीं कर सकते हैं. इसके बाद सीईसी की सिफारिश खारिज हो गई. इसके बाद 20 अप्रैल 2009 को गोपालस्वामी अपने पद से रिटायर हो गए. वरिष्ठता के आधार पर नवीन चावला अगले मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने और उनके ही नेतृत्व में 2009 के लोकसभा चुनाव संपन्न हुए. उस चुनाव यूपीए सरकार की शानदार जीत हुई और मनमोहन सिंह दोबारा प्रधानमंत्री बने. चावला जुलाई 2010 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे.
क्या किसी चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग चला है?
स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ है. किसी भी चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से नहीं हटाया गया है. हालांकि निजी कारणों से कई चुनाव आयुक्तों ने कार्यकाल से पहले अपना इस्तीफा दे दिया है. आज तक किसी चुनाव आयुक्त के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव भी नहीं लाया गया है. नवीन चावला के मामले में सीईसी ने संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत राष्ट्रपति के पास केवल सिफारिश भेजी थी जिसे राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया था.
सीईसी और सीई को कैसे हटाया जा सकता है
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को हटाने का केवल एक ही रास्ता है. वह है महाभियोग प्रस्ताव. यह प्रस्ताव सरकार या विपक्ष किसी भी पक्ष की ओर से संसद में पेश किया जा सकता है. लेकिन, इसको दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पास करवाना होता है. इसके बाद राष्ट्रपति की मुहर लगती है. ऐसा करना काफी मुश्किल काम है. आज तक देश के इतिहास में ऐसा नहीं हुआ है. हालांकि कई बार सरकार और चुनाव आयोग के बीच सीधी टकराव की खबरें आई हैं. विपक्ष ने भी कई बार आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाते रहा है लेकिन कभी नौबत महाभियोग तक नहीं पहुंची है.