ट्रेन से गिरकर हुई मौत, टिकट हो गया गुम, फिर भी रेलवे देगा मोटा मुआवजा, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया नियम

ट्रेन से गिरकर हुई मौत, टिकट हो गया गुम, फिर भी रेलवे देगा मोटा मुआवजा, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया नियम


सुप्रीम कोर्ट ने ट्रेन हादसे में जान गंवाने वाले एक शख्स के माता-पिता को बड़ी राहत दी है. कोर्ट ने कहा कि अगर हादसे में मारे गए यात्री के पास से ट्रेन का टिकट बरामद नहीं होने मात्र से मुआवजे का दावा खारिज नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने रेलवे दावा अधिकरण की ओर से दिए गए 8 लाख रुपये के मुआवजे को बहाल करते हुए रेलवे को यह रकम 30 दिन के भीतर मृतक के माता-पिता को देने का आदेश दिया है.

यह मामला गुजरात के महेशभाई नामक व्यक्ति का है. 27 सितंबर 2017 को वह अहमदाबाद के रास्ते सूरत जा रहे थे. सफर के दौरान ट्रेन में अचानक तेज झटका लगा और वह जनरल डिब्बे से नीचे गिर गए. हादसे में उन्हें गंभीर चोटें आईं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया. करीब एक महीने से ज्यादा समय तक इलाज चलने के बाद 31 अक्टूबर 2017 को उनकी मौत हो गई.

टिकट नहीं मिला तो रेलवे का मुआवजे से इनकार

महेशभाई के माता-पिता ने मुआवजे के लिए रेलवे दावा अधिकरण का रुख किया था. उनका कहना था कि उनका बेटा ट्रेन से सफर कर रहा था और उसके पास टिकट भी था. हालांकि, हादसे के बाद टिकट नहीं मिला.

रेलवे ने इसी आधार पर मुआवजे के दावे पर सवाल उठाया. लेकिन रेलवे दावा अधिकरण ने 17 जून 2022 को महेशभाई को हादसे का पीड़ित मानते हुए उनके माता-पिता को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया. इसके साथ ही घटना की तारीख से आदेश तक 9 प्रतिशत सालाना ब्याज देने का भी निर्देश दिया गया. बाद में गुजरात हाईकोर्ट ने अधिकरण के इस फैसले को खारिज कर दिया. हाईकोर्ट ने टिकट नहीं मिलने के तथ्य को महत्वपूर्ण माना था.

‘टिकट का मिलना जरूरी नहीं’

यह मामला फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एएस चंदुरकर की बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने टिकट नहीं मिलने को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया. कोर्ट ने यह भी कहा कि महेशभाई के पिता ने शपथ लेकर बयान दिया था कि उनके बेटे ने ट्रेन का टिकट खरीदा था. इसके अलावा महेशभाई हादसे के बाद एक महीने से ज्यादा समय तक अस्पताल में भर्ती रहे.

कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में यह मानना उचित है कि महेशभाई ट्रेन में वैध यात्री के तौर पर सफर कर रहे थे. केवल टिकट बरामद नहीं होने के आधार पर उनके परिवार को मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता.

टिकट के साथ कई चीज़ें भी गायब

महेशभाई के पिता ने बताया था कि हादसे के बाद उनके बेटे का टिकट, रूमाल, कलाई घड़ी, कंघी और करीब 800 से 900 रुपये नकद भी नहीं मिले थे. उन्होंने शपथ लेकर कहा था कि उनके बेटे ने यात्रा के लिए टिकट खरीदा था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मृतक के पिता ने शपथ लेकर यह बात कही थी, तो इसके बाद इस दावे को गलत साबित करने की जिम्मेदारी रेलवे की थी. लेकिन रेलवे ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो सके कि महेशभाई ट्रेन के वैध यात्री नहीं थे.

कोर्ट ने मामले की जांच में हुई देरी पर भी गौर किया. हादसा 27 सितंबर 2017 को हुआ था, जबकि जांच रिपोर्ट करीब सात महीने बाद 17 मई 2018 को तैयार हुई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच में हुई देरी के लिए मृतक के माता-पिता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. रेलवे अपनी जांच रिपोर्ट तैयार करने में हुई देरी का फायदा उठाकर परिवार को मुआवजे से वंचित नहीं कर सकता. कोर्ट ने यह भी कहा कि उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए रेलवे दावा अधिकरण का फैसला सही था.

30 दिन में देना होगा 8 लाख मुआवजा

सुप्रीम कोर्ट ने अब रेलवे दावा अधिकरण के 17 जून 2022 के आदेश को बहाल कर दिया. इसके तहत महेशभाई के माता-पिता को 8 लाख रुपये मुआवजा मिलेगा. कोर्ट ने रेलवे को यह रकम 30 दिनों के भीतर देने का निर्देश दिया है.

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ट्रेन हादसे में मुआवजे का दावा केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि मृतक यात्री के पास से टिकट बरामद नहीं हुआ. मामले के पूरे घटनाक्रम, गवाहों के बयान और उपलब्ध परिस्थितियों को भी देखा जाना जरूरी है.



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