अरबों हाइड्रोजन बम जैसी तबाही, एक पल में जल जाएंगे सारे सैटेलाइट, सूरज पर दिखा धरती से 40 गुना बड़ा दानव

अरबों हाइड्रोजन बम जैसी तबाही, एक पल में जल जाएंगे सारे सैटेलाइट, सूरज पर दिखा धरती से 40 गुना बड़ा दानव


हमारा सूरज जितना जीवनदायी है, यह उतने ही बड़े महाविनाश का कारण भी बन सकता है. जर्मनी के मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर सोलर सिस्टम रिसर्च के वैज्ञानिकों ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है. इस नई रिसर्च के अनुसार हमारा सूरज भी भयानक सुपरफ्लेयर्स पैदा करने की पूरी ताकत रखता है. यह ऐसा जानलेवा रेडिएशन ब्लास्ट होता है, जो अरबों हाइड्रोजन बमों के एक साथ फटने जितनी ऊर्जा फेंकता है. खगोलविदों ने साल 1947 के एक ऐतिहासिक सनस्पॉट का डेटा खंगाला, जिसका आकार हमारी पृथ्वी से लगभग 40 गुना बड़ा था. वैज्ञानिकों का मानना है कि इतना विशाल एक्टिव रीजन अंतरिक्ष में भयानक सुपरफ्लेयर पैदा कर सकता है.

अगर भविष्य में ऐसा कोई महाविस्फोट हुआ, तो दुनिया भर की मॉडर्न तकनीक और संचार व्यवस्था पल भर में ठप हो जाएगी. प्राचीन पेड़ों के छल्लों में भी ऐसे प्रलयकारी तूफानों के पुख्ता सबूत मिले हैं.

क्या सूरज से निकलने वाला सुपरफ्लेयर सच में अरबों परमाणु बम जितना ताकतवर है?

हमारे सौरमंडल में सूरज हर रोज सौर लपटें यानी सोलर फ्लेयर्स उगलता रहता है. कभी-कभी यह प्रक्रिया दिन में कई बार दोहराई जाती है. जब ये फ्लेयर्स अपने सबसे विकराल रूप में होते हैं, तब इनके अंदर से बेहिसाब रेडिएशन बाहर निकलता है. इस दौरान निकलने वाली ऊर्जा अरबों हाइड्रोजन बमों के बराबर हो सकती है.

  1. पृथ्वी का मजबूत मैग्नेटिक फील्ड हमें इन तूफानों से सुरक्षित बचा लेता है. हमारे ग्रह का घना एटमॉस्फेयर और लाखों मील की दूरी एक सुरक्षा कवच बनकर काम करती है.
  2. असली चिंता तब शुरू होती है, जब हम अंतरिक्ष में मौजूद दूसरे तारों पर नजर डालते हैं. ब्रह्मांड में सूरज जैसे कई तारों पर सुपरफ्लेयर्स दर्ज किए गए हैं. ये सुपरफ्लेयर्स हमारे सामान्य सौर तूफानों से सैकड़ों या हजारों गुना ज्यादा ताकतवर होते हैं.
  3. अब तक माना जाता था कि हमारा सूरज इतना शांत है कि यहां ऐसे महाविस्फोट मुमकिन नहीं हैं. मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट की नई रिसर्च ने इस पुराने भरोसे को पूरी तरह तोड़ दिया है.

वैज्ञानिकों ने 1947 के उस विशालकाय सनस्पॉट में ऐसा क्या देख लिया जो सब चौंक गए?

वैज्ञानिकों ने साल 2010 से 2016 के बीच दर्ज हुए 300 सबसे ताकतवर सोलर फ्लेयर्स का बारीकी से एनालिसिस किया. रिसर्च टीम ने देखा कि फ्लेयर से निकलने वाली ऊर्जा का सीधा संबंध उसके एक्टिव रीजन के आकार से होता है. एक्टिव रीजन सूरज की सतह पर वह जगह होती है, जहां भयानक मैग्नेटिक उथल-पुथल मचती है. इन्हीं जगहों पर काले रंग के विशाल सनस्पॉट या सौर धब्बे बनते हैं.

मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट की प्रमुख एस्ट्रोफिजिसिस्ट नताली क्रिवोवा ने इस बात की पुष्टि की है. उनके अनुसार एक्टिव रीजन जितना विशाल होगा, उससे निकलने वाला रेडिएशन उतना ही जानलेवा होगा. टीम ने पिछले चार सौ सालों के ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स को खंगालना शुरू किया. इस दौरान वैज्ञानिकों की नजर साल 1947 में दिखे एक दानवी सनस्पॉट पर पड़ी. यह सनस्पॉट इतना बड़ा था कि इसने सूरज की पूरी दिखाई देने वाली डिस्क का 0.6 प्रतिशत हिस्सा घेर लिया था.
सूरज जैसे तारे लगभग हर सौ साल में एक बार सुपरफ्लेयर पैदा करते हैं. (इमेज क्रेडिट : MPS / Alexey Chizhik)

धरती से 40 गुना चौड़ा सनस्पॉट कैसे बन सकता है सौरमंडल का सबसे बड़ा टाइम बम?

  • साल 1947 में रिकॉर्ड किया गया वह सनस्पॉट चौड़ाई में हमारी पृथ्वी से लगभग 40 गुना ज्यादा बड़ा था. वैज्ञानिकों के नए मैथमेटिकल मॉडल बताते हैं कि इतना विशाल क्षेत्र सुपरफ्लेयर पैदा करने की शुरुआती सीमा को छू लेता है. इसका मतलब यह निकलता है कि हमारा सूरज सुपरफ्लेयर दागने की पूरी काबिलियत रखता है.
  • रिसर्च के नतीजों पर नताली क्रिवोवा ने कहा, ‘हमारे सूरज में सुपरफ्लेयर पैदा करने का पूरा पोटेंशियल मौजूद है. यह इतने विशाल सनस्पॉट बना सकता है, जो रेडिएशन के सबसे भयानक धमाके की शुरुआत कर सकते हैं.’
  • जब मैग्नेटिक फील्ड की रेखाएं आपस में उलझकर टूटती हैं, तब वहां से भारी मात्रा में प्लाज्मा अंतरिक्ष में छूटता है. अगर 1947 जैसा सनस्पॉट आज सक्रिय होकर सुपरफ्लेयर छोड़ दे, तो अंतरिक्ष में ऐसा तूफान उठेगा जिसे मानव इतिहास ने कभी नहीं देखा.

क्या प्राचीन पेड़ों के छल्लों में छिपा है हजारों साल पुरानी प्रलयकारी घटना का राज?

वैज्ञानिकों के सामने यह सवाल भी था कि क्या पृथ्वी के इतिहास में पहले कभी ऐसे सुपरफ्लेयर्स टकराए हैं. वैज्ञानिकों के पास इस बात के बेहद मजबूत प्रमाण मौजूद हैं. इतिहास में दर्ज एक्सट्रीम सोलर पार्टिकल इवेंट्स यानी ईएसपीई के संकेत आज भी हमारी धरती पर सुरक्षित हैं. शोधकर्ताओं ने जंगलों में सदियों पुराने पेड़ों के छल्लों की जांच करके रेडियोधर्मी आइसोटोप्स का पता लगाया है.

पेड़ों की लकड़ी में कैद यह रेडिएशन साबित करता है कि धरती अतीत में भयानक रेडिएशन तूफानों से टकरा चुकी है. इंसान के पास जब टेलिस्कोप और सैटेलाइट नहीं थे, तब भी सूरज ने ऐसे महाप्रलयकारी तूफान उगले थे. फिलोसोफिकल ट्रांजेक्शन्स ऑफ द रॉयल सोसाइटी ए में पब्लिश यह स्टडी बताती है कि उन प्राचीन घटनाओं के पीछे सुपरफ्लेयर्स का ही हाथ था. इससे साफ हो जाता है कि हमारे सौरमंडल का यह शांत दिखने वाला तारा कभी भी करवट बदल सकता है.

अगर आज अंतरिक्ष से सुपरफ्लेयर टकराया तो हमारी सभ्यता का क्या हश्र होगा?

सुपरफ्लेयर से निकलने वाला सीधा रेडिएशन इंसानी शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता है. पृथ्वी की मैग्नेटिक ढाल और वायुमंडल इस घातक रेडिएशन को जमीन पर इंसानों तक पहुंचने से पहले ही रोक लेते हैं. असली खतरा उस पूरी टेक्नोलॉजी के लिए पैदा होता है, जिस पर आज की डिजिटल दुनिया निर्भर है.

अगर कोई सुपरफ्लेयर सीधे धरती की तरफ आया, तो अंतरिक्ष में तैर रहे हजारों सैटेलाइट्स एक झटके में बेकार हो जाएंगे. दुनिया भर का जीपीएस सिस्टम और एयर ट्रैफिक कंट्रोल पूरी तरह ठप पड़ सकता है. पावर ग्रिड्स में भारी करंट दौड़ने से ट्रांसफॉर्मर जल जाएंगे और महीनों तक बिजली गुल रह सकती है. इंटरनेट केबल नेटवर्क और डिजिटल बैंकिंग सिस्टम पूरी तरह क्रैश हो जाएंगे. वैज्ञानिक अब यह समझने में जुटे हैं कि सूरज के सनस्पॉट कब और किन परिस्थितियों में इतने हिंसक रूप में बदल जाते हैं.



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