IAS Story: ‘ड्रग्स नहीं, ड्रीम्स चुनो…’ 17,598 फीट ऊंचे एवरेस्ट बेस कैंप पर IAS सोनल गोयल ने फहराया तिरंगा, युवाओं को दिया संदेश

IAS Story: ‘ड्रग्स नहीं, ड्रीम्स चुनो…’ 17,598 फीट ऊंचे एवरेस्ट बेस कैंप पर IAS सोनल गोयल ने फहराया तिरंगा, युवाओं को दिया संदेश


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IAS Story: त्रिपुरा कैडर की वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सोनल गोयल ने 17,598 फीट की ऊंचाई पर एवरेस्ट बेस कैंप पहुंचकर तिरंगा फहराया है. इस ऐतिहासिक और कठिन उपलब्धि के साथ उन्होंने देश के युवाओं को ‘ड्रग्स नहीं, ड्रीम्स चुनो’ का कड़ा संदेश दिया है. 14 दिनों के इस दुर्गम 140 किलोमीटर लंबे ट्रेक के जरिए सोनल ने न सिर्फ फिटनेस की मिसाल पेश की, बल्कि साल 2023 में कैंसर से पिता के निधन के बाद कैंसर जागरूकता का भी बड़ा अभियान चलाया.

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आईएएस अधिकारी सोनल गोयल.

नई दिल्ली: मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है. इस कहावत को त्रिपुरा कैडर की वरिष्ठ महिला आईएएस (IAS) अधिकारी सोनल गोयल ने सच कर दिखाया है. दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट के बेस कैंप (17,598 फुट/5364 मीटर) पर पहुंचकर उन्होंने न केवल तिरंगा लहराया, बल्कि देश के युवाओं को एक बेहद खास और प्रेरणादायक संदेश भी दिया.

सोनल गोयल की यह यात्रा महज एक एडवेंचर नहीं थी, बल्कि एक बड़े सामाजिक मिशन का हिस्सा थी. एवरेस्ट बेस कैंप पर तिरंगे के साथ कैंसर जागरूकता का प्रतीक रिबन थामे सोनल ने युवाओं से अपील की- “ड्रग्स नहीं, ड्रीम्स चुनो.” उन्होंने कहा कि अगर युवा नशे से दूर रहकर अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाएं, तो वे न सिर्फ अपने सपने पूरे कर सकते हैं, बल्कि 2047 तक ‘नशामुक्त और विकसित भारत’ के लक्ष्य को भी आसानी से हासिल कर सकते हैं.

पिता के निधन ने बदल दिया जीवन का लक्ष्य
इस कठिन चढ़ाई के पीछे एक भावुक कहानी भी जुड़ी है. साल 2023 में आईएएस सोनल गोयल ने अपने पिता को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के कारण खो दिया था. उसी वक्त उन्होंने संकल्प लिया था कि वे समाज में कैंसर के प्रति जागरूकता फैलाएंगी. सोशल मीडिया पर करीब 30 लाख फॉलोअर्स रखने वाली सोनल ने बेस कैंप की कामयाबी को भी इसी मिशन के लिए समर्पित किया. उनका मानना है कि उनका यह प्रयास अगर एक भी परिवार को इस दर्द से बचा सका, तो यह उनके पिता को सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

14 दिन, 140 किलोमीटर और माइनस डिग्री तापमान
एवरेस्ट बेस कैंप तक का 140 किलोमीटर का सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था. 14 दिनों तक शून्य से नीचे तापमान, ऑक्सीजन की भारी कमी और खतरनाक चढ़ाइयों को पार करते हुए उन्होंने यह मुकाम हासिल किया. इस चुनौती के लिए उन्होंने पिछले दो सालों तक खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार किया. इस दौरान उन्होंने उत्तराखंड की रुपिन-सुपिन घाटी, हिमाचल का हातू पीक, तुंगनाथ ट्रेक, कैलाश मानसरोवर यात्रा, मसूरी मैराथन और लद्दाख हाफ मैराथन जैसे कई कठिन अभियान पूरे किए. पहाड़ की इन चढ़ाइयों ने उन्हें अनुशासन, धैर्य और मजबूत माइंडसेट सिखाया.



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