AI Impact on Software Engineers: एआई के दौर में कोडर्स का बुरा हाल, सिर्फ ‘एंटर’ बटन दबाने की मशीन बनकर रह गए इंजीनियर

AI Impact on Software Engineers: एआई के दौर में कोडर्स का बुरा हाल, सिर्फ ‘एंटर’ बटन दबाने की मशीन बनकर रह गए इंजीनियर


नई दिल्ली (AI Impact on Software Engineers). हर कोई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की चर्चा कर रहा है. सबको डर सता रहा है कि AI नौकरियां खा रहा है. जो नौकरी बचा पाने में सफल रहे हैं, उनकी प्रोफेशनल लाइफ किसी संघर्ष से कम नहीं है. टेक्नोलॉजी की दुनिया में इस बदलाव ने सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी पर गजब असर डाला है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर का दर्द छलका है. उसने सोचने पर मजबूर कर दिया है कि मशीनों के दौर में इंसानी दिमाग की वैल्यू बची भी है या नहीं.

इस सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने अपनी निराशा जाहिर करते हुए लिखा कि वह इस व्यवस्था से बेहद तंग आ चुका है. टेक सेक्टर का जो रोमांच कभी हुआ करता था, वह अब गायब हो चुका है. हाल यह है कि इंजीनियर्स कोड लिखने या समस्याओं को सुलझाने के बजाय सिर्फ ऑपरेटर बनकर रह गए हैं. वायरल पोस्ट से समझिए, नई कंपनी में शामिल होने वाले इस इंजीनियर की दास्तां क्या बयां करती है और कैसे एआई ने सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री का पूरा हुलिया बदलकर रख दिया है.

नई कंपनी में AI का जलवा: Claude टूल संभाल रहा सारा वर्कफ्लो

इस इंजीनियर ने हाल ही में किसी टेक कंपनी में जॉइन किया है. उसका अनुभव डराने वाला है. इंजीनियर का कहना है कि कंपनी ने अपना कामकाज AI टूल Claude के हवाले कर दिया है. सॉफ्टवेयर का कोड लिखने से लेकर टेस्टिंग, प्रोडक्ट रिक्वायरमेंट डॉक्यूमेंट्स तैयार करने, टिकट्स मैनेज करने और रिपोर्ट्स बनाने तक का काम एआई कर रहा है. इसमें इंसानी दखल की गुंजाइश लगभग खत्म हो चुकी है. कंपनी को लगता है कि AI से काम कराना तेज और आसान है. इसका असर वहां काम करने वालों की मेंटल हेल्थ पर पड़ रहा है.

12 से 13 घंटे सिर्फ अप्रूवल और ‘एंटर’ दबाने का खेल

इंजीनियर ने अपने पोस्ट में दर्द बयां करते हुए लिखा है कि उन पर और उनकी टीम पर लगातार तेजी से काम पूरा करने का भारी दबाव रहता है. दिनभर में 12 से 13 घंटे वे लोग सिर्फ एआई से जनरेट किए गए कंटेंट या कोड को अप्रूव करने में बिता देते हैं. वे खुद से नया कुछ भी क्रिएट नहीं कर रहे हैं. मैनेजमेंट को लगता है कि एआई आ जाने से काम मिनटों में होना चाहिए. लेकिन बिना सोचे-समझे बस मशीनों के भरोसे काम खींचने की इस अंधी दौड़ ने काम का मजा बिल्कुल खत्म कर दिया है.

जूनियर से सीनियर तक सबकी एक जैसी हालत

इस तकनीकी क्रांति का एक और चौंकाने वाला पहलू है कि इसने कंपनी में पदों का अंतर ही मिटा दिया है. इंजीनियर के अनुसार, अब कंपनी में चाहे जूनियर लेवल का डेवलपर हो या कोई अनुभवी सीनियर इंजीनियर, सबकी भूमिका एक जैसी हो गई है. अब कोई भी Bugs ठीक करने या किसी बड़ी तकनीकी समस्या का खुद समाधान खोजने के बारे में नहीं सोच रहा है. सब बस एआई टूल से बातचीत करते हैं और कंप्यूटर पर ‘एंटर’ दबाकर आगे बढ़ जाते हैं.

सॉफ्टवेयर इंजीनियर का कहना है कि इस काम में अब न तो क्रिएटिविटी बची है और न ही किसी बड़ी उपलब्धि को हासिल करने की वह खुशी, जो कोडिंग पूरी होने पर मिलती थी.



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