नई दिल्ली (AI Impact on Software Engineers). हर कोई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की चर्चा कर रहा है. सबको डर सता रहा है कि AI नौकरियां खा रहा है. जो नौकरी बचा पाने में सफल रहे हैं, उनकी प्रोफेशनल लाइफ किसी संघर्ष से कम नहीं है. टेक्नोलॉजी की दुनिया में इस बदलाव ने सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी पर गजब असर डाला है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर का दर्द छलका है. उसने सोचने पर मजबूर कर दिया है कि मशीनों के दौर में इंसानी दिमाग की वैल्यू बची भी है या नहीं.
नई कंपनी में AI का जलवा: Claude टूल संभाल रहा सारा वर्कफ्लो
I am done with this shit. It is over. The state of engineering right now is horrible. It has been half a month since I started a new role at a big company. Nobody knows anything here. The specs, code, tests, PRDs, tickets, resolution of those tickets, reports, etc., everything is…
12 से 13 घंटे सिर्फ अप्रूवल और ‘एंटर’ दबाने का खेल
इंजीनियर ने अपने पोस्ट में दर्द बयां करते हुए लिखा है कि उन पर और उनकी टीम पर लगातार तेजी से काम पूरा करने का भारी दबाव रहता है. दिनभर में 12 से 13 घंटे वे लोग सिर्फ एआई से जनरेट किए गए कंटेंट या कोड को अप्रूव करने में बिता देते हैं. वे खुद से नया कुछ भी क्रिएट नहीं कर रहे हैं. मैनेजमेंट को लगता है कि एआई आ जाने से काम मिनटों में होना चाहिए. लेकिन बिना सोचे-समझे बस मशीनों के भरोसे काम खींचने की इस अंधी दौड़ ने काम का मजा बिल्कुल खत्म कर दिया है.
जूनियर से सीनियर तक सबकी एक जैसी हालत
इस तकनीकी क्रांति का एक और चौंकाने वाला पहलू है कि इसने कंपनी में पदों का अंतर ही मिटा दिया है. इंजीनियर के अनुसार, अब कंपनी में चाहे जूनियर लेवल का डेवलपर हो या कोई अनुभवी सीनियर इंजीनियर, सबकी भूमिका एक जैसी हो गई है. अब कोई भी Bugs ठीक करने या किसी बड़ी तकनीकी समस्या का खुद समाधान खोजने के बारे में नहीं सोच रहा है. सब बस एआई टूल से बातचीत करते हैं और कंप्यूटर पर ‘एंटर’ दबाकर आगे बढ़ जाते हैं.
सॉफ्टवेयर इंजीनियर का कहना है कि इस काम में अब न तो क्रिएटिविटी बची है और न ही किसी बड़ी उपलब्धि को हासिल करने की वह खुशी, जो कोडिंग पूरी होने पर मिलती थी.