नई दिल्ली. भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने वैश्विक भू-राजनीति को लेकर बेहद अहम और बड़ा बयान दिया है. गुरुवार को आयोजित ‘न्यूज18 डेफकॉन 2026’ के पहले संस्करण में बोलते हुए अलीपोव ने साफ कहा कि भारत का एक वैश्विक महाशक्ति (सुपरपावर) के रूप में उभरना और चीन का दुनिया भर में प्रभाव बढ़ना एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय ट्रेंड है जिसे अब कोई पलट नहीं सकता. उन्होंने स्पष्ट किया कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में एशिया की इन दो बड़ी ताकतों का दबदबा ऐतिहासिक रूप से अपरिहार्य हो चुका है.
इस दौरान रूसी राजदूत ने भारत और रूस के बीच दशकों पुराने मजबूत रणनीतिक रिश्तों का भी खास तौर पर जिक्र किया. उन्होंने दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार और वित्तीय लेनदेन (फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन) में और अधिक विविधता लाने की जोरदार वकालत की. अलीपोव ने जोर देकर कहा कि पारंपरिक क्षेत्रों से आगे निकलकर दोनों देशों को नए सेक्टर्स में सहयोग बढ़ाना चाहिए. न्यूज18 और ‘द चाणक्य डायलॉग्स’ के साझे मंच से आया यह बयान पश्चिमी देशों के दबाव के बीच भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी की नई दिशा को साफ तौर पर दर्शाता है.
इस समिट में नीति-निर्माता, सैन्य अधिकारी, राजनयिक, रक्षा उपकरण बनाने वाली कंपनियाँ, टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट और रणनीतिक मामलों के जानकार एक साथ आते हैं. वे भारत के रक्षा निर्माण के लक्ष्यों, रणनीतिक क्षमताओं और राष्ट्रीय सुरक्षा पर चर्चा करते हैं. यह समिट ‘दुनिया के रक्षा निर्माण पार्टनर के तौर पर भारत: आत्मनिर्भरता से ग्लोबल लीडरशिप तक’ थीम पर आयोजित की जा रही है. इसमें रक्षा निर्माण में भारत के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्यों, एयरोस्पेस क्षमताओं को बढ़ाने, रणनीतिक साझेदारियों, साइबर सुरक्षा और गैर-पारंपरिक युद्ध-तरीकों पर चर्चा की जा रही है.
डॉलर पर निर्भरता और ब्रिक्स के विकल्पों पर अलीपोव
अलीपोव ने यह भी कहा कि भारत और ब्रिक्स देशों की ग्रोथ पूरी तरह से अमेरिकी डॉलर पर निर्भर नहीं रह सकती; उन्होंने तर्क दिया कि व्यापार और वित्तीय सहयोग के लिए वैकल्पिक तरीकों की जरूरत है. रूसी राजदूत ने कहा, “भारत और ब्रिक्स देशों की ग्रोथ पूरी तरह से अमेरिकी डॉलर पर निर्भर नहीं हो सकती. हमें विकल्पों की जरूरत है.” उन्होंने साफ किया कि ब्रिक्स के भीतर चर्चा का मकसद डॉलर को हटाना नहीं, बल्कि लेन-देन, व्यापार, सहयोग और फाइनेंस के लिए विकल्प तैयार करना है.
अलीपोव ने कहा, “हमने ब्रिक्स के भीतर डॉलर को बदलने के लिए नहीं, बल्कि लेन-देन, व्यापार, सहयोग और फाइनेंस के लिए विकल्पों पर चर्चा की.” उन्होंने कहा कि भारत और रूस के बीच पहले से ही अपनी-अपनी करेंसी का इस्तेमाल करने वाले द्विपक्षीय तरीके मौजूद हैं और दावा किया कि दोनों देशों के बीच लगभग 96 प्रतिशत द्विपक्षीय लेन-देन अपनी-अपनी करेंसी में ही होता है. उन्होंने कहा, “द्विपक्षीय स्तर पर, हम अपने लगभग 96 प्रतिशत लेन-देन के लिए अपनी-अपनी करेंसी का इस्तेमाल करते हैं.”
प्रतिबंध से रूस का मकसद नहीं बदलेगा
लिंडसे ओ. ग्राहम के ‘रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने वाले 2026 के कानून’ पर प्रतिक्रिया देते हुए अलीपोव ने कहा कि अतिरिक्त प्रतिबंधों से रूस के मकसद में कोई बदलाव नहीं आएगा. उन्होंने कहा, “रूस पर पहले से ही 30,000 से ज़्यादा प्रतिबंध लगे हुए हैं, इसलिए एक और प्रतिबंध लगने या न लगने से कोई खास फ़र्क नहीं पड़ता, और अमेरिका यह बात जानता है. इन प्रतिबंधों से हमारा मकसद किसी भी तरह नहीं बदलेगा, और अमेरिका यह भी जानता है.” हालांकि, रूसी राजदूत ने कहा कि इस तरह के दबाव का भारत पर असर पड़ेगा और अनुमान जताया कि आगे भी प्रतिबंध और नए उपाय लागू होते रहेंगे. अलीपोव ने कहा, “भारत के लिए इससे फ़र्क पड़ता है. मुझे यकीन है कि इस तरह का दबाव और नए कानून या प्रतिबंध आगे भी जारी रहेंगे.”
रूस को और ज़्यादा भारतीय सामान चाहिए
अलीपोव ने यह भी कहा कि मॉस्को रूस को होने वाले भारतीय एक्सपोर्ट में और विविधता (डाइवर्सिफिकेशन) देखना चाहता है, खासकर इसलिए क्योंकि दोनों देश व्यापार में मौजूद बड़े असंतुलन को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कहा, “हम भारत से आम, टेक्सटाइल, इंडस्ट्रियल इक्विपमेंट और कई तरह के सामान का एक्सपोर्ट बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं.” एंबेसडर ने आगे कहा, “हमें रूस को भारत का एक्सपोर्ट बढ़ाना होगा क्योंकि व्यापार में बहुत ज़्यादा असंतुलन है और हम इसे ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं. अब हम अपनी आर्थिक बातचीत में भारत के ज़्यादा तरह के एक्सपोर्ट को शामिल कर रहे हैं.”