हम सभी भारतीय होने के नाते सिविक सेंस के इस खेल में हार गए… यह बात बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या की पत्नी और फेमस म्यूजीशियन शिवश्री स्कंदप्रसाद ने अपनी पांच घंटे लंबी ट्रेन यात्रा के अनुभव के आधार पर लिखी है. उन्होंने अपने इस ट्वीट में बेहद परेशान करने वाले अनुभव को साझा करते हुए बताया कि ट्रेन के सफर के दौरान लगातार पांच घंटों तक उन्हें किन हालात का सामना करना पड़ा. परेशान होकर जब उन्होंने टीटी से मदद की गुहार लगाई तो वह भी सामने वालों के साथ उनका माखौल उड़ाने लगा.
शिवश्री स्कंदप्रसाद ने अपने ट्वीट में लिखा कि…
आज ट्रेन में मेरा सफर बेहद परेशान करने वाला रहा. यह देखकर बहुत दुख हुआ कि लोग पब्लिक स्पेस का सम्मान करना कितना कम समझते हैं. जब हम सार्वजनिक जगह पर होते हैं, तो हमें न तो चिल्लाना चाहिए और न ही इतनी तेज आवाज में बात करनी चाहिए कि वहां मौजूद दूसरे लोगों के प्राइवेट स्पेस प्रभावित हो.
एक कलाकार के तौर पर हमारे दिमाग में एक साथ बहुत सारे विचार चलते रहते हैं. हम अक्सर शांति और सुकून में रहकर अपना काम करना पसंद करते हैं. ट्रेन में किसी बड़े ग्रुप के साथ सफर करने पर शुरू में होने वाली उत्सुकता को हर कोई समझ सकता है. लेकिन जरा सोचिए, 56 सीट वाले कोच में करीब 40 मिडिल एज के लोग हों और वे लगातार 5 घंटे तक इतनी तेज आवाज में बात करते रहें कि पूरा कोच प्रभावित हो. वह भी बिना रुके.
भारत में समस्या यह है कि कोई उन्हें टोक नहीं सकता. एक तरह से यह अनकहा नियम बन गया है कि उस ग्रुप का हिस्सा नहीं होने वाले बाकी 16 लोगों को बस उनकी वजह से होने वाली परेशानी सहन करनी पड़ेगी.
इसलिए मैंने टीटीई से पूछा कि क्या मुझे किसी दूसरे कोच में सीट मिल सकती है. उन्होंने कोशिश भी की, लेकिन ट्रेन पूरी तरह भरी हुई थी. इसलिए मुझे उसी कोच में दूसरी सीट पर ही रहना पड़ा.
इसके बाद पहले से लगातार बातें और हंसी-मजाक कर रहे 8 लोगों के उस ग्रुप ने अचानका यूएनओ (UNO) खेलना शुरू कर दिया. इसके बाद मैंने टीटीई से पूछा कि क्या इस बारे में कुछ किया जा सकता है. टीटीई ने उनसे यूएनओ खेलना बंद करने के लिए कहा और उन्होंने तुरंत खेल बंद कर दिया.
लेकिन कुछ मिनट बाद टीटीई वापस आए और मजाकिया अंदाज में उनसे कन्नड़ में कहा- ‘याके सर गलााट्टे माडतीदेरा?’ यानी ‘क्यों सर, इतना शोर क्यों कर रहे हैं?’
इस पर वे लोग टीटीई के साथ हंसने लगे और बोले- ‘सर, नीवु बन्नी, अडोना’ यानी ‘सर, आप भी आइए, हम साथ में खेलते हैं.’
इस पूरे मामले की चिंता इस बात को लेकर नहीं है कि आखिर कौन जीता. बल्कि मैं और वह पूरा ग्रुप, हम सभी भारतीय होने के नाते, सिविक सेंस के इस खेल में हार गए. आखिर एक देश के तौर पर हम अपने पब्लिक बिहेवियर में कब सुधार करेंगे?