मार्च 2026 में जब फिनलैंड के राष्ट्रपति डॉ अलेक्जेंडर स्टब भारत आए थे, तब दिल्ली में उन्हें महात्मा गांधी से जुड़ा एक ऐसा सच दिखा, जो महीनों उनके दिलो-दिमाग पर छाया रहा. वो एहसास उनके जेहन में इस कदर बस गया कि कई महीनों बाद सीधे संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के सबसे बड़े मंच से उन्होंने पूरी दुनिया के सामने इसका जिक्र किया. आज जब रूस-यूक्रेन से लेकर मिडल ईस्ट तक केवल जंग, मिसाइल और बारूद का धुआं फैला हुआ है, तब राष्ट्रपति स्टब ने बापू सो जुड़ी उस बात को दुनिया के सामने रखा, जो एक तरह से महाशक्तियों को तगड़ा मैसेज है.
राजघाट पर फिनलैंड के राष्ट्रपति ने ऐसा क्या पढ़ा?
मार्च 2026 में फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब भारत की यात्रा पर आए थे. इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बेहद अहम बातचीत की थी. अपनी इसी भारत यात्रा के दौरान वे दिल्ली स्थित राजघाट भी गए थे। राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधि के पास लिखे बापू के एक विचार ने राष्ट्रपति स्टब का ध्यान खींच लिया. बापू ने लिखा था कि ‘एक नियम का टूटना, अपने आप दूसरे नियमों के टूटने की वजह बन जाता है’.
देखने में ये बात भले ही बहुत साधारण लगे, लेकिन आज दुनिया में चल रही खींचतान और संकट का यही सबसे सटीक जवाब थी. राष्ट्रपति स्टब ने बताया कि जब वो संयुक्त राष्ट्र में दुनिया के बिगड़ते हालात के बारे में सोच रहे थे, तो उन्हें 6 महीने पहले राजघाट पर पढ़ा बापू का यही विचार सबसे सही और असरदार लगा. फिर क्या था, उन्होंने तुरंत तय कर लिया कि बापू की इस बड़ी सीख को वो पूरी दुनिया के नेताओं के सामने जरूर रखेंगे.
‘एक नियम का टूटना, बाकी नियमों के टूटने की शुरुआत है’ : महात्मा गांधी
संयुक्त राष्ट्र महासभा के अपने भाषण में फिनलैंड के राष्ट्रपति ने बापू के इसी विचार को सेंटर में रखा. उन्होंने दुनिया के सामने इस बात को बहुत ही आसान शब्दों में समझाया. स्टब ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में नियमों और समझौतों को हल्का मान लेना सबसे बड़ी भूल होती है. जब भी कोई ताकतवर देश अपनी मनमर्जी करते हुए किसी एक अंतरराष्ट्रीय कानून या संधि को तोड़ता है, तो इसका असर केवल वहीं खत्म नहीं होता.
उन्होंने समझाया कि एक देश द्वारा नियम तोड़े जाने पर दूसरे देशों को भी नियम तोड़ने का बहाना और मौका मिल जाता है. इसे अर्थशास्त्र या समाजशास्त्र की भाषा में ‘किक-ऑन इफेक्ट’ या ‘डोमिनो इफेक्ट’ कहा जाता है. यानी जैसे ताश के पत्तों की एक कतार में एक पत्ता गिरते ही पूरी कतार ढह जाती है, ठीक वैसे ही एक नियम टूटने से पूरी दुनिया में गलतियों और नियम-उल्लंघन की एक लंबी सीरीज शुरू हो जाती है.
ताकत और स्वार्थ के दम पर चलती दुनिया की चिंता
अपने भाषण के दौरान राष्ट्रपति स्टब ने इस बात पर गहरा दुख जताया कि आज की दुनिया किस गलत दिशा में आगे बढ़ रही है. उन्होंने चिंता जताते हुए कहा ‘आज अंतरराष्ट्रीय नियम, ट्रीटीज और मानवीय मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं. ताकतवर देश केवल अपने निजी स्वार्थ और सैन्य ताकत के दम पर फैसले ले रहे हैं. छोटे और कमजोर देशों के अधिकारों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है. सीमाओं के सम्मान और देशों की संप्रभुता पर लगातार हमले हो रहे हैं.
स्टब ने कहा कि इस बिगड़ते माहौल को देखकर आज कई बड़े एक्सपर्ट और ग्लोबल लीडर्स ये मानने लगे हैं कि ‘रूल-बेस्ड इंटरनेशनल ऑर्डर’ यानी नियमों पर चलने वाली वैश्विक व्यवस्था अब खत्म हो चुकी है और इसकी हार स्वीकार कर लेनी चाहिए. लेकिन स्टब का मानना है कि ऐसा सोचना बहुत बड़ी जल्दबाजी और निराशावादी सोच होगी.
‘अंतरराष्ट्रीय कानून कभी परफेक्ट नहीं था, लेकिन यही हमारा एकमात्र सहारा है’
फिनलैंड के राष्ट्रपति ने बहुत ही प्रैक्टिकल बात कही. उन्होंने माना कि संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं या अंतरराष्ट्रीय कानून कभी भी पूरी तरह से सही या परफेक्ट नहीं रहे हैं. इतिहास में भी पहले कई बार अंतरराष्ट्रीय नियमों पर सवाल उठे हैं और उनके सामने बड़ी-बड़ी चुनौतियां आई हैं. लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि हम नियमों पर बनी इस पूरी व्यवस्था को ही कचरे के डिब्बे में फेंक दें.
स्टब ने कड़े शब्दों में कहा कि ‘नियमों के बिना दुनिया’ कोई विकल्प हो ही नहीं सकती. अगर दुनिया से नियम-कानून खत्म हो गए, तो चारों तरफ अराजकता फैल जाएगी और ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का जंगल राज वापस आ जाएगा. उन्होंने चेतावनी दी कि हम इतिहास के एक बेहद नाजुक और निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं, जहां से उठाया गया हमारा हर कदम यह तय करेगा कि हमारी आने वाली पीढ़ियां किस माहौल में सांस लेंगी.
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