हिमाचल में 5 मिनट में GLOF से हो सकती है तबाही, 14 KM पैदल चढ़ाई कर घेपन झील पर पहुंचीं डीसी किरण भड़ाना, जांच में क्या मिला?

हिमाचल में 5 मिनट में GLOF से हो सकती है तबाही, 14 KM पैदल चढ़ाई कर घेपन झील पर पहुंचीं डीसी किरण भड़ाना, जांच में क्या मिला?


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Himachal News: नेपाल त्रासदी के बाद हिमाचल प्रदेश अलर्ट पर है. लाहौल-स्पीति की घेपन ग्लेशियल झील का जलस्तर बढ़ने से GLOF का खतरा है. DC किरण भड़ाना ने टीम के साथ झील का निरीक्षण किया. अर्ली वार्निंग सिस्टम पर काम किया जा रहा है.

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उपायुक्त के साथ 10 विभागों के 15 अधिकारियों-कर्मचारियों की टीम ने झील का निरीक्षण किया.

केलांग. नेपाल में ग्लेशियर टूटने से हुई तबाही के बाद हिमाचल प्रदेश प्रदेश अलर्ट हो गया है. लाहौल-स्पीति में 4,070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन ग्लेशियल झील के बढ़ते जलस्तर ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है. संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के खतरे को देखते हुए जिला प्रशासन अलर्ट मोड पर है. मंगलवार को उपायुक्त एवं अध्यक्ष DDMA लाहौल-स्पीति किरण भड़ाना ने स्वयं 14 किलोमीटर की कठिन पैदल चढ़ाई कर झील तक पहुंचकर हालात का जायजा लिया.

15 अधिकारियों की टीम ने किया स्थल निरीक्षण

उपायुक्त के साथ 10 विभागों के 15 अधिकारियों-कर्मचारियों की टीम ने झील का निरीक्षण किया. टीम ने जलस्तर, आसपास के भू-भाग और पानी के संभावित बहाव मार्ग का अवलोकन किया. जलस्तर को कम करने की संभावनाओं और आपदा प्रबंधन योजना पर मंथन किया गया. दुर्गम क्षेत्र होने के कारण टीम ने बेस कैंप में रात्रि विश्राम किया, जबकि उपायुक्त उसी दिन वापस लौट आईं. टीम बुधवार दोपहर केलांग लौटी.

5 मिनट में आबादी तक पहुंच सकता है पानी

उपायुक्त किरण भड़ाना ने कहा कि घेपन झील के आसपास बड़ी संख्या में ग्लेशियर और पर्वत हैं, जिनकी स्थिरता की नियमित निगरानी जरूरी है. नेपाल में पिछले माह हुई त्रासदी ने ग्लेशियरों की अस्थिरता के खतरे को उजागर किया है. इसको लेकर SDMA और NDMA के साथ समन्वय किया जाएगा. उन्होंने बताया कि प्रारंभिक आकलन में GLOF की स्थिति में 22 मिनट में पानी आबादी क्षेत्र तक पहुंचने की संभावना है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर यह पानी 5 मिनट के भीतर भी पहुंच सकता है. इसलिए संवेदनशील क्षेत्रों के लिए प्रभावी निकासी योजना, मॉक ड्रिल और जागरूकता कार्यक्रम बेहद जरूरी हैं.


अर्ली वार्निंग सिस्टम पर काम तेज

जिला प्रशासन झील में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में काम कर रहा है. सी-डैक तिरुवनंतपुरम द्वारा विकसित प्रणाली का सिस्सु झील में परीक्षण हो चुका है. भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की टीम भी झील का अध्ययन कर चुकी है. उपायुक्त ने कहा कि ऊंचाई वाले दुर्गम क्षेत्रों में तेजी से बदल रही प्राकृतिक परिस्थितियों के बीच पूर्व तैयारी, निरंतर निगरानी और विभागों के बीच बेहतर समन्वय ही आपदा जोखिम को कम करने का सबसे महत्वपूर्ण आधार है.



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