1965 India-Pakistan War Cease Fire: भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में तकरार कोई आज शुरू हुई घटना नहीं है. 1947 में देश की आजादी और फिर बंटवारे के साथ पाकिस्तान का जन्म हुआ था. लेकिन, उसने स्थापना के साथ ही भारत से दुश्मनी ठान ली थी. आजादी के कुछ ही दिनों के भीतर उसने जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ करवाया और फिर दोनों देशों के बीच लंबे समय तक कश्मीर में लड़ाई हुई. इसे 1948 का भारत-पाकिस्तान जंग कहा जाता है. भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र में मामला ले जाया गया और फिर सीजफायर हुआ. इसके कुछ ही साल बाद पाकिस्तान ने फिर से 1965 में भारत पर हमला कर दिया. उसने सोचा था कि 1962 की जंग में चीन के साथ भारत को मिली शिकस्त से उसकी सेना का मनोबल डाउन है. ऐसे में भारत पर हमला करना मुफीद होगा. लेकिन, इस जंग में उसकी बुरी हाल हुई. और भारत ने लाहौर के बेहद करीब के इलाकों पर कब्जा कर लिया.
इस जंग में भारत ने पाकिस्तान के करीब 1920 वर्ग किमी क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था. हालांकि पाकिस्तान ने भी भारत के करीब 540 वर्ग किमी क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया था. भारत में मुख्य रूप से पंजाब सेक्टर में बढ़त हासिल की थी. उसने लाहौर के पास कई रणनीतिक इलाकों पर कब्जा किया. फिर कश्मीर इलाके में भी बढ़त ली थी. इसमें सबसे अहम था हाजी पीर पास. आज के ही दिन यानी 23 सितंबर 1965 को यह जंग खत्म हुई. उसके बाद भारत द्वारा जीते गए इलाकों पर भारतीय सैनिकों का कब्जा था. लेकिन, जनवरी 1966 में ताशकंद समझौते के बाद भारत और पाकिस्तान ने एक दूसरे की जमीन लौटाने पर सहमति जताई. फिर फरवरी 1966 में दोनों देशों की सेना पूर्व की स्थिति में लौटने लगी. लेकिन, तब से यह सवाल उठता रहा है कि जब जंग में इतना नुकसान हुआ. भारत ने इतनी बड़ी जीत हासिल की, तो फिर क्यों ये जमीन लौटा दी गई.
पहले समझिए, 1965 में हुआ क्या था?
1965 की जंग अचानक शुरू नहीं हुई थी. पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में भारत के खिलाफ ऑपरेशन जिब्राल्टर शुरू किया. इसके तहत बड़ी संख्या में लड़ाकों और घुसपैठियों को भारतीय क्षेत्र में भेजने की कोशिश की गई. पाकिस्तान को उम्मीद थी कि इससे कश्मीर में भारत के खिलाफ विद्रोह खड़ा किया जा सकेगा. भारत ने इसका जवाब दिया. सितंबर 1965 में भारतीय सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर पश्चिमी मोर्चे पर हमला किया. पंजाब के मोर्चे पर भारतीय सेना लाहौर के काफी करीब तक पहुंच गई. सियालकोट सेक्टर में भी दोनों सेनाओं के बीच जबरदस्त लड़ाई हुई. इसी दौरान भारत ने हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया. यह इलाका इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि पाकिस्तान की तरफ से जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ के लिए यह एक अहम रास्ता माना जाता था.
लाहौर के कौन से इलाके भारत के कब्जे में आए?
जंग के दौरान भारत ने पंजाब और जम्मू-कश्मीर के मोर्चे पर पाकिस्तान के कई इलाकों पर कब्जा किया. भारतीय सेना लाहौर के बाहरी इलाकों तक पहुंच गई थी. इसी वजह से 1965 की लड़ाई में लाहौर का मोर्चा बेहद अहम बन गया. हालांकि यहां एक बात समझना जरूरी है. भारत ने लाहौर शहर पर कब्जा नहीं किया था. भारतीय सेना शहर के बाहरी हिस्सों और रणनीतिक इलाकों तक पहुंची थी. युद्ध के अंत में भारत के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक उसके कब्जे में पाकिस्तान की करीब 1,920 वर्ग किलोमीटर जमीन थी. पाकिस्तान के कब्जे में भारत की करीब 540 वर्ग किलोमीटर जमीन बताई गई.
1965 की जंग के बाद एक टैंक पर भारतीय पीएम दिवंगत लाल बहादुर शास्त्री. फोटो- सोशल मीडिया
फिर अचानक जमीन लौटाने का फैसला क्यों हुआ?
यहीं से 1965 की जंग का सबसे बड़ा सवाल सामने आता है. अगर भारत ने युद्ध में पाकिस्तान के बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया था, तो उसे अपने पास क्यों नहीं रखा गया? इसका जवाब युद्ध के मैदान से ज्यादा कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय दबाव में छिपा है. सितंबर 1965 में संयुक्त राष्ट्र की कोशिशों के बाद दोनों देशों ने युद्ध विराम स्वीकार किया. लेकिन युद्ध विराम का मतलब यह नहीं था कि कब्जे वाले इलाके स्थायी रूप से भारत या पाकिस्तान के पास चले गए. इसके बाद सोवियत संघ ने दोनों देशों के बीच बातचीत कराने की पहल की. तत्कालीन सोवियत प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसिगिन की मध्यस्थता में भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान जनवरी 1966 में ताशकंद पहुंचे. 10 जनवरी 1966 को दोनों देशों ने ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर किए. इसमें यह तय हुआ कि दोनों देश 5 अगस्त 1965 से पहले की स्थिति पर लौटेंगे और युद्ध के दौरान कब्जे में लिए गए इलाकों से अपनी सेनाएं वापस बुलाएंगे.
क्या भारत पर अमेरिका और सोवियत संघ का दबाव था?
1965 की जंग के समय अंतरराष्ट्रीय ताकतों की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अमेरिका और ब्रिटेन ने दोनों देशों को हथियारों की आपूर्ति पर रोक लगा दी थी. इससे भारत और पाकिस्तान दोनों पर सैन्य दबाव बढ़ा. दूसरी ओर सोवियत संघ चाहता था कि दोनों देशों के बीच संघर्ष खत्म हो और क्षेत्र में स्थिरता लौटे. यही वजह है कि ताशकंद वार्ता को सिर्फ भारत-पाकिस्तान के बीच जमीन की अदला-बदली के तौर पर देखना अधूरा होगा. इसके पीछे उस दौर की शीत युद्ध की अंतरराष्ट्रीय राजनीति भी थी.
फिर हाजी पीर भी पाकिस्तान को क्यों लौटा दिया?
हाजी पीर भारत के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण था. यह दर्रा घुसपैठ के लिहाज से रणनीतिक महत्व रखता था. भारतीय सेना ने इसे अगस्त 1965 में कब्जे में लिया था. लेकिन ताशकंद समझौते के तहत दोनों देशों को युद्ध से पहले की स्थिति में लौटना था. इसलिए भारत ने हाजी पीर भी पाकिस्तान को वापस कर दिया. यही फैसला बाद के वर्षों में बहस का विषय बना. कुछ सैन्य विश्लेषकों ने तर्क दिया कि भारत ने युद्ध में हासिल एक महत्वपूर्ण रणनीतिक लाभ बातचीत के बदले छोड़ दिया. वहीं सरकार की नीति का आधार यह था कि युद्ध को लंबा खींचने के बजाय समझौते के जरिए स्थायी शांति और तनाव कम करने की कोशिश की जाए.
क्या 1965 की जंग में भारत जीता था?
इस सवाल का जवाब आज भी भारत और पाकिस्तान में अलग-अलग तरीके से दिया जाता है. युद्ध का कोई स्पष्ट निर्णायक परिणाम नहीं निकला. दोनों देशों ने अपनी-अपनी जीत का दावा किया. भारत ने पाकिस्तान के कश्मीर संबंधी सैन्य लक्ष्य को विफल किया और उसके क्षेत्र में भी बढ़त बनाई. पाकिस्तान ने भी कुछ क्षेत्रों में भारतीय जमीन पर कब्जा किया और लाहौर पर भारतीय कब्जे को रोकने में सफलता हासिल की. इसीलिए कई इतिहासकार 1965 के युद्ध को निर्णायक जीत के बजाय सीमित सैन्य बढ़त या गतिरोध के रूप में देखते हैं. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी राजनयिक डेनिस कक्स ने भी लिखा कि दोनों पक्षों को भारी नुकसान हुआ और कोई निर्णायक सैन्य जीत नहीं मिली, लेकिन भारत अपने मूल उद्देश्य- पाकिस्तान की ओर से कश्मीर को सैन्य ताकत से हासिल करने की कोशिश को रोकने में सफल रहा.
ताशकंद के बाद क्या हुआ?
10 जनवरी 1966 को ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर हुए. इसके कुछ ही घंटे बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का ताशकंद में निधन हो गया. जमीन वापस करने के फैसले पर भारत में बाद में भी बहस होती रही. खासकर हाजी पीर जैसे रणनीतिक इलाके को लौटाने को लेकर सवाल उठे. लेकिन उस समय भारत सरकार ने इसे युद्ध के बाद शांति बहाल करने और अंतरराष्ट्रीय समझौते का सम्मान करने के तौर पर देखा. इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि 1965 की जंग में जमीन पर मिली सैन्य बढ़त और बातचीत की मेज पर लिया गया फैसला दो अलग चीजें थीं. भारत के सैनिकों ने जिन इलाकों पर कब्जा किया, उन्हें स्थायी रूप से अपने पास रखने का फैसला सरकार ने नहीं किया. ताशकंद में दोनों देशों ने युद्ध से पहले की स्थिति में लौटने पर सहमति दी और भारत ने कब्जे वाले इलाकों को वापस कर दिया.