कस्टमर ने लटका दी पेमेंट? TReDS से चुटकियों में क्लीयर होगा अटका बिल, जानें कैसे

कस्टमर ने लटका दी पेमेंट? TReDS से चुटकियों में क्लीयर होगा अटका बिल, जानें कैसे


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How TReDS Works : कई बार माल या सेवा की सप्लाई करने के बाद ग्राहक से भुगतान आने में लंबा समय लग जाता है. इससे एक छोटे कारोबारी के लिए रोजमर्रा के खर्च, वेतन और नई खरीदारी के लिए पूंजी जुटाना मुश्किल हो जाता है. इसी समस्‍या को दूर करने के लिए आरबीआई ने ट्रेड रिसेवेबल्‍स डिस्‍काउंटिंग सिस्‍टम (TReDS) बनाया है.

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यहां आप अपने बेचे गए माल के अनपेड इनवॉइस को जमा करके बैंकों से तुरंत कैश निकाल सकते हैं.

नई दिल्‍ली. माल तो बिक गया, इनवॉइस भी कट गया… लेकिन जब खाते में पैसे आने की बारी आई, तो खरीदार ने कह दिया—”साहब, पेमेंट 60 से 90 दिन बाद मिलेगा.” एक छोटे या मध्यम कारोबारी (MSME) को इस तरह की बातें आमतौर पर सुननी ही पड़ती है. बाजार में माल सप्लाई करने के बाद पेमेंट अटक जाना व्यापार के लिए ‘साइलेंट किलर’ जैसा होता है. ऐसा होने पर कर्मचारियों की तनख्वाह, कच्चे माल की खरीदारी और रोजमर्रा के खर्चे पूरे करने के लिए महंगे ब्याज पर कर्ज उठाना पड़ता है. इस बोझ से निजात दिलाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने शुरू किया है ट्रेड रिसेवेबल्‍स डिस्‍काउंटिंग सिस्‍टम यानी TReDS.

टीआरईडीएस (TReDS) असल में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा रेगुलेट किया जाने वाला एक सुरक्षित और पारदर्शी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है. इसे आप एक डिजिटल बाजार भी कह सकते हैं. यहां आप अपने बेचे गए माल के अनपेड इनवॉइस को जमा करके बैंकों से तुरंत कैश निकाल सकते हैं. यहां लोन लेने के लिए आपको अपनी जमीन, मकान या कोई संपत्ति गिरवी नहीं रखनी पड़ती. आपका वैध बिल ही आपकी गारंटी है.

कैसे काम करता है टीआरईडीएस?

आरबीआई द्वारा बनाए गए टीआरईडीएस में तीन मुख्य पक्ष शामिल होते हैं. पहला होता है विक्रेता. सेलर फायदा केवल रजिस्टर्ड MSME इकाइयां ही होनी चाहिए. दूसरा होता है खरीदार. ये होते हैं बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां, सरकारी विभाग और PSUs. तीसरा है फाइनेंसर. ये होते हैं. RBI अधिकृत बैंक, NBFCs और वित्तीय संस्थान. मान लीजिए आपने किसी बड़ी कंपनी को ₹10 लाख का सामान डिलीवर किया और उसका पेमेंट 60 दिन बाद आना है. पर आप TReDS पर तुरंत पैसे पा सकते हैं. इसके लिए आपको MSME सप्लायर पोर्टल पर अपने ₹10 लाख के इनवॉइस का डिजिटल रूप (Factoring Unit) अपलोड करता है.

इसके बाद जिस कंपनी ने माल खरीदा है, वह पोर्टल पर लॉग इन करके उस बिल और डिलीवरी की पुष्टि कर देती है. बिल अप्रूव होते ही पोर्टल पर मौजूद दर्जनों बैंक और वित्तीय संस्थान उस इनवॉइस को कैश कराने के लिए आपस में डिस्काउंट रेट की बोली लगाते हैं. सप्लायर देखता है कि कौन सा बैंक सबसे कम डिस्काउंट चार्ज काट रहा है और उसे सेलेक्ट कर लेता है. फाइनेंसर मामूली डिस्काउंट काटकर तुरंत विक्रेता के बैंक खाते में पूरी रकम ट्रांसफर कर देता है. जब 60 दिन की मियाद पूरी होती है, तब खरीदार कंपनी सीधे उस बैंक को पूरा पेमेंट लौटा देती है.

एमएसएमई के लिए क्यों वरदान है TReDS ?

  • ‘Without Recourse’ सुरक्षा: RBI के नियमानुसार, TReDS पर होने वाला लेन-देन सामान्यतः ‘विदाउट रिकोर्स’ होता है. इसका मतलब यह है कि अगर आगे चलकर खरीदार कंपनी डिफॉल्ट करती है या दिवालिया होती है, तो बैंक पैसे की वसूली के लिए MSME सप्लायर का गला नहीं पकड़ सकता. जिम्मेदारी पूरी तरह खरीदार की होती है.
  • बिना किसी गारंटी के पैसा: यहां लोन लेने के लिए आपको अपनी जमीन, मकान या कोई संपत्ति गिरवी नहीं रखनी पड़ती. आपका वैध बिल ही आपकी गारंटी है.
  • कर्ज के जंजाल से मुक्ति: वर्किंग कैपिटल के लिए भारी ब्याज पर अलग से ओवरड्राफ्ट या बिजनेस लोन लेने की जरूरत नहीं पड़ती.
  • नकदी का संकट नहीं: पेमेंट समय पर मिलने से आपकी प्रोडक्शन लाइन कभी रुकती नहीं.

TReDS प्लेटफॉर्म पर रजिस्ट्रेशन कैसे करें?

देश में वर्तमान में मुख्य रूप से तीन प्रमुख RBI-अधिकृत TReDS प्लेटफॉर्म काम कर रहे हैं: RXIL, M1xchange और Invoicemart. रजिस्ट्रेशन के लिए MSME कारोबारी को अपने बिजनेस डॉक्युमेंट्स, पैन, जीएसटीआईएन, बैंक स्टेटमेंट और उद्यम रजिस्ट्रेशन नंबर पोर्टल पर अपलोड करने होते हैं. वेरिफिकेशन और डिजिटल एग्रीमेंट पूरा होते ही आपका खाता एक्टिव हो जाता है. किसी भी प्लेटफॉर्म पर रजिस्टर करने से पहले यह जरूर जांच लें कि आपके प्रमुख खरीदार और ग्राहक किस TReDS प्लेटफॉर्म पर पहले से रजिस्टर्ड हैं, ताकि आपके बिल तुरंत अप्रूव हो सकें.



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