JPMorgan On US India Tariff : ‘अमेरिका भारत पर नहीं लगाएगा 100% टैरिफ’, US के सबसे बड़े बैंक ने ट्रंप को दी वॉर्निंग

JPMorgan On US India Tariff : ‘अमेरिका भारत पर नहीं लगाएगा 100% टैरिफ’, US के सबसे बड़े बैंक ने ट्रंप को दी वॉर्निंग


रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत और अमेरिका के बीच मचे घमासान में एक ऐसा मोड़ आया है, जिसने वाशिंगटन से लेकर वॉल स्ट्रीट तक सनसनी फैला दी है. अमेरिकी संसद ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भारत पर 100% तक का भारी-भरकम टैरिफ ठोकने का कानूनी अधिकार तो दे दिया, लेकिन इसी बीच अमेरिका के सबसे बड़े बैंक ‘जेपीमॉर्गन चेस’ के बॉस ने सीधे ट्रंप प्रशासन को एक ऐसी कड़ी ‘वॉर्निंग’ दे डाली है, जिसने वाशिंगटन की रातों की नींद उड़ा दी है. बैंकिंग दिग्गज का मानना है कि अमेरिका चाहकर भी भारत पर ये 100% टैरिफ नहीं लगा पाएगा.

अमेरिकी टैरिफ पर ट्रंप को दी सलाह

मुंबई में आयोजित जेपीमॉर्गन इंडिया इन्वेस्टर कॉन्फ्रेंस के दौरान जब सीएनबीसी-टीवी18 ने जेपीमॉर्गन चेस के सीईओ जेमी डिमन से बात की, तो उन्होंने बिना किसी झिझक के अमेरिकी सरकार को आईना दिखा दिया. वॉल स्ट्रीट के सबसे शक्तिशाली बैंकर माने जाने वाले जेमी डिमन ने कहा कि वाशिंगटन में बैठे सांसदों को भारत की ऊर्जा जरूरतों पर कोई भी जल्दबाजी में फैसला नहीं लेना चाहिए.

उन्होंने उम्मीद जताई कि अमेरिका समझदारी का परिचय देगा और भारत पर कोई भी दंडात्मक कार्रवाई करने से पहले जमीनी हकीकत को समझेगा. डिमन ने स्पष्ट किया कि अमेरिका को रूस पर राजनीतिक दबाव बनाने का हक है, लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि वो अपने सबसे मजबूत रणनीतिक साझेदार यानी भारत को निशाना बनाने लगे.

आखिर क्या है वो ‘वॉर्निंग’ जिसने वाशिंगटन के हाथ बांध दिए?

जेमी डिमन ने ट्रंप प्रशासन को जिस खतरे का अहसास कराया है, वो सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की तबाही से जुड़ा है. उनकी सबसे बड़ी चेतावनी ये है कि अगर अमेरिका के दबाव में आकर भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद कर दिया, तो इससे रूस का नुकसान कम और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का कबाड़ा ज्यादा होगा.

डिमन के मुताबिक, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रातों-रात तेल खरीदना बंद नहीं कर सकता. अगर भारत रूसी तेल छोड़ता है, तो उसे बाकी दुनिया के तेल बाजार में जाकर मारामारी करनी पड़ेगी. इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई अचानक कम हो जाएगी और मांग बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी. इसका सीधा नतीजा ये होगा कि दुनिया भर में तेल के दाम बेकाबू हो जाएंगे, जिससे अमेरिका में भी महंगाई का नया तूफान आ जाएगा. यही वो बड़ी चेतावनी है जिसके कारण अमेरिकी वित्त मंत्रालय और ट्रंप प्रशासन बैकफुट पर आ सकते हैं.

भारतीय रिफाइनरियों का तकनीकी गणित: क्यों हर तेल एक जैसा नहीं?

बैंकिंग दिग्गज जेमी डिमन ने वाशिंगटन के नेताओं को एक बहुत ही बेसिक और टेक्निकल बात समझाई, जिसे अक्सर पॉटिशियन्स नजरअंदाज कर देते हैं. आम लोगों या नेताओं के लिए कच्चा तेल सिर्फ ‘क्रूड’ होता है, लेकिन तेल रिफाइनिंग इंडस्ट्री में हर तेल का मिजाज अलग होता है.

  • केमिकल डिजाइन: भारतीय तेल रिफाइनरियां खास तरह के कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए बनी हैं.
  • रूस का ‘उराल क्रूड’: रूस के उराल क्रूड में सल्फर की मात्रा और उसका डेंसिटी ऐसा है कि भारतीय रिफाइनरियों की मशीनें उसमें से बहुत आसानी और कम लागत में पेट्रोल-डीजल निकाल लेती हैं.
  • तकनीकी असंतुलन का खतरा: अगर भारत अचानक किसी दूसरे देश से दूसरा क्रूड ग्रेड खरीदने लगे, तो भारतीय मशीनों को भारी नुकसान पहुंच सकता है और रिफाइनिंग की लागत अचानक आसमान छूने लगेगी. डिमन का तर्क है कि अमेरिका को भारत की इस तकनीकी मजबूरी का सम्मान करना ही पड़ेगा.

100% टैरिफ का चाबुक और ‘लिंडसे ओ ग्राहम एक्ट’

इस पूरे विवाद के पीछे अमेरिकी संसद द्वारा पारित किया गया नया कानून है, जिसे ‘लिंडसे ओ ग्राहम सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ के नाम से जाना जाता है. इस कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को ये असाधारण अधिकार मिला है कि वे रूस से तेल खरीदने वाले देशों, खासकर भारत और चीन, पर 100 प्रतिशत तक का टैरिफ लगा सकते हैं.

वाशिंगटन का मानना है कि भारत द्वारा रूसी तेल खरीदे जाने से मॉस्को को अरबों डॉलर का फायदा हो रहा है, जिसका इस्तेमाल वो युद्ध में कर रहा है. हालांकि, व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ट्रंप भारत के सामानों पर 100% टैरिफ लगाते हैं, तो भारत-अमेरिका के बीच सालाना 200 अरब डॉलर से अधिक का व्यापार पूरी तरह ठप हो जाएगा, जो खुद अमेरिकी कंपनियों के लिए आत्मघाती साबित होगा.

भारत का दोटूक जवाब: ‘पीपल फर्स्ट’ ऊर्जा नीति

अमेरिकी धमकियों और पाबंदियों के जवाब में भारत ने भी अपना रुख शीशे की तरह साफ कर दिया है. अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने अमेरिकी संसद में बिल पास होते ही भारत का पक्ष मजबूती से दुनिया के सामने रखा.

राजदूत क्वात्रा ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि भारत की ऊर्जा नीति सिर्फ एक ही सिद्धांत पर चलती है—’पीपल फर्स्ट’ यानी हमारी जनता की भलाई सबसे पहले. उन्होंने दुनिया को याद दिलाया कि भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल और करीब 50% प्राकृतिक गैस बाहर से आयात करता है. ऐसे में भारत के लिए ये कोई राजनीतिक खेल नहीं, बल्कि 1.4 अरब नागरिकों के जीवन का सवाल है. भारत हमेशा वहीं से तेल खरीदेगा जहां वो सस्ता, सुलभ और व्यावसायिक रूप से सही मिलेगा.

भारत ने कैसे टाली दुनिया में 150 डॉलर क्रूड की तबाही?

भारतीय राजदूत और जेमी डिमन के बयानों का सबसे बड़ा सार ये है कि भारत ने रूसी तेल खरीदकर असल में पूरी दुनिया पर अहसान किया है. जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ था, तब अगर भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार के बाकी सीमित तेल भंडारों पर टूट पड़ता, तो कच्चे तेल की कीमतें 150 से 180 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जातीं.

भारत ने रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदकर वैश्विक बाजार में आपूर्ति का संतुलन बनाए रखा. इससे न केवल भारत की आम जनता को भयानक महंगाई के झटके से बचाया गया, बल्कि अमेरिका और यूरोप में भी तेल की कीमतें एक हद से ज्यादा नहीं बढ़ सकीं.

कूटनीति बनाम आर्थिक हकीकत: आगे क्या होगा?

अब सवाल उठता है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप वास्तव में जेमी डिमन की चेतावनी को नजरअंदाज करके भारत पर 100% टैरिफ लगाने की हिमाकत करेंगे?

जानकारों का मानना है कि ट्रंप भले ही चुनावी भाषणों या बयानों में सख्त रुख दिखाएं, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर वे ऐसा नहीं कर सकते. चीन के बढ़ते दबदबे को रोकने के लिए अमेरिका को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की सबसे ज्यादा जरूरत है. ऐसे में भारत पर 100% टैरिफ लगाना अमेरिका के अपने रणनीतिक पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा.

आर्थिक हकीकत हमेशा राजनीतिक भाषणों पर भारी पड़ती है. अमेरिका के सबसे बड़े बैंक के सीईओ ने वाशिंगटन को साफ संदेश दे दिया है कि भारत को सजा देने की कोशिश में अमेरिका खुद अपनी और दुनिया की अर्थव्यवस्था को आग में झोंक देगा. यही वजह है कि एक्सपर्ट्स मान रहे हैं कि वाशिंगटन धमकियों का नाटक भले जारी रखे, लेकिन अंत में उसे भारत को राहत देने के लिए बीच का रास्ता ही चुनना पड़ेगा.



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