IIT बांबे छात्र सुसाइड: क्या होता है साइकोलॉजिकल अटॉप्सी; कौन सी जानकारी आएगी सामने?

IIT बांबे छात्र सुसाइड: क्या होता है साइकोलॉजिकल अटॉप्सी; कौन सी जानकारी आएगी सामने?


आईआईटी बांबे के छात्र साहिल वाकोडे की मौत ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं. साहिल की मौत से पहले परीक्षा में उसके साथ क्या हुआ, उसके बाद वह हॉस्टल तक कैसे पहुंचा और उन आखिरी घंटों में उसके मन में क्या चल रहा था, पुलिस इन तमाम सवालों के जवाब तलाश रही है. फिलहाल जांच में सीसीटीवी फुटेज समेत दूसरे सबूतों को खंगाला जा रहा है. इसी बीच विशेषज्ञों की ओर से साइकोलॉजिकल अटॉप्सी यानी मनोवैज्ञानिक शव-परीक्षा की बात सामने आई है. लेकिन आखिर साइकोलॉजिकल अटॉप्सी होती क्या है? क्या इससे यह पता लगाया जा सकता है कि मौत से कुछ घंटे पहले किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति कैसी थी? जांच में किन-किन चीजों को देखा जाता है और साहिल के मामले में इससे कौन-से सवालों के जवाब मिल सकते हैं?

क्या होती है साइकोलॉजिकल अटॉप्सी?

नाम सुनकर ऐसा लग सकता है कि यह सामान्य पोस्टमार्टम जैसी कोई जांच है. लेकिन ऐसा नहीं है. सामान्य पोस्टमार्टम में शरीर की जांच करके मौत की वजह पता लगाने की कोशिश होती है. इसके उलट साइकोलॉजिकल अटॉप्सी में व्यक्ति की मौत से पहले की मानसिक, सामाजिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों को दोबारा समझने की कोशिश की जाती है. इसके लिए मृत व्यक्ति की जिंदगी से जुड़े रिकॉर्ड, उसके करीबी लोगों की जानकारी और उपलब्ध दूसरे सबूतों को एक साथ देखा जाता है. मकसद यह समझना होता है कि मौत से पहले उसके जीवन में क्या चल रहा था, कौन-से तनाव मौजूद थे और किन घटनाओं ने उसकी स्थिति को प्रभावित किया. सरल भाषा में कहें तो यह शरीर का नहीं, जिंदगी के आखिरी दौर का पोस्टमार्टम है.

क्या इससे आखिरी घंटों की मानसिक स्थिति पता चल जाती है?

यहां एक बहुत जरूरी बात समझनी होगी. साइकोलॉजिकल अटॉप्सी किसी व्यक्ति के आखिरी विचारों को सीधे नहीं पढ़ सकती. विशेषज्ञ उपलब्ध जानकारी के आधार पर उसका मनोवैज्ञानिक और सामाजिक हालात का पुनर्निर्माण करते हैं. इसमें परिवार, दोस्तों, सहपाठियों, शिक्षकों और दूसरे परिचितों से बातचीत की जा सकती है. साथ ही उपलब्ध चिकित्सकीय रिकॉर्ड, हैंडराइटिंग और दूसरे प्रासंगिक दस्तावेज भी देखे जा सकते हैं. यानी रिपोर्ट यह बता सकती है कि किस तरह के तनाव, व्यवहार में बदलाव या परिस्थितियां मौजूद थीं, लेकिन यह दावा करना मुश्किल होगा कि व्यक्ति के मन में ठीक उसी समय कौन-सा विचार चल रहा था.

साहिल के मामले में क्या-क्या देखा जा सकता है?

साहिल की मौत से पहले परीक्षा में उसके साथ हुई घटना इस जांच का एक हिस्सा हो सकती है. लेकिन विशेषज्ञ सिर्फ उसी घटना पर रुकेंगे नहीं. मिसाल के तौर पर देखा जा सकता है कि पिछले कुछ हफ्तों या महीनों में उसकी पढ़ाई कैसी चल रही थी. उसके अंक, उपस्थिति, शिक्षकों या सहपाठियों के साथ संबंध और किसी तरह का अनुशासनात्मक विवाद था या नहीं, इसकी जानकारी जुटाई जा सकती है. इसके साथ यह भी देखा जा सकता है कि उसके व्यवहार में हाल में कोई बड़ा बदलाव आया था या नहीं. क्या वह दोस्तों और परिवार से पहले की तुलना में कम बात कर रहा था? क्या उसके सामाजिक संबंधों में बदलाव आया था? क्या किसी खास घटना के बाद उसके व्यवहार में परिवर्तन दिखा? मनोवैज्ञानिक शव-परीक्षा में ऐसे कई स्रोतों को मिलाकर पूरी तस्वीर तैयार करने की कोशिश की जाती है.

मोबाइल और डिजिटल दुनिया से क्या पता चलेगा?

आज के दौर में किसी व्यक्ति की डिजिटल गतिविधियां भी महत्वपूर्ण सुराग दे सकती हैं, हालांकि उनकी जांच कानूनी प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के दायरे में ही होगी. फोन, संदेश, ईमेल, सोशल मीडिया गतिविधि और दूसरे डिजिटल रिकॉर्ड से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि मौत से पहले उसके संपर्क किन लोगों से थे और उसकी जिंदगी में कोई महत्वपूर्ण घटना या बदलाव आया था या नहीं. साहिल मामले में पुलिस पहले से सीसीटीवी फुटेज की मदद से उसके परीक्षा कक्ष से हॉस्टल तक के घटनाक्रम को जोड़ने की कोशिश कर रही है. इसलिए डिजिटल और दूसरे साक्ष्यों को घटनाक्रम के साथ मिलाकर देखना जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है.

परिवार और दोस्तों से क्यों बात की जाती है?

क्योंकि मृत व्यक्ति खुद अपनी मानसिक स्थिति के बारे में कुछ नहीं बता सकता. इसलिए उसके आसपास के लोगों से जानकारी ली जाती है. परिवार से बचपन, पारिवारिक संबंध और हाल के व्यवहार के बारे में पूछा जा सकता है. दोस्तों से उसके रोजमर्रा के व्यवहार और सामाजिक संबंधों के बारे में जानकारी मिल सकती है. सहपाठी और शिक्षक उसके शैक्षणिक माहौल तथा संस्थान में उसके अनुभवों के बारे में बता सकते हैं. एक ही व्यक्ति के बारे में अलग-अलग लोगों की जानकारी आपस में मिलाकर देखी जाती है. अगर बयानों में अंतर हो तो उसे दूसरे उपलब्ध रिकॉर्ड और सबूतों के साथ जांचा जाता है.

इस मामले में जातीय भेदभाव के आरोप भी क्यों महत्वपूर्ण होंगे?

साहिल के परिवार ने आरोप लगाया है कि वह जातीय भेदभाव और मानसिक उत्पीड़न का सामना कर रहा था. दूसरी तरफ कुछ छात्रों ने इन आरोपों से असहमति जताई है. पुलिस ने मामले में आत्महत्या के लिए उकसाने और अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून के तहत मामला दर्ज किया है. ऐसे में साइकोलॉजिकल अटॉप्सी का उद्देश्य किसी एक पक्ष के आरोप को सही साबित करना नहीं होगा. उसका काम उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह समझने में मदद करना होगा कि साहिल के जीवन में कौन-कौन से तनाव या परिस्थितियां मौजूद थीं और उनका आपस में क्या संबंध था.



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