हम 3 बार ओम शांति क्यों कहते हैं, श्री श्री रविशंकर से जानिए इसका रहस्य, कैसे ध्यान और अहिंसा बदल सकते हैं आपकी जिंदगी

हम 3 बार ओम शांति क्यों कहते हैं, श्री श्री रविशंकर से जानिए इसका रहस्य, कैसे ध्यान और अहिंसा बदल सकते हैं आपकी जिंदगी


प्राचीन ऋषियों और ज्ञानियों का संदेश था कि शांति ही एकमात्र मार्ग है. भारत में हम तीन बार ‘ओम शांति शांति शांति’ कहते हैं: अपने भीतर की शांति, वातावरण की शांति और राष्ट्रों के बीच की शांति. ये सभी आयाम आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं. यदि किसी इमारत की नींव कमजोर हो, तो वह इमारत मजबूत कैसे हो सकती है? शांतचित्त व्यक्ति एक शांत परिवार का निर्माण करते हैं और ऐसे शांत परिवार एक शांत समाज बनाते हैं. जब तक प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में शांति स्थापित नहीं हो जाती, तब तक विश्व शांति की स्थापना होना संभव नहीं है. हर परिवार में कुछ कठिन क्षण आते हैं जब टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है. हम अलग-अलग विचारों वाले भिन्न व्यक्ति हैं और कभी-कभी इन विचारों में टकराव होता है. परंतु जो बात हमें जोड़े रखती है, वह है अपनेपन और समुदाय की भावना.

विश्व से अपनेपन की भावना कैसे उत्पन्न करें
हम इस अपनेपन की भावना को कैसे उत्पन्न कर सकते हैं? इसका उत्तर है – ध्यान. ध्यान हमें तनाव से मुक्त होने में सहायता करता है और हमें संपूर्ण विश्व के साथ जुड़ाव का अनुभव कराता है. जब हम तनाव में होते हैं, तो हमारी सोच और हमारा दृष्टिकोण अत्यंत संकुचित हो जाता है. जब हम तनाव या चिंता से घिरे होते हैं, तो हम गलत निर्णय ले सकते हैं जिन पर हमें बाद में पछताना पड़ता है. एक शांत मस्तिष्क और स्पष्ट दृष्टि प्राप्त करने के लिए हमें विश्राम की आवश्यकता है और ध्यान वास्तव में यही विश्राम है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज सबसे बड़ी चुनौती लोगों का मानसिक स्वास्थ्य है और हम इसे प्रत्यक्ष देख रहे हैं. हम देख रहे हैं कि घरों में कलह और विवाद बढ़ रहे हैं. लोग आक्रामक स्वभाव के हो रहे हैं या फिर अवसाद का शिकार हो रहे हैं.

शांति के प्रति पूर्ण समर्पण जरूरी
जब आप स्वयं को शक्तिहीन और निराश अनुभव करते हैं, यही वह क्षण है जब हमें यह कहना चाहिए: “मैं शांति का समर्थन करता हूं.” जब प्रत्येक व्यक्ति शांति के प्रति अपना पूर्ण समर्पण दिखाएगा तब हम कभी असहाय महसूस नहीं करेंगे. प्रत्येक व्यक्ति के भीतर असीम आंतरिक शक्ति विद्यमान है. किसी भी कार्य को करने में सबसे अधिक महत्व इस बात का होता है कि लोग किस मानसिक अवस्था में हैं. क्या यह एक सकारात्मक और रचनात्मक मनःस्थिति है या फिर नकारात्मक और विनाशकारी. ‘विश्व संस्कृति महोत्सव’ में, केवल 10 मिनट के लिए वर्षा हुई थी, लेकिन मंच पर उपस्थित हजारों नर्तक भीग गए थे. वहां 30,000 नर्तक थे. वे उन गीले कपड़ों में भी नृत्य करते रहे. किसी ने कोई शिकायत नहीं की, सबने नृत्य किया, यह सब मन की अवस्था पर निर्भर करता है. किसी भी प्रकार का निर्णय लेने में, मनःस्थिति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है, इसलिए ध्यान आवश्यक है. ध्यान आपके मस्तिष्क को कुशाग्र बनाता है, भावनाओं को शांत करता है, जिससे आप स्पष्ट निर्णय लेने में सक्षम हो पाते हैं. आपका दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है और आप स्वयं को एक जीवंत व ऊर्जावान रूप में अनुभव करते हैं. ध्यान के प्रभाव है से हम उत्कृष्ट मनःस्थिति प्राप्त कर पाते हैं.

अहिंसा के बिना शांति नहीं
जब आपके भीतर, चेतना और मन में अहिंसा भली-भांति स्थापित हो जाती है, तो उसका परिणाम यह होता है कि आपकी उपस्थिति में लोग अपनी हिंसक प्रवृत्तियां खोने लगते हैं. शांत रहना और अहिंसा के सिद्धांत को अपने भीतर आत्मसात करना, आपको एक शांतिदूत बना सकता है. यदि आपके भीतर अहिंसा नहीं है, तो आप शांति स्थापित नहीं कर सकते. कुछ लोगों के भीतर इतना अधिक आक्रोश होता है कि वे कभी भी किसी सुखद निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाते. हमारे जीवन में अहिंसा का स्तर जितना अधिक होगा, दूसरों के भीतर की आक्रामकता और घृणा उतनी ही कम हो जाती है. अहिंसा बहुत बड़े कार्य कर सकती है. स्वतंत्रता को प्राप्त करना एक बहुत बड़ा संघर्ष था. जब महात्मा गांधी ने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्त करने का मार्ग अहिंसा और शांतिपूर्ण संघर्ष है, तो लोग उन पर हंसे. क्योंकि उस काल में ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य कभी अस्त नहीं होता था, हांगकांग से लेकर कनाडा तक, हर जगह ब्रिटिश साम्राज्य का ही विस्तार था. एक साधारण मनुष्य, जो यह भी नहीं जानता कि तलवार कैसे चलाई जाती है, वह इतने बड़े साम्राज्य के विरुद्ध कैसे खड़ा हो सकता है? किंतु महात्मा गांधी का सदैव यह दृढ़ विश्वास रहा कि शांति के लिए संघर्ष का मार्ग अहिंसा ही है. एक-एक करके लोग उनके साथ जुड़ते गए, वे आगे बढ़ते रहे और इस प्रकार उन्होंने वह लक्ष्य प्राप्त किया जिसे आज हम स्वतंत्रता के इतिहास के रूप में जानते हैं. यदि आपके भीतर अहिंसा का भाव है, तो केवल मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी और प्रकृति भी उसके प्रति संवेदनशील होती हैं.

ध्यान से अहिंसा
जब आप ध्यान की गहरी अवस्था में होते हैं तब आप बहुत शांत और प्रसन्न होते हैं. इस अवस्था में आप कठिन समस्याओं को भी आसानी से सुलझा पाते हैं. आपकी अभिव्यक्ति शब्दों से अधिक स्पंदन के माध्यम से होती है, इसीलिए हमारे स्पंदनों का उन्नत होना बहुत आवश्यक है. यदि कोई व्यक्ति अशांत, बेचैन और बहुत दुखी है, तो वह उस दुख और अशांति को चारों ओर फैला देता है. शांतिपूर्ण व्यक्ति ही शांतिपूर्ण समाज का निर्माण कर सकते हैं. व्यक्तिगत शांति विश्व शांति का आधार है और ध्यान इसे प्राप्त करने का सबसे आसान प्रभावी तरीका है.



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