बदलते फैसले, उठते सवाल और भीतर की हलचल… क्या बिहार की राजनीति कोई नया संकेत दे रही है?

बदलते फैसले, उठते सवाल और भीतर की हलचल… क्या बिहार की राजनीति कोई नया संकेत दे रही है?


पटना. बिहार की राजनीति में इन दिनों तस्वीर कुछ ऐसी है कि एक फैसला पूरी तरह समझ में आए, उससे पहले उसका अगला संस्करण सामने आ जाता है. कभी सरकारी आदेश चर्चा में आता है, फिर उसमें बदलाव खबर बन जाता है. बाढ़ आती है तो राहत के आंकड़े सामने होते हैं, लेकिन जमीन पर सवाल भी साथ-साथ चलते हैं. शिक्षक भर्ती हो या कानून-व्यवस्था, हर मुद्दे की अपनी कहानी है और हर कहानी के साथ राजनीति का एक नया अध्याय जुड़ जाता है. दिलचस्प यह है कि कहानी सिर्फ जनता, सरकार और विपक्ष के बीच नहीं है. सत्ता के खेमे में भी अलग-अलग सुर सुनाई दे रहे हैं. बिहार की राजनीति में फिलहाल पटकथा कम और फुटनोट ज्यादा हैं. एक तरफ सरकार अपने काम का हिसाब बता रही है, दूसरी तरफ विपक्ष उसी हिसाब की दूसरी व्याख्या कर रहा है. बीच में फैसलों का बदलना, नेताओं के बयान और चुनावी नतीजे अपनी-अपनी कहानी कह रहे हैं.

बिहार में सम्राट चौधरी सरकार के सामने इन दिनों कई मोर्चों पर चुनौतियां दिखाई दे रही हैं. कानून-व्यवस्था से लेकर बाढ़ राहत, छात्रों से जुड़े फैसलों और शिक्षक भर्ती तक, अलग-अलग मुद्दों पर सरकार को सफाई देनी पड़ी है या अपने फैसलों में बदलाव करना पड़ा है. खास बात यह है कि सवाल सिर्फ विपक्ष की तरफ से नहीं उठ रहे, बल्कि सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन से जुड़े नेताओं के बीच मतभेद भी सार्वजनिक होते दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में सवाल यह है कि क्या नई सरकार अपने शुरुआती महीनों में प्रशासनिक संदेश और जनता के भरोसे को लेकर दबाव में है?

बांकीपुर ने दिया पहला बड़ा राजनीतिक संकेत

सम्राट सरकार के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव का नतीजा रहा. बीजेपी के लंबे समय से प्रभाव वाले इस क्षेत्र में जन सुराज के प्रशांत किशोर की जीत ने बिहार की राजनीति में एक नया समीकरण सामने रखा. इसके बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने खुद बांकीपुर के नतीजे को लेकर कहा कि उनसे गलती हुई. यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि प्रशांत किशोर ने प्रचार के दौरान सीधे सम्राट चौधरी और बीजेपी को निशाने पर रखा था. अगस्त में मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत, डीजीपी विनय कुमार और दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों के साथ प्रशांत किशोर की बैठक हुई. एक निर्वाचित विधायक और राज्य के शीर्ष अधिकारियों के बीच इस तरह की बैठक को राजनीतिक गलियारों में खास तौर पर देखा गया. यानी सरकार के सामने एक ऐसा नया राजनीतिक खिलाड़ी है, जो सदन के भीतर से प्रशासनिक मुद्दों पर सवाल उठाने की स्थिति में है.

अपराध के सवाल पर सरकार की परीक्षा

सम्राट सरकार के सामने सबसे संवेदनशील मुद्दों में कानून-व्यवस्था है. सरकार की ओर से अपराध के खिलाफ बड़े स्तर पर कार्रवाई के आंकड़े भी पेश किए गए हैं. पुलिस के मुताबिक जून-जुलाई में राज्यव्यापी अभियान के दौरान 68 हजार से ज्यादा आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, जबकि जून से अगस्त के बीच गंभीर अपराधों में वांछित 23,958 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया. इसके बावजूद हाल की घटनाएं सरकार के सामने राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती पैदा कर रही हैं. भोजपुर के भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने खुद पुलिस की गलती स्वीकार की और कहा कि जांच में चूक सामने आने के बाद कार्रवाई की गई. मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि पुलिस को काम करने की आजादी होगी, लेकिन पुलिस की गलती को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा.

जमुई की घटना के बाद फिर उठे सवाल

अब जमुई की घटना ने भी कानून-व्यवस्था पर बहस को फिर तेज कर दिया है. बिहार के जमुई में 19 सितंबर की शाम नाबालिग छात्र-छात्रा के साथ सड़क पर बदसलूकी का मामला सामने आया है. जानकारी के मुताबिक, दोनों स्कूटी से कहीं जा रहे थे, तभी कुछ युवकों ने उन्हें रास्ते में रोक लिया. इसके बाद दोनों को घेरकर उनके साथ अभद्रता और मारपीट की गई. वायरल वीडियो में लड़की और लड़का हाथ जोड़कर उन्हें छोड़ देने की गुहार लगाते दिखाई दे रहे हैं. आरोप है कि इस दौरान लड़की के साथ छेड़खानी और अनुचित तरीके से छूने की कोशिश भी की गई. घटना का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया गया, जिसके बाद मामला सामने आया.

हालांकि वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेते हुए पीड़ितों की पहचान की और कार्रवाई शुरू की. मामला राज्य महिला आयोग तक पहुंचा और आरोपियों की गिरफ्तारी भी हुई. यानी सरकार के सामने चुनौती सिर्फ अपराधियों पर कार्रवाई करने की नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं को रोकने और आम लोगों में सुरक्षा का भरोसा कायम रखने की भी है.

बाढ़ ने भी सरकार की तैयारियों की परीक्षा ली

बिहार में इस साल बाढ़ ने सरकार की प्रशासनिक तैयारियों की बड़ी परीक्षा ली है. सितंबर के पहले सप्ताह में राज्य के कई जिलों में गंभीर बाढ़ की स्थिति बनी. एक आकलन के मुताबिक 14 जिलों में करीब 40.51 लाख लोग प्रभावित हुए थे. गंगा ने पटना और भागलपुर में अपने पिछले उच्चतम बाढ़ स्तर को भी पार किया. सरकार ने राहत के तौर पर प्रभावित परिवारों के खातों में 7 हजार रुपये भेजने और फसल नुकसान का घर-घर आकलन कर मुआवजा देने की घोषणा की.

केंद्र की टीम भी नुकसान का आकलन करने बिहार पहुंची. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का जायजा लिया. लेकिन बाढ़ प्रभावित इलाकों में नाराजगी के मामले भी सामने आए. भागलपुर में ग्रामीणों ने लंबे समय से चली आ रही कटाव की समस्या के स्थायी समाधान की मांग की और शिवराज सिंह चौहान के दौरे को लेकर नाराजगी भी सामने आई. यहां सवाल राहत की घोषणाओं से ज्यादा उनके जमीन पर असर का है.

स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड पर 10 दिन में बदला फैसला

सरकार के लिए दूसरा बड़ा झटका उसके फैसलों की स्थिरता को लेकर रहा. बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना में एजुकेशन लोन की सीमा 4 लाख से घटाकर 2 लाख रुपये किए जाने की अधिसूचना जारी हुई. इस पर छात्रों और विपक्ष की तरफ से सवाल उठे. इसके करीब 10 दिन बाद सरकार ने अपना फैसला पलट दिया और फिर से 4 लाख रुपये तक के लोन की व्यवस्था बहाल कर दी. उच्च शिक्षा विभाग ने 19 अगस्त के आदेश को निरस्त करते हुए नई अधिसूचना जारी की. सरकार ने पहले सफाई दी थी कि 2 लाख रुपये तक की राशि राज्य शिक्षा वित्त निगम से और इससे अधिक की जरूरत होने पर पीएम विद्यालक्ष्मी पोर्टल के जरिए बैंक से लोन दिलाने की व्यवस्था होगी. लेकिन बाद में पुरानी व्यवस्था बहाल करनी पड़ी. राजनीतिक तौर पर यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सरकार के फैसले और उसके बाद होने वाले पुनर्विचार को लेकर बहस छिड़ी.

शिक्षक भर्ती में भी सरकार को बदलना पड़ा रुख

बिहार में शिक्षक भर्ती को लेकर भी सरकार को छात्रों के दबाव का सामना करना पड़ा. TRE-4 में परीक्षा के पैटर्न को लेकर अभ्यर्थी आंदोलन कर रहे थे. अगस्त में पटना में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव तक की स्थिति बनी. अभ्यर्थी एकल परीक्षा, पारदर्शिता और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े कई सवाल उठा रहे थे. इसके बाद सरकार ने TRE-4 को सिंगल फेज में कराने का फैसला लिया. साथ ही परीक्षा सुधार के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने, अलग-अलग भर्ती परीक्षाओं से जुड़ी शिकायतों की समीक्षा और स्टूडेंट असिस्टेंस पोर्टल जैसी व्यवस्थाओं की घोषणा की गई. TRE-4 की प्रक्रिया में भी बदलाव देखने को मिला. सितंबर में शुरू होने वाली आवेदन प्रक्रिया को पहले टाला गया और बाद में संशोधित तारीख जारी की गई. 32,388 शिक्षक पदों पर भर्ती प्रस्तावित है. यानी सरकार को एक तरफ छात्रों का आंदोलन संभालना पड़ा, दूसरी तरफ परीक्षा व्यवस्था में बदलाव भी करना पड़ा.

अब सवाल सरकार के भीतर की सियासत का

सरकार के लिए चुनौती सिर्फ प्रशासनिक मुद्दों तक सीमित नहीं है. सत्तारूढ़ जेडीयू में भी अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच विवाद सार्वजनिक हो चुका है. नीरज कुमार ने अनंत सिंह पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और स्वास्थ्य मंत्री निशांत के नेतृत्व के खिलाफ जाने का आरोप लगाया. इसके बाद पार्टी को दोनों नेताओं के बीच विवाद सुलझाने की कोशिश करनी पड़ी. जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा को भी सार्वजनिक तौर पर यह कहना पड़ा कि पार्टी में कोई मतभेद नहीं है और विवाद को सुलझाने की कोशिश की जा रही है. यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार के सामने विपक्ष के सवालों के साथ-साथ गठबंधन और पार्टी के भीतर समन्वय बनाए रखने की चुनौती भी दिखाई दे रही है.

घोषणाओं से आगे जमीन पर असर की चुनौती

सम्राट सरकार ने शुरुआती दौर में कई बड़े फैसलों और घोषणाओं के जरिए अपनी प्राथमिकताएं बताई हैं. बाढ़ राहत, परीक्षा सुधार, भर्ती प्रक्रिया में बदलाव और जनशिकायतों के समाधान को लेकर सरकार लगातार सक्रियता दिखा रही है. मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को नागरिकों की शिकायतों का समयबद्ध तरीके से समाधान करने का निर्देश भी दिया है. लेकिन राजनीति में घोषणाओं के साथ उनका असर भी महत्वपूर्ण होता है. बाढ़ पीड़ितों को राहत कितनी तेजी से मिलती है, अपराध पर कार्रवाई के साथ अपराध की घटनाओं में कमी आती है या नहीं, छात्रों की भर्ती परीक्षाओं को लेकर भरोसा कितना लौटता है और सरकारी योजनाओं में बार-बार बदलाव की स्थिति दोबारा आती है या नहीं- इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सरकार की छवि को प्रभावित कर सकते हैं.

भारत तिवारी केस में सरकार ने मानी चूक

सम्राट चौधरी सरकार के सामने फिलहाल तस्वीर दोहरी है. एक तरफ सरकार अपराधियों पर कार्रवाई के आंकड़े, बाढ़ राहत और परीक्षा सुधार जैसे कदम गिना रही है. दूसरी तरफ जमुई जैसी घटनाएं, भरत तिवारी एनकाउंटर में सीएम सम्राट चौधरी ने खुद पुलिस की चूक की बात स्वीकार की. बाढ़ प्रभावित इलाकों की नाराजगी, स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड के फैसले में पलटाव और शिक्षक भर्ती को लेकर आंदोलन सरकार की प्रशासनिक क्षमता और फैसलों की स्थिरता पर सवाल खड़े करते हैं.

असली चुनौती भरोसे की

हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि सरकार के खिलाफ जनता का भरोसा तय तौर पर खत्म हो गया है. लेकिन इन घटनाओं ने सरकार के सामने एक साफ चुनौती जरूर खड़ी कर दी है- घोषणाओं और फैसलों को जमीन पर लागू कर यह भरोसा कायम करना कि सरकार सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं दे रही, बल्कि समस्याओं का स्थायी समाधान भी कर रही है. आने वाला समय इसलिए सम्राट सरकार के लिए सिर्फ प्रशासन चलाने का नहीं, बल्कि अपने फैसलों की विश्वसनीयता, कानून-व्यवस्था और गठबंधन के भीतर समन्वय के जरिए जनता के भरोसे को मजबूत करने की परीक्षा भी होगा.



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