भारत थोरियम से बिजली बनाए तो क्या बदलेगा…? न्यूक्लियर साइंटिस्ट ने बताया
Agency:एजेंसियां
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यूरेनियम की मांग दुनिया में तेजी से बढ़ रही है. पिछले साल ही दुनिया भर में यूरेनियम का उत्पादन जितना हुआ उससे 9 हजार टन ज्यादा खपत हुई. ये मांग आने वाले सालों में दो से तीन गुना तक बढ़ सकती है. न्यूक्लियर साइंटिस्ट अनिल काकोदकर के मुताबिक भारत न्यूक्लियर पावर प्लांट में थोरियम का ऊर्जा के तौर पर इस्तेमाल कर यूरेनियम की जरूरत को घटा सकता है.
भारत को न्यूक्लियर पावर प्लांट में थोरियम का इस्तेमाल शुरू कर देना चाहिए. वैज्ञानिक अनिल काकोदकर ने इसकी वकालत की है. (फोटो-pixabay)
ईरान-अमेरिका वॉर में असली लड़ाई यूरेनियम की है. अमेरिका को शक है कि ईरान इससे परमाणु हथियार बना सकता है. मगर यूरेनियम का प्रयोग सिर्फ इतना नहीं है. ये ऐसा पदार्थ है जिसका सबसे ज्यादा प्रयोग परमाणु रिएक्टरों में बिजली बनाने के लिए होता है. पिछले साल ही दुनिया के परमाणु रिएक्टरों में तकरीबन 68 हजार टन यूरेनियम से बिजली बनाई गई, जबकि उत्पादन महज 60 हजान टन ही हुआ. आने वाले वक्त में इसकी जरूरत डेढ़ लाख टन के आसपास तक हो सकती है. यूरेनियम कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिहाज से भारत में ही अभी तकरीबन 1800 टन यूरेनियम की जरूरत है जो आने वाले कुछ सालों में बढ़कर 5400 टन तक पहुंच सकती है. ऐसे में बड़ा सवाल है कि यूरेनियम की जरूरत कैसे पूरी होगी.
भारत के टॉप परमाणु वैज्ञानिक और परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष अनिल काकोदकर ने इसका विकल्प सुझाया है. इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में उन्होंने कहा कि भारत थोरियम के इस्तेमाल को तेज कर भविष्य में होने वाली ऊर्जा की जरूरतों को पूरा कर सकता है. उन्होंने कहा कि भारत को अपने स्वदेशी प्रेसराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर यानी PHWR में थोरियम बेस्ड फ्यूल का इस्तेमाल शुरू करने की दिशा में आगे आना चाहिए. इसके साथ ही थ्री स्टेज न्यूक्लियर एनर्जी प्रोग्राम भी जारी रखना चाहिए.
यूरेनियम की कमी को थोरियम कर सकता है पूरा
परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोदकर के मुताबिक 1950 में होमी जहांगीर भाभा ने थ्री स्टेज न्यूक्लियर एनर्जी प्रोग्राम को पेश किया था, जिसका लक्ष्य थोरियम जैसे वैकल्परिक परमाणु ईंधन की भूमिका को बढ़ाना था. एक्सप्रेस से बातचीत में उन्होंने कहा कि भारत में परमाणु रिएक्टर सिर्फ बिजली उत्पादन का माध्यम नहीं है, वे बिजली पैदा करन के साथ-साथ आगे के परमाणु ईंधन बनाने में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं. प्रेसराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर इसके लिए सबसे सही प्लेटफॉर्म हैं.
दुनिया में कितनी है यूरेनियम की मांग?
वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में यूरेनियम की मांग तेजी से बढ़ रही है. 2040 तक इसकी डिमांड डेढ़ से दो लाख टन तक हो सकती है, जबकि अभी दुनियार भर में इस आइसोटोप का खनन महज 60 हजार टन ही हो रहा है. वर्तमान में ही दुनिया भर के न्यूक्लिकयर प्लांटों में 69 हटार टन यूरेनियम की जरूरत है, जो सेकेंडरी सोर्सेज से पूरी की जा रही है. वैज्ञानिक काकोदकर भी इसे मानते हैं. वह कहते हैं कि परमाणु ऊर्जा का प्रमुख सोर्स यूरेनियम ही है, लेकिन जिस तरह से मांग बढ़ रही है उस हिसाब से अगले 10 से 15 साल में इसकी डिमांड और सप्लाई के बीच असंतुलन होना तय है.
क्या है थ्री स्टेज न्यूक्लियर एनर्जी प्रोग्राम
भारत का थ्री स्टेज न्यूक्लियर एनर्जी प्रोग्राम के तहत धीरे-धीरे थोरियम के प्रयोग को बढ़ाना है. वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा ने 1950 में इसे बनाया था. इसमें पहले चरण में PHWR से यूरेनियम से बिजली बनाने और प्लूटोनियम तैयार किया जाए. दूसरे चरण में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर प्लूटोनियम का इस्तेमाल करना है और तीसरे चरण में थोरियम को फ्यूल के तौर पर इस्तेमाल कर यूरेनियम-233 बनाया जाए और फिर उससे बिजली बनाने की योजना है. अभी भारत पहले चरण में है और दूसरे चरण पर काम शुरू कर रहा है. वैज्ञानिक अनिल काकोदकर का कहना है कि तीसरे चरण का इंतजार करने की जरूरत नहीं है, भारत को अभी से ही थोरियम का इस्तेमाल शुरू कर देना चाहिए.
थोरियम क्या है और कहां मिलता है?
थोरियम एक नेचुरल रेडियोधर्मी पदार्थ है, जो पमरणु ऊर्जा में उपयोग किया जा सकता है. यूरेनियम के लिहाज से देखें तो भारत के पास थोरियम के बड़े भंडार हैं. यह मोनाजाइट नाम के खनिज में पाया जाता है. खासकर केरल, तमिलनाडु और ओडिशा के तटीय इलाकों में है ये खनिज बड़ी मात्रा में है. हालांकि ये सीधा फ्यूल के तौर पर प्रयोग नहीं किया जा सकता. पहले इसे प्रोसेस कर यूरेनियम-233 आइसोटोप में बदलना होगा. अगर भारत ऐसा करता है तो यूरेनियम पर उसकी निर्भरता धीरे धीरे खत्म हो जाएगी. हालांकि इसकी अपनी चुनौतियां भी हैं, वह यह कि थोरियम आधारित तकनीक अभी तक सीमित स्तर पर ही विकसित हुई है.
थोरियम के प्रयोग से क्या बदलेगा?
- भारत के पास यूरेनियम का सीमित भंडार है. अपनी जरूरतों के लिए भी भारत को इसे आयात करना पड़ता है, जबकि थोरियम बहुत ज्यादा मात्रा में है. ऐसे में अगर प्रयोग सफल होता है तो भारत की यूरेनियम पर निर्भरता घट जाएगी.
- भारत के पास जो थोरियम है उससे सैकड़ों साल तक परमाणु ईंधन बनाया जा सकता है. यानी लंबे समय तक भारत को बिजली बनाने के लिए परमाणु ईंधन आयात करने की जरूरत नहीं होगी.
- भारत के थ्री स्टेज न्यूक्लियर प्रोग्राम में थोरियम के प्रयोग की बात 1950 में ही कही गई थी, अगर ऐसा किया जाता है तो हम इस प्रोग्राम के तीसरे और अंतिम स्टेट तक समय से पहले पहुंच सकते हैं.
- दुनिया में तकरीबन सभी परमाणु रिएक्टर यूरेनियम पर आधारित हैं, अगर भारत थोरियम से ऐसा कर पाता है तो वह तकनीकी बढ़त हासिल कर लेगा और ऐसा करने वाला पहला देश बन सकता है.