तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने 17 सितंबर को विधानसभा में पूर्व मुख्यमंत्री केसीआर पर हमला करते हुए उनके बिहार से आने का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि केसीआर बिहार से आए और तेलंगाना को लूटने की कोशिश की. केसीआर पर हमला इस बयान का राजनीतिक संदर्भ हो सकता है, लेकिन बिहार का नाम इसमें क्यों आया, और यही वह सवाल है जिसने बहस को तेलंगाना से बाहर ला दिया है. बता दें कि इससे पहले 2023 में भी रेवंत रेड्डी के ‘बिहार डीएनए’ वाले बयान पर बड़ा विवाद हुआ था. अब दोबारा बिहार का संदर्भ आने के बाद सवाल सिर्फ रेवंत बनाम केसीआर का नहीं रह गया है. सवाल यह भी है कि देश की राजनीति में बिहार और बिहारियों की पहचान को विरोधी पर हमले के राजनीतिक मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल करना आखिर किस दिशा की ओर इशारा करता है.
सवाल सिर्फ रेवंत के बयान का नहीं
हालांकि, यहां तथ्य यह भी है कि रेवंत रेड्डी और केसीआर की राजनीतिक लड़ाई पुरानी है और इस समय तेलंगाना में जमीन और संपत्ति के मुद्दे को लेकर कांग्रेस सरकार और बीआरएस के बीच टकराव भी तेज है. रेवंत सरकार ने केसीआर और उनके परिवार से जुड़ी जमीनों की जांच की बात कही है, जबकि बीआरएस इसे राजनीतिक कार्रवाई के तौर पर देखता है. ऐसे माहौल में केसीआर की नीतियों या कथित गड़बड़ियों पर हमला राजनीतिक बहस का हिस्सा है. लेकिन उसी हमले में बिहार को जोड़ देने से मामला क्षेत्रीय पहचान तक पहुंच जाता है. यही वजह है कि यह सवाल महत्वपूर्ण है कि देश के एक हिस्से के लोगों की पहचान को दूसरे प्रदेश की राजनीति में विरोधी के खिलाफ इस्तेमाल करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ती है. असल में यह सवाल केवल बिहार के लिए ही नहीं है, बल्कि भारत की राजनीति में ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ का यह सवाल कई राज्यों में अलग-अलग रूप में सामने आता रहा है.
महाराष्ट्र ने इस राजनीति को बहुत करीब से देखा
महाराष्ट्र इसका सबसे चर्चित उदाहरण के तौर पर हमारे सामने है. वहां मराठी अस्मिता की राजनीति का एक लंबा इतिहास है. पहले दक्षिण भारतीयों को लेकर आंदोलन हुए और बाद में रोजगार और स्थानीय पहचान के सवाल पर उत्तर भारतीय, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार से आए लोगों को निशाना बनाया गया. राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना इसी राजनीति के सबसे प्रमुख चेहरों में रही है. लेकिन यहां भी तस्वीर को सिर्फ एक बयान या एक मुद्दे से समझना ठीक नहीं होगा. मनसे को 2009 के विधानसभा चुनाव में 13 सीटें मिली थीं. इसके बाद उसका विधानसभा में प्रतिनिधित्व लगातार घटता गया और 2024 के चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी. यह चुनावी सफर जरूर बताता है कि जिस राजनीति को कभी बड़ा जनसमर्थन मिला था, उसका प्रभाव समय के साथ बदला है.
हालांकि, इसका पूरा कारण केवल उत्तर भारतीय विरोध को मान लेना चुनावी आंकड़ों से साबित नहीं होता. लेकिन, दिलचस्प यह भी है कि 2025 में जब मराठी भाषा और पहचान का मुद्दा फिर गर्म हुआ तो राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे एक मंच पर दिखाई दिए. यानी क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति खत्म नहीं हुई, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों के साथ उसका रूप भी बदलता रहा है.
तमिलनाडु में सवाल भाषा का रहा, बिहार का नाम भी आया
तमिलनाडु की राजनीति में मामला थोड़ा अलग है और वहां हिंदी विरोध और तमिल पहचान का सवाल दशकों पुराना है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जब हिंदी को लेकर राजनीतिक बयान तेज हुए तो बिहार और भोजपुरी जैसे शब्द भी बहस में आ गए. उदयनिधि स्टालिन के हिंदी को लेकर दिए गए बयानों में भोजपुरी और बिहार जैसी भाषाई पहचान का संदर्भ आया. यह बहस मूल रूप से हिंदी के प्रसार और तमिल पहचान से जुड़ी थी, लेकिन बिहार का नाम आने से बिहारियों की पहचान भी चर्चा में आ गई, और अब 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के आंकड़े सामने हैं. चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार डीएमके को 2026 के विधानसभा चुनाव में 59 सीटें मिलीं और वह सत्ता से बाहर हो गई. जबकि उदारवादी मानी जाने वाली थलपति विजय की पार्टी टीवीके ने 108 सीटें जीतीं और सत्ता पर काबिज है.
बिहार के मामले में फर्क इसलिए भी बड़ा
दरअसल, बिहार का सवाल इसलिए थोड़ा संवेदनशील और थोड़ा अलग है, क्योंकि यहां से देश के लगभग हर बड़े शहर में लोग रोजगार, कारोबार और पढ़ाई के लिए जाते हैं. मुंबई से दिल्ली, सूरत से हैदराबाद और चेन्नई तक बिहार के लोगों की बड़ी मौजूदगी है. ऐसे में बिहार की पहचान पर की गई राजनीतिक टिप्पणी का असर केवल बिहार की सीमा के भीतर नहीं रहता.
महाराष्ट्र में गैर-मराठी लोगों के खिलाफ विवादों के दौरान भी यही सवाल उठा है. 2025 में नांदेड़ में एक हिंदी भाषी बस कर्मचारी के साथ कथित मारपीट का मामला सामने आया था, जिसे मराठी न बोलने से जोड़ा गया. ऐसे मामले बताते हैं कि भाषा और स्थानीय पहचान का सवाल जब राजनीतिक नारों से निकलकर रोजमर्रा की जिंदगी में पहुंचता है तो उसका असर ज्यादा गंभीर हो सकता है.
असली परीक्षा राजनीतिक दलों की भी
ऐसे में यहीं से बिहार की पार्टियों और राष्ट्रीय गठबंधनों की भूमिका भी सवालों में है. बिहार के कई प्रमुख दल राष्ट्रीय गठबंधनों का हिस्सा हैं. इसलिए अगर किसी सहयोगी दल के बड़े नेता के बयान पर बिहार की पहचान से जुड़ा विवाद खड़ा होता है तो सवाल केवल बयान देने वाले नेता से नहीं, गठबंधन से भी पूछा जाता है. ऐसे में सहयोगी दलों के लिए ऐसे मौकों पर अपनी राजनीतिक स्थिति साफ करना जरूर महत्वपूर्ण हो जाता है.
राजनीति में प्रदेश की पहचान हथियार बने या मुद्दा
रेवंत रेड्डी का बयान इसलिए चर्चा में है क्योंकि इसमें एक बड़ा राजनीतिक सवाल छिपा है. केसीआर पर हमला करने के लिए तेलंगाना के संसाधन, जमीन और शासन का मुद्दा पर्याप्त था. फिर उस लड़ाई में बिहार का संदर्भ क्यों आया, इसका जवाब रेवंत रेड्डी की राजनीतिक मंशा के बारे में अनुमान लगाए बिना भी पूछा जा सकता है. दरअसल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के अनुभव बताते हैं कि भाषा, स्थानीय पहचान और ‘बाहरी’ बनाम ‘स्थानीय’ की राजनीति भारतीय लोकतंत्र में लगातार मौजूद रही है. कभी यह चुनावी मुद्दा बनती है, कभी आंदोलन का आधार और कभी नेताओं के भाषण का हिस्सा.
हालांकि, चुनावी आंकड़े यह भी बताते हैं कि किसी भी पार्टी का उत्थान या पतन कई सामाजिक, संगठनात्मक और राजनीतिक कारणों से तय होता है. इसलिए रेवंत रेड्डी के बयान को केवल बिहार पर टिप्पणी मानकर छोड़ देना भी अधूरा होगा और इसे किसी पार्टी के चुनावी भविष्य का प्रमाण मान लेना भी. असली बहस इससे बड़ी है. राजनीतिक विरोध की सीमा कहां खत्म होती है और किसी पूरे प्रदेश की पहचान को निशाना बनाने की सीमा कहां से शुरू होती है. लोकतंत्र में राजनीतिक असहमति जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी यह भी है कि एक राज्य की राजनीतिक लड़ाई में दूसरे राज्य के करोड़ों लोगों की पहचान को अनावश्यक रूप से न घसीटा जाए.