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Piyushbhai Desai Death : वाघ बकरी टी ग्रुप के चेयरमैन पीयूषभाई देसाई का निधन हो गया है. अपने दादा और पिता से मिले गांधीवादी संस्कार को पीयूषभाई ने जीवन भर जिया. वे गांधीजी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत के पक्के पैरोकार थे. उन्होंने पुरानी परंपराओं और आधुनिक मार्केटिंग का ऐसा तालमेल बैठाया कि कंपनी का सालाना टर्नओवर 2,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया.
पीयूषभाई वाघ-बकरी ग्रुप के संस्थापक नारणदास देसाई के पोते थे.
नई दिल्ली. टाटा और हिन्दुस्तान यूनीलीवर के बाद देश के तीसरे सबसे बड़े चाय ब्रांड ‘वाघ बकरी टी ग्रुप’ के चेयरमैन पीयूषभाई देसाई का 15 सितंबर को 86 वर्ष की आयु में निधन हो गया. छह दशकों से अधिक समय तक भारतीय चाय उद्योग को दिशा देने वाले पीयूषभाई केवल एक सफल उद्योगपति नहीं थे, बल्कि गांधीवादी जीवनशैली और सामाजिक चेतना के प्रतीक भी थे. पीयूषभाई वाघ-बकरी ग्रुप के संस्थापक नारणदास देसाई के पोते थे. जिस दौर में व्यापार का एकमात्र मकसद मुनाफा कमाना माना जाता था, उस दौर में पीयूषभाई ने नैतिक मूल्यों, सामाजिक सरोकारों और सादगी को अपने व्यवसाय का आधार बनाया. इसी साल की शुरुआत में ‘नॉर्थ ईस्टर्न टी एसोसिएशन’ (NETA) ने उन्हें भारतीय चाय उद्योग में अभूतपूर्व योगदान के लिए ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से नवाजा था.
देसाई परिवार का राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से रिश्ता पीयूषभाई के दादा नरेनदास देसाई के समय से जुड़ा था. नरेनदास 1892 में दक्षिण अफ्रीका में 500 एकड़ के चाय बागान के मालिक थे, जहां वे रंगभेद के खिलाफ लड़ाई में गांधीजी के संपर्क में आए. जब नरेनदास भारत लौटे, तो गांधीजी ने उनके लिए एक सिफारिशी पत्र लिखा था, जिसने भारत में उनके चाय व्यापार की नींव रखी.
ट्रस्टशिप सिद्धांत के पैरोकार थे पीयूषभाई
अपने दादा और पिता से मिले गांधीवादी संस्कार को पीयूषभाई ने जीवन भर जिया. वे गांधीजी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत के पक्के पैरोकार थे. गुजरात विद्यापीठ से उनका गहरा जुड़ाव रहा. उन्होंने गांधीवादी विचारक नारायण देसाई के साथ मिलकर ‘अनुवाद फाउंडेशन’ बनाया, ताकि महात्मा गांधी और महादेवभाई देसाई की रचनाओं व डायरियों का प्रामाणिक अनुवाद हो सके. 2016 से 2020 तक वे ‘ब्लाइंड पीपल्स एसोसिएशन’ (BPA) के अध्यक्ष भी रहे.
वाघ बकरी ब्रांड को दी नई ऊंचाईयां
पीयूषभाई देसाई ने वाघ बकरी चाय को न सिर्फ भारत के 20 से अधिक राज्यों में घर-घर पहुंचाया, बल्कि दुनिया के 30 से अधिक देशों में भारतीय चाय का स्वाद स्थापित किया. उन्होंने पुरानी परंपराओं और आधुनिक मार्केटिंग का ऐसा तालमेल बैठाया कि कंपनी का सालाना टर्नओवर 2,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया. आज टाटा और एचयूएल के बाद ‘वाघ बकरी’ देश का तीसरा सबसे बड़ा चाय ब्रांड है, जिसकी गुजरात में 70% और देशभर में करीब 20% बाजार हिस्सेदारी है.
भारतीय चाय उद्योग की मजबूत रीढ़
पीयूषभाई ने चाय उद्योग को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई. वे गुजरात टी ट्रेडर्स एसोसिएशन (GTTA), वेस्टर्न इंडिया टी डीलर्स एसोसिएशन (WITDA) और फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया टी ट्रेडर्स एसोसिएशन्स (FAITTA) के संस्थापक सदस्यों में से थे. इसके साथ ही, 1998 से 2002 तक उन्होंने भारतीय चाय बोर्ड (Tea Board of India) के सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं दी.
हिंसा के खिलाफ उठाई आवाज
पीयूषभाई कॉरपोरेट जगत की उन बेहद दुर्लभ शख्सियतों में से थे, जो सामाजिक मुद्दों पर कभी मौन नहीं रहे. साल 2002 के गुजरात दंगों के दौरान हुईं हिंसा के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई. उनका मानना था कि हिंसा किसी समस्या का हल नहीं बल्कि पूरे समाज की विफलता है. उस समय उन्होंने शांति मार्च में हिस्सा लिया था.