मुगलकाल में बनी आगरा की जामा मस्जिद के 8 अनसुने किस्से बहुत हैं रोचक, जानें

मुगलकाल में बनी आगरा की जामा मस्जिद के 8 अनसुने किस्से बहुत हैं रोचक, जानें


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Jama Masjid Agra: आगरा की जामा मस्जिद का निर्माण जहांआरा बेगम ने कराया था. वह मुग़ल बादशाह शाहजहां की बड़ी बेटी और मुगल दरबार की प्रभावशाली शख्सियत थीं. इतिहासकार ने बताया कि शाहजहां के आदेश से आगरा में नई जामा मस्जिद बनाने की योजना बनी थी, जिसके बाद जहांआरा ने इसके निर्माण का जिम्मा लिया. उन्होंने कहा कि निर्माण पर करीब पांच लाख रुपये खर्च हुए थे. सन 1648 में इसका निर्माण पूरा हुआ और यह आगरा की प्रमुख धार्मिक इमारतों में शामिल हो गई.

आगरा की जामा मस्जिद का निर्माण जहांआरा बेगम ने कराया था. वह मुग़ल बादशाह शाहजहां की बड़ी बेटी और मुगल दरबार की प्रभावशाली शख्सियत थीं. इतिहासकार ने बताया कि शाहजहां के आदेश से आगरा में नई जामा मस्जिद बनाने की योजना बनी थी, जिसके बाद जहांआरा ने इसके निर्माण का जिम्मा लिया. उन्होंने कहा कि निर्माण पर करीब पांच लाख रुपये खर्च हुए थे. सन 1648 में इसका निर्माण पूरा हुआ और यह आगरा की प्रमुख धार्मिक इमारतों में शामिल हो गई.

इतिहासकार अनुराग पालीवाल ने बताया कि मस्जिद का निर्माण सन 1643 में शुरू हुआ और करीब पांच वर्ष बाद 1648 में पूरा हुआ था. इसे आगरा किले के दिल्ली गेट के सामने विकसित किए जा रहे इलाके के साथ जोड़ा गया था. मस्जिद के आसपास उस समय एक बड़ा चौक और बाजार क्षेत्र भी था. इसका निर्माण उस दौर में हुआ जब शाहजहां के शासन में आगरा में कई भव्य इमारतों और शाही परियोजनाओं का निर्माण कार्य भी चल रहा था.

जामा मस्जिद की सबसे खास पहचान इसकी लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से बनी वास्तुकला है. इतिहासकार ने बताया कि मस्जिद ऊंचे चबूतरे पर बनी है और इसके विशाल आंगन के आसपास मेहराबदार गलियारे दिखाई देते हैं. मुख्य प्रार्थना कक्ष के ऊपर तीन बड़े गुम्बद हैं. गुम्बदों पर लाल और सफेद पत्थरों की पट्टियों से बनाई गई जिग-जैग शैली इसकी खूबसूरती को और भी अधिक बढ़ाती है.

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यहां तीन गुम्बद हैं, लेकिन दिल्ली की जामा मस्जिद की तरह ऊंची मीनारें नहीं हैं. मुख्य गुम्बद सबसे बड़ा और ऊंचा है. गुम्बदों के ऊपर कमल और कलश जैसी आकृतियों वाले अलंकरण दिखाई देते हैं. इतिहासकार अनुराग पालीवाल कहते है कि कुछ ऐतिहासिक स्थापत्य विवरणों में इसे शाहजहांकालीन मुगल वास्तुकला की विशिष्ट शैली का उदाहरण बताया जाता है.

आगरा की जामा मस्जिद के मुख्य प्रवेश द्वार और वास्तु सज्जा में फारसी शिलालेख भी मिलते हैं. इतिहासकार ने कहा कि इनमें शाहजहां और जहांआरा की प्रशंसा से जुड़े विवरण दर्ज हैं. मुख्य मेहराब के आसपास सफेद संगमरमर में काले पत्थर की जड़ाई से लिखावट की गई है. यही शिलालेख मस्जिद के निर्माण और उसके समय को समझने में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रमाणों में गिने जाते है.आज जामा मस्जिद के आसपास का इलाका काफी बदल चुका है. इतिहासकार ने बताया कि मुगलकाल में इसके सामने त्रिपोलिया चौक हुआ करता था. यह क्षेत्र मस्जिद और आगरा किले के बीच महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थान था. इसके आसपास बाजार और रास्ते मौजूद थे. बाद में रेलवे के विस्तार के दौरान इस पुराने चौक का स्वरूप समाप्त हो गया और आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन के विकास के लिए इस क्षेत्र में बदलाव किए गए.

जामा मस्जिद के इतिहास में सन 1857 का दौर भी महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि कुछ ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार उस समय आगरा किले में तैनात ब्रिटिश सैनिकों ने मस्जिद के मुख्य द्वार और उससे जुड़े पूर्वी हिस्से को नुकसान पहुंचाया था. किले के पास होने के कारण इसे सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील माना गया था. हालांकि बाद के वर्षों के आसपास का पूरा इलाका भी काफी बदल गया, जिससे मुगलकालीन मूल स्वरूप का कुछ हिस्सा आज दिखाई नहीं देता है.

करीब चार शताब्दियों से अधिक पुरानी आगरा की जामा मस्जिद आज भी शहर के पुराने मुगल इतिहास की महत्वपूर्ण निशानी है. आगरा किले के सामने स्थित होने के कारण यहां आने वाले पर्यटकों को एक ही क्षेत्र में मुगलकालीन स्थापत्य की कई झलकियां मिलती हैं. लाल पत्थर, संगमरमर की सजावट, तीन गुम्बद, विशाल आंगन और फारसी शिलालेख इसे आगरा की ऐतिहासिक वास्तुकला का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाता है.

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