Saudi Arabia Vs Houthis: सऊदी अरब में शिया Vs सुन्नी की जंग, अरब वर्ल्ड के मुसलमानों के बीच गजब घमासान मचने वाला है?

Saudi Arabia Vs Houthis: सऊदी अरब में शिया Vs सुन्नी की जंग, अरब वर्ल्ड के मुसलमानों के बीच गजब घमासान मचने वाला है?


अरब वर्ल्ड में ईरान और अमेरिका के युद्ध को लेकर पहले ही दुनिया सहमी हुई थी. इस जंग के बीच अचानक हूती विद्रोहियों की एंट्री ने दुनिया की टेंशन को और भी ज्यादा बढ़ा दिया है. पूरा मामला अब अरब वर्ल्ड में शिया Vs सुन्नी होता दिख रहा है. हूती विद्रोहियों ने पिछले एक हफ्ते से सऊदी  अरब को धुआं धुआं कर रखा है. वो जब चाहे, जहां चाहे सऊदी अरब को फोड़ रहे हैं. हूती विद्रोहियों के हमले से खुद को बचाने के लिए सऊदी अरब पाकिस्तान से मदद मांग मांग कर थक गया.

सऊदी अरब को पाकिस्तान से धोखा, अमेरिका की हूतियों से डील

पाकिस्तान ने सऊदी के साथ इसी शर्त पर मक्का पैक्ट किया था कि हमला होने पर दोनों मिलकर लड़ेंगे. लेकिन हूती लड़ाकों के हमले से दहशत में आया पाकिस्तान तो धोखा देकर भागा ही. अब तो सऊदी अरब ट्रंप से मिले धोखे को लेकर शॉक्ड है.

सबसे पहले बात सऊदी अरब को ट्रंप से मिले धोखे की. जो सऊदी अरब सोच रहा था कि ट्रंप हूती विद्रोहियों के हमले रोकने में उसकी मदद करेंगे. क्योंकि ईरान के खिलाफ युद्ध में उसने अमेरिका का पूरा साथ दिया है.

लेकिन पिछले कई दिनों से हूती लगातार सऊदी को फोड़ते रहे हैं. सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस ने 2 बार मदद के लिए ट्रंप को फोन भी मिलाया. मुसलमानों के पवित्र शहर मक्का पर हूती विद्रोहियों के हमले का दावा भी कर दिया. हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब को अमेरिका से मिले F15 फाइटर जेट को भी मलबे में बदल दिया. फिर भी ट्रंप की तरफ से सऊदी को किसी तरह की मदद नहीं मिली. और अब जाकर सऊदी अरब को समझ में आ गया है कि ट्रंप तो किसी के भी सगे नहीं हैं. ट्रंप ने तो खुद को बचाने के लिए हूती विद्रोहियों के साथ ही सीक्रेट डील कर ली है.

  • इसका खुलासा किसी और न नहीं बल्कि खुद अमेरिकी न्यूज वेबसाइट एक्सियोस ने किया है. जिसकी रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले दावे किए गए हैं.
  • अमेरिका ने यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सीक्रेट डील कर ली है.
  • इस डील के तहत हूती विद्रोहियों ने अमेरिका को भरोसा दिया है कि वो लाल सागर और बाब अल मंदेब स्ट्रेट में अमेरिकी जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे.
  • इसके बदले अमेरिका हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब की सैन्य मदद नहीं करेगा.
  • हालांकि इस डील में हूती विद्रोहियों ने साफ कर दिया कि वो लाल सागर में सऊदी के कार्गो शिप और ऑयल टैंकर्स को टारगेट करते रहेंगे.
  • रिपोर्ट में ये भी दावा किया गया है कि अमेरिकी अधिकारियों और हूती विद्रोहियों के बीच ये डील पिछले हफ्ते ओमान की राजधानी मस्कट में हुई.

जब सीक्रेट डील का खुलासा हो गया तो अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी पुष्टि कर दी कि अमेरिका की हूती विद्रोहियों के साथ सीधी बातचीत हुई है. और अपने हितों के लिए अमेरिका आगे भी ऐसा करता रहेगा. ट्रंप के इस धोखे के बाद अब सऊदी अरब समझ चुका है कि उसे फोड़ रहे हूती विद्रोही रुक क्यों नहीं रहे हैं.

सऊदी को कैसे तबाह कर रहे हूती लड़ाके

आज भी हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के कई टैंकों को ड्रोन हमले में तबाह करने का वीडियो जारी किया है. जिसमें ड्रोन फटने के बाद सऊदी के टैंक धुआं धुआं होते नजर आ रहे हैं. हूती विद्रोही इतने खूंखार हो चुके हैं कि अब तो ये लोग नजदीक के टारगेट पर हमले के लिए भी वो राइफल नहीं रॉकेट लॉन्चर का इस्तेमाल करते दिख रहे हैं.

सऊदी पर हूती विद्रोहियों हमलों से दुनिया पर महंगाई बम फटने का खतरा भी बढ़ गया है. क्योंकि हूती विद्रोहियों ने बाब अल मंदेब स्ट्रेट के आसपास नाकेबंदी कर ली है. उसके आसपास के इलाकों को अपने कब्जे में ले लिया. होर्मुज स्ट्रेट पहले ही ईरान ने बंद किया हुआ है. ऐसे में बाब अल मंदेब स्ट्रेट के बंद होने से कैसे महंगाई बम फट सकता है.

दरअसल अब ये युद्ध सिर्फ हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच नहीं रह गया है. ये अरब वर्ल्ड में शिया और सुन्नी की जंग में बदलता दिख रहा है. ऐसा क्यों इसके लिए सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच दुश्मनी का इतिहास समझना जरूरी है.

शुरू हुई शिया-सुन्नी की जंग

इस कहानी की शुरुआत सुन्नी देश यमन के उत्तर में बसे पहाड़ी इलाके सादा से होती है. सादा में बड़ी आबादी शिया मुसलमानों के एक समुदाय जैदी शियाओं की थी. साल 1980 से 90 के दौर में इसी जैदी शिया समुदाय के बीच एक धार्मिक और राजनीतिक आंदोलन उभरा. जो बाद में हूती मूवमेंट बना.

हूती यमन का एक शिया राजनीतिक और सैन्य संगठन है. जिसे आधिकारिक तौर पर ‘अंसार अल्लाह’ कहा जाता है. इस संगठन को एक पिता और बेटे की जोड़ी ने बनाया और वही इस आंदोलन को लीड कर रहे थे. पिता का नाम बद्र अल-दीन अल-हूती था, जबकि बेटे का नाम हुसैन बदरुद्दीन अल-हूती था. क्योंकि आंदोलन का नेतृत्व ‘अल हूती’ परिवार के हाथ में था, इसलिए इस संगठन से जुड़े लड़ाकों और समर्थकों को दुनिया हूती नाम से जानने लगी.

शिया हूती लड़ाके, सुन्नी देश सऊदी अरब दुश्मन कैसे बने?

अब ये भी समझिए की अचानक यमन में आंदोलन करने वाले जैदी शिया हूती लड़ाके, सुन्नी देश सऊदी अरब के कट्टर दुश्मन कैसे बन गए. दरअसल सुन्नी देश यमन में हूती मूवमेंट की शुरुआत इस आरोप से हुई कि यमन सरकार उन्हें राजनीतिक और आर्थिक तौर पर पीछे कर रही है.

साथ ही उन्हें सऊदी अरब से यमन में फैल रहे वहाबी और सलाफी धार्मिक प्रभाव से भी आपत्ति थी. जैसे जैसे हूती मूवमेंट तेज होने लगा यमन के तत्कालीन राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह ने आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हुसैन अल हूती को गिरफ्तार करने की कोशिश शुरू की.

साल 2004 में यमन की सालेह सरकार ने मिलिट्री ऑपरेशन शुरू कर दिया, जिसमें आंदोलन की अगुवाई कर रहे हुसैन अल हूती मारे गए लेकिन आंदोलन खत्म होने के बजाय और मजबूत हो गया.

साल 2004 से 2010 के बीच यमन सरकार और हूती लड़ाकों के बीच 6 बार युद्ध हुआ. इसी बीच इस लड़ाई में सऊदी अरब ने एंट्री की. साल 2009 में सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ लड़ाई में यमन को सैन्य मदद देनी शुरू की.

यहीं से हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब को अपना दुश्मन मान लिया और हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की सीमा में घुसकर उसकी सेना को निशाना बनाना शुरू कर दिया.

2014 में बड़ा टर्निंग प्वाइंट

हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच दश्मनी में एक बड़ा टर्निंग प्वाइंट साल 2014 में आया.  2014 में हूती विद्रोहियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया. सऊदी अरब को डर था कि उसके बॉर्डर पर ईरान के समर्थन वाले गुट की सत्ता आ जाएगी, जो उसके लिए बड़ा खतरा बन सकती है. इसलिए मार्च 2015 में सऊदी अरब ने गठबंधन बनाकर यमन में बड़ा मिलिट्री ऑपरेशन शुरू कर दिया.

और सऊदी अरब की इस हरकत ने हूती विद्रोहियों के साथ उसकी दुश्मनी को और गहरा कर दिया. हालांकि सऊदी के दखल के बाद भी इस लड़ाई में हूती विद्रोहियों ने यमन के करीब 50 प्रतिशत इलाके पर कब्जा कर लिया था. और आज भी उनका यमन में करीब 33 प्रतिशत इलाके पर कब्जा बना हुआ है. जिसमें यमन की 70 से 80 प्रतिशत आबादी रहती है.

ये हाल तब है जब सऊदी अरब हूती विद्रोहियों के खात्मे के लिए अब तक 25 हजार से ज्यादा एयर स्ट्राइक कर चुका है और सऊदी अरब के ये हवाई हमले अब भी जारी हैं. हूती विद्रोहियों का आरोप है कि पिछले कुछ दिनों में ही सऊदी अरब ने उसके ठिकानों पर साढ़े 4 सौ से ज्यादा हवाई हमले किए हैं.

अरब वर्ल्ड में शिया और सुन्नी की ये लड़ाई सिर्फ यमन के जैदी शिया हूती विद्रोहियों और सुन्नी देश सऊदी अरब के बीच की नहीं है. बल्कि ये पूरी दुनिया में फैले मुसलमानों के बीच की लड़ाई है. और इसका इतिहास भी सैकड़ों साल पुराना पुराना है. दरअसल इसकी शुरुआत साल 632 में पैगंबर मोहम्मद के बाद उनके उत्तराधिकारी को चुनने से हुई.

लड़ाई इस बात को लेकर शुरू हुई की दुनियाभर के मुलमानों का नेता कौन बनेगा. एक गुट की दलील थी कि पैगंबर के करीबी अबू बक्र को नेता चुना जाए. ये मुसलमानो का सुन्नी गुट था. जबकि शिया मुसलमानों की दलील थी की नेतृत्व पैंगबर के परिवार से ही होना चाहिए. वो पैंगबर के दामाद हजरत अली को उनका असली उत्तराधिकारी मानते हैं.

इस्लामी इतिहास क्या कहता है?

समय बीतने से साथ ये मतभेद और गहरे होते चले गए. दरअसल सुन्नी शब्द ‘अहल अल सुन्ना’ से बना है, जिसका मतलब है परंपरा को मानने वाले लोग. परंपरा का मतलब ऐसी रीति और रिवाजों से है जो पैंगबर मोहम्मद और उनके करीबियों के व्यवहार पर आधारित हों. वहीं शुरुआती इस्लामी इतिहास में शिया एक राजनीति समूह के रूप में उभरे थे. ‘शियत अली’ यानी अली की पार्टी.  अली पैंगबर मोहम्मद के दामाद थे.

शिया और सुन्नी समुदाय के बीच अरब वर्ल्ड में घमासान छिड़ता क्यों दिख रहा है. इसके लिए इस इलाके में शिया और सुन्नी के प्रभाव को समझना होगा. ईरान, इराक का बड़ा हिस्सा, लेबनान का एक हिस्सा, यमन में हूती विद्रोहियों के कब्जे वाला इलाका..यहां पर शिया मुसलमानों को वर्चस्व है.

जबकि सऊदी अरब, जॉर्डन, कतर, बहरीन, UAE, सीरिया, कुवैत, ओमान, तुर्की जैसे देशों में सुन्नी समुदाय का वर्चस्व है. इसीलिए शिया और सुन्नी समुदाय के बीच चल रहे संघर्ष में ईरान पर हूती विद्रोहियों के समर्थन के भी आरोप लगते हैं.

शिया और सुन्नी मुसलमानों जंग से दुनिया को नुकसान

अब ये भी देखिए अरब वर्ल्ड में शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच छिड़ रहे इस घमासान से दुनिया क्यों सहमी हुई है. शिया मुसलमानों के वर्चस्व वाले ईरान ने पहले ही होर्मुज स्ट्रेट को बंद किया हुआ है. और अब तेल सप्लाई के बाब अल मंदेब स्ट्रेट वाले रूट पर हूती विद्रोहियों ने कब्जे का दावा किया है. उससे टेंशन सिर्फ सऊदी अरब की नहीं पूरी दुनिया की बढ़ गई है.

अगर ऐसा हुआ तो सिर्फ कच्चा तेल ही नहीं यूरोप और एशिया के बीच होने वाले दूसरे एक्सपोर्ट और इंपोर्ट की लागत भी बढ़ जाएगी. क्योंकि ऐसा होने पर यूरोप की ओर एशिया जाने और वहां से आने वाले जहाजों को अफ्रीका के चारों तरफ घूमकर जाना पड़ेगा.अभी जहाज बाब अल मंदेब स्ट्रेट से होते हुए लाल सागर और स्वेज नहर पार करके यूरोप पहुंचते हैं.

ये रास्ता बंद होने पर उन्हें अफ्रीका के दक्षिणी किनारे केप ऑफ गुड होप से होकर जाना पड़ेगा. इससे जहाजों को करीब 7 हजार किलोमीटर का एक्स्ट्रा सफर तय करना होगा. यही नहीं अभी के मुकाबले जहाजों को दूरी तय करने में भी 25 से 30 दिन ज्यादा लगेंगे

इससे फ्यूल और शिपिंग का खर्चा काफी ज्यादा बढ़ जाएगा. इसके साथ ही जरूरी सामान पहुंचने में देरी हो सकती है. जिससे पेट्रोल डीजल और दूसरी इंपोर्ट होने वाली चीजों की कीमत बढ़ सकती है. जिसका सीधा आसर भारत में महंगाई पर भी पड़ सकता है. और कच्चे तेल के दाम तो पहले ही 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचते दिख रहे हैं.

आज पूरी दुनिया में अगर शिया और सुन्नी मुसलानों की आबादी की बात करें तो मुसलमानों की कुल आबादी करीब 200 करोड़ है. जबकि सुन्नी समुदाय की आबादी मुसलमानों की कुल आबादी की करीब 85 से 90 प्रतिशत है. जो 170 से 180 करोड़ होती है. वहीं शिया मुसलमानों की आबादी मुसलमानों की कुल आबादी का करीब 10 से 15 प्रतिशत है. और ये 20 से 30 करोड़ होती है.



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