नई दिल्ली (NCERT Chanda Mama Poem Controversy). बचपन की यादों से ‘चंदा मामा दूर के, पुए पकाएं बूर के…’ बाल कविता सभी के जेहन में आज भी ताजा होगी. छोटे बच्चों की किताबों में ऐसे गीत उनके पढ़ने का सफर बेहद खूबसूरत बना देते हैं. लेकिन जरा सोचिए, अगर बच्चों की पहली कक्षा की किताब में ही इस लोकप्रिय कविता का कोई शब्द गलत छप जाए और उसका अर्थ ही बदल जाए तो क्या होगा? हाल ही में आए एक ऐसे मामले ने शिक्षा जगत से लेकर अदालतों तक में हलचल मचा दी है.
2.5 साल बीतने के बाद भी सुधार न होने पर हाईकोर्ट की सख्ती
केंद्र सरकार से मांगा जवाब
पटना हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वह इस मामले में जवाबी हलफनामा दायर कर अपनी स्थिति स्पष्ट करे. इस खबर के सामने आने के बाद से ही पेरेंट्स और एजुकेशन एक्सपर्ट्स के बीच चर्चा तेज हो गई है कि आखिर स्कूली किताबों की क्वॉलिटी चेक करने वाली एजेंसियां इतनी लापरवाह कैसे हो सकती हैं. यह कविता ज्यादातर बच्चों के बचपन की सबसे सुनहरी याद होती है और उम्र के कई दशक बीत जाने के बाद भी जहन में एकदम ताजा रहती है.
एनसीईआरटी की किताब में क्या गलती है?
यह मामला NCERT की कक्षा-1 की हिंदी पुस्तक ‘सारंगी भाग-01’ में शामिल बच्चों की लोकप्रिय कविता ‘चंदा मामा दूर के’ से जुड़ा है. याचिकाकर्ता सोमित्र शंकर की तरफ से अदालत में पेश हुए अधिवक्ता शोवेन्द्र कुमार ने बताया कि इस कविता की दूसरी पंक्ति में बेहद गलत और अमर्यादित शब्द छप गया है. वहां सही शब्द ‘गुड़’ होना चाहिए था. उसकी जगह कथित तौर पर एक आपत्तिजनक शब्द प्रकाशित हो गया. इस गलती से कविता का पूरा अर्थ बदल गया, जिससे महिलाओं और समाज की मर्यादा पर भी असर पड़ता है.
2023 से छप रही किताब, 2.5 साल तक किसी की नजर क्यों नहीं पड़ी?
सवाल उठाया जा रहा है कि अगर यह त्रुटि 2023 में प्रकाशित हुई पहली प्रतियों में थी तो अब तक जिम्मेदार अधिकारियों की इस पर नजर क्यों नहीं पड़ी? याचिकाकर्ता के अनुसार, जब उन्हें इस गड़बड़ी की भनक लगी तो उन्होंने 21 जुलाई 2026 को पटना के कदमकुआं स्थित ज्ञान गंगा बुक डिपो से किताब खरीदकर उसका वेरिफिकेशन किया. 2.5 साल बीत जाने के बाद भी पब्लिकेशन या NCERT की तरफ से इस गलती को सुधारकर नया संशोधित संस्करण बाजार में न लाना बड़ी प्रशासनिक चूक है.
पटना हाईकोर्ट का कड़ा रुख
मामले की गंभीरता को देखते हुए पटना हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है. मुख्य न्यायाधीश वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति सुधीर सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई के बाद प्रतिवादियों को आदेश दिया है कि वे आगामी 13 अक्टूबर 2026 तक अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करें. अदालत तय करेगी कि आखिर किस स्तर की लापरवाही के कारण बच्चों की किताब में इस तरह के शब्दों को जगह मिली. हालांकि, कोर्ट ने अभी तक कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है, लेकिन केंद्र के जवाब के बाद स्थिति साफ हो जाएगी.
प्रूफरीडिंग और क्वॉलिटी चेक पर उठे गंभीर सवाल
इस घटना ने देशभर के पब्लिकेशन हाउसेस और NCERT के Quality Check Process पर सवाल खड़ा कर दिया है. बच्चों के लिए कोई किताब छपती है तो उसमें कई स्तरों पर ऑथर्स, एडिटर्स और प्रूफरीडर्स की टीम काम करती है. ऐसे में यह हैरानी वाली बात है कि प्राथमिक स्तर के बच्चों की किताब में आपत्तिजनक गलती कैसे छप गई और छपने के बाद सालों तक उस पर किसी ने ध्यान क्यों नहीं दिया. यह मामला सिर्फ एक शब्द की गलती का नहीं, बल्कि बच्चों के पाठ्यक्रम की शुद्धि और उसकी संवेदनशीलता से जुड़ा है.