नासा का चंद्रा टेलीस्कोप सिर्फ उस हल्की एक्स-रे लाइट को ही पकड़ पाता है, जो किसी तरह गैस को पार करके बाहर निकल आती है. यह बिल्कुल घने कोहरे में जल रहे किसी तेज लैंप की तरह है, जिसकी केवल हल्की सी धुंध ही हमें नजर आती है. यूनिवर्सिटी ऑफ अलबामा के खगोलशास्त्री मुस्तफा मुहिबुल्लाह ने कहा, ‘हमें सबसे ज्यादा हैरान इस बात ने किया कि इतनी मुश्किल से डिटेक्ट होने के बावजूद ये ऑब्जेक्ट्स बेहद ज्यादा चमकदार हैं.’
एलिप्टिकल गैलेक्सी NGC 3379 (बाईं ओर) और स्पाइरल गैलेक्सी M101 (दाईं ओर) में हाइपरसॉफ्ट X-रे सोर्स की एक तस्वीर, जिसमें सोर्स को पर्पल और मैजेंटा रंग में दिखाया गया है. तस्वीर को समझाने के लिए बेहतर बनाया गया है. (Photo Credit : Mustafa Muhibullah/University of Alabama)
कहीं यह टेलीस्कोप की तकनीकी गड़बड़ी तो नहीं?
जब वैज्ञानिकों को पहली बार डेटा में यह धुंधले बिंदु दिखे, तो उनके मन में भी शक पैदा हुआ था. उन्हें लगा कि कहीं यह टेलीस्कोप के डिटेक्टर की कोई तकनीकी खराबी तो नहीं है. इस बात की पुष्टि करने के लिए उन्होंने अलग-अलग समय पर लिए गए पुराने डेटा का बारीकी से मिलान किया. उन्होंने देखा कि कई रहस्यमय ऑब्जेक्ट्स अलग-अलग समय पर बिल्कुल एक ही जगह पर बार-बार दिखाई दे रहे थे.
अगर यह कोई रैंडम एरर या तकनीकी खामी होती, तो वह बार-बार एक ही लोकेशन पर कभी दर्ज नहीं होती. इसके बाद यूरोपियन स्पेस एजेंसी के एक्सएमएम-न्यूटन टेलीस्कोप ने भी इनमें से कुछ ऑब्जेक्ट्स की मौजूदगी को सही पाया.
वैज्ञानिकों ने एंड्रोमेडा और एम101 जैसी छह पड़ोसी गैलेक्सीज में इनकी खोज की है. हर गैलेक्सी के अंदर 7 से लेकर 21 ऐसे चमकदार केंद्र मिले हैं. एम101 गैलेक्सी में ये रहस्यमय पिंड उसकी सर्पिलाकार भुजाओं के साथ फैले हुए नजर आए. वहीं दूसरी तरफ कुछ ऑब्जेक्ट्स दीर्घवृत्ताकार गैलेक्सीज के पुराने तारों के बीच चुपचाप मौजूद थे.
आखिर अंतरिक्ष के यह 84 अनजान चमकते गोले असलियत में क्या चीज हो सकते हैं?
वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह रहस्यमय चीजें किस तरह के पिंड हैं. रिसर्च टीम का मानना है कि हाइपरसॉफ्ट शब्द किसी एक खास ऑब्जेक्ट को नहीं दर्शाता है. यह केवल उस अनोखी रोशनी को बयां करता है, जो टेलीस्कोप तक पहुंच रही है. ब्रह्मांड के कई अलग-अलग सिस्टम मिलकर इस तरह की लाइट पैदा कर सकते हैं.
इनमें सबसे पहला शक व्हाइट ड्वार्फ तारों पर जाता है. जब सूरज जैसा कोई तारा अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर मरता है, तो उसका बेहद घना कोर पीछे छूट जाता है. इसे ही विज्ञान की भाषा में व्हाइट ड्वार्फ कहा जाता है. इसके अलावा कुछ ऑब्जेक्ट्स हाल ही में फटे नोवा विस्फोट के अवशेष भी हो सकते हैं. कुछ मामलों में यह न्यूट्रॉन स्टार या आसपास के मलबे को निगलते हुए ब्लैक होल भी हो सकते हैं.
मुस्तफा मुहिबुल्लाह ने कहा, ‘चंद्रा टेलीस्कोप जो देखता है, वह उस विशाल एमिशन की केवल एक कमजोर और लो-एनर्जी एक्स-रे पूंछ भर है.’ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 84 तो केवल शुरुआत है और इनकी असली तादाद हजारों में हो सकती है.
एलिप्टिकल गैलेक्सी NGC 3379 के बीच के हिस्से में हाइपरसॉफ्ट X-रे सोर्स. ये सोर्स चंद्रा (Chandra) द्वारा देखे जा सकने वाले सबसे कम X-रे एनर्जी लेवल, यानी 0.15 और 0.3 keV के बीच (बाईं ओर) दिखाई देते हैं, लेकिन 0.3 और 1.0 keV के बीच (दाईं ओर) बहुत कम या बिल्कुल भी रेडिएशन नहीं दिखाते हैं. सफेद अंडाकार आकृतियाँ इनकी जगह को दिखाती हैं. (Image : NASA/SAO/CXC/Mustafa Muhibullah (University of Alabama))
क्या सबसे बड़े सुपरनोवा विस्फोट का रहस्य अब तरह सुलझ जाएगा?
यह खोज उसी खोई हुई कड़ी को जोड़ने का सबसे मजबूत जरिया बन सकती है. अगर इन 84 ऑब्जेक्ट्स में से कुछ भी शांत रहकर गैस चुरा रहे व्हाइट ड्वार्फ निकले, तो वैज्ञानिकों को विस्फोट से ठीक पहले का नजारा मिल जाएगा. ये तारे अब तक इसलिए नहीं दिखे, क्योंकि इनकी ज्यादातर ताकत ईयूवी लाइट में छुपी हुई थी.
वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि सभी 84 ऑब्जेक्ट्स सुपरनोवा बनकर नहीं फटेंगे. इनमें से कई न्यूट्रॉन स्टार और सामान्य व्हाइट ड्वार्फ भी बने रह सकते हैं. इसके साथ ही यह ऑब्जेक्ट्स अपने आसपास के पूरे अंतरिक्षीय पर्यावरण को भी बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रहे हैं. इनसे निकलने वाली ताकतवर ईयूवी लाइट गैलेक्सी के अंदर मौजूद गैस के बादलों का रूप बदल सकती है.
इसका मतलब यह है कि यह अनदेखी आबादी अपने आसपास के पूरे इलाके को नया आकार दे रही है. इन सभी का पूरी तरह सच जानने के लिए वैज्ञानिकों को अब एक ही समय पर अल्ट्रावायलेट और एक्स-रे लाइट में इनके तापमान की सटीक जांच करनी होगी.