छत्तीसगढ़ में पितृ पक्ष की अनूठी परंपरा, तिथि के अनुसार पितरों को देते हैं न्योता, सात्विक भोजन से होता है श्राद्ध

छत्तीसगढ़ में पितृ पक्ष की अनूठी परंपरा, तिथि के अनुसार पितरों को देते हैं न्योता, सात्विक भोजन से होता है श्राद्ध


बिलासपुर: छत्तीसगढ़ में पितृ पक्ष केवल श्राद्ध और तर्पण की धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पूर्वजों को याद करने और परिवार की परंपराओं को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है. इन दिनों हिंदू परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों को उनकी तिथि के अनुसार आमंत्रित कर पूजा-पाठ करते हैं और उनके पसंद के व्यंजन बनाकर अर्पित करते हैं. नदी या तालाब में जाकर तर्पण से लेकर घर के देवालय और द्वार पर चौक बनाने, कौवे समेत पक्षियों के लिए भोजन-पानी रखने और अंतिम दिन पितरों को विधिवत विदाई देने तक कई परंपराएं आज भी छत्तीसगढ़ के परिवारों में निभाई जाती हैं. बिलासपुर के वरिष्ठ लोक साहित्यकार डॉ. सोमनाथ यादव बताते हैं कि पितृ पक्ष की ये परंपराएं केवल धार्मिक आस्था से नहीं जुड़ी हैं, बल्कि छत्तीसगढ़ के खान-पान, रहन-सहन और पारिवारिक संस्कृति का भी हिस्सा है.

पितृ पक्ष के दौरान परिवार के जिन पूर्वजों का निधन हो चुका है, उनकी तिथि के अनुसार उन्हें घर में आमंत्रित करने की परंपरा है. सुबह पूजा-पाठ के साथ घर के स्थानीय देवालय और द्वार के पास चौक बनाया जाता है. कहीं चूने से लिपाई-पुताई की जाती है तो कहीं आटे से चौक बनाकर पितरों के स्वागत की परंपरा निभाई जाती है. जिस पूर्वज की जिस तिथि पर श्राद्ध होता है, उस दिन उनके पसंद के भोजन और व्यंजन बनाकर अर्पित किए जाते हैं.

सात्विक भोजन में पारंपरिक पकवान का महत्व
डॉ. सोमनाथ यादव के अनुसार इन दिनों खानपान में भी विशेष सावधानी रखी जाती है. भोजन सात्विक रखा जाता है. छत्तीसगढ़ में चावल प्रधान भोजन होने के कारण श्राद्ध के भोजन में चावल का विशेष महत्व रहता है. मौसमी सब्जियों में खासकर तोरई को बिना छौंक और बिना मसाले के बनाया जाता है. इसके साथ बिना नमक की सब्जी, चावल और आटे-गुड़ से तैयार बोबरा जैसे पारंपरिक मीठे पकवान बनाए जाते हैं. इसके अलावा परिवार के दिवंगत बुजुर्गों को जो व्यंजन पसंद थे, उन्हें भी बनाकर श्रद्धा से अर्पित किया जाता है.

पूर्वज माताओं को किया जाता है याद
पितृ पक्ष में नवमी तिथि का भी विशेष महत्व बताया जाता है. इस दिन परिवार की उन दिवंगत महिलाओं को याद किया जाता है, जो इस दुनिया में नहीं हैं. परिवार की महिला पूर्वजों को उनकी तिथि और परंपरा के अनुसार आमंत्रित कर उनके पसंद का भोजन बनाया जाता है. पूजा-पाठ और अर्पण के बाद परिवार के सदस्य प्रसाद स्वरूप भोजन ग्रहण करते हैं. इस तरह यह परंपरा परिवार की दिवंगत माताओं, दादियों और अन्य महिला सदस्यों की स्मृति को जीवित रखने का माध्यम भी बनती है.

कौवे और पक्षियों के लिए भी रखा जाता है भोजन-पानी
छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा में पितृपक्ष के दौरान पक्षियों के लिए भोजन और पानी रखने की भी परंपरा रही है. खासकर कौवे को पितरों से जोड़कर देखा जाता है. पूजा के पहले या बाद में पत्तल और दोना में भोजन तथा पानी रखकर पक्षियों के लिए अर्पित किया जाता है. यह परंपरा प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना से भी जुड़ी दिखाई देती है.

नदी-तालाब में पंडित के साथ होता है तर्पण
श्राद्ध की प्रक्रिया में नदी या तालाब का भी विशेष महत्व रहता है. परिवार के सदस्य पंडित के साथ नदी या तालाब पहुंचते हैं. वहां जौ और चावल मिलाकर तथा सफेद फूलों के साथ तर्पण और अर्घ्य देने की परंपरा निभाई जाती है. परिवार का कोई वरिष्ठ सदस्य सफेद वस्त्र धारण कर पूजा की विधि को अंतिम रूप देता है. इसके माध्यम से पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और स्मरण व्यक्त किया जाता है.

परिवार के अपने लोगों को ही दिया जाता है निमंत्रण
पितृ पक्ष के श्राद्ध में केवल मोहल्ले या आसपास के लोगों को बुलाने की परंपरा नहीं होती, बल्कि परिवार के अपने लोगों और गोत्र से जुड़े सदस्यों को आमंत्रित किया जाता है. जिस दिन परिवार के किसी पूर्वज की तिथि होती है, उस दिन उनके अपने खून और परिवार के सदस्यों को भोजन के लिए बुलाया जाता है. इससे श्राद्ध की परंपरा के साथ परिवार के सदस्यों के बीच आपसी जुड़ाव भी बना रहता है.

अंतिम दिन पितरों को दी जाती है विधिवत विदाई
पितृ पक्ष के अंतिम दिन पूर्वजों की विदाई की विशेष प्रक्रिया होती है. इस दिन भी घर में पकवान बनाए जाते हैं और पूजा-पाठ के बाद उन्हें अर्पित किया जाता है. इसके बाद घंटी बजाते और थाली पीटते हुए परिवार के सदस्य नदी या तालाब तक जाते हैं. वहां दोबारा पूजा-पाठ कर पितरों को विदाई दी जाती है और पूजा में इस्तेमाल की गई सामग्री का विसर्जन किया जाता है.

पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा में छिपी है छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति
बिलासपुर के वरिष्ठ लोक साहित्यकार डॉ. सोमनाथ यादव के अनुसार पितृ पक्ष की यह परंपरा छत्तीसगढ़ में लंबे समय से चली आ रही है. इसमें धार्मिक विधि-विधान के साथ स्थानीय खानपान, पारिवारिक रिश्ते, लोक आस्था और प्रकृति के प्रति संवेदना भी जुड़ी हुई है. पूर्वजों को उनकी तिथि पर याद करना, उनके पसंदीदा व्यंजन बनाना, परिवार के लोगों को साथ बैठाकर भोजन कराना और अंतिम दिन विधिवत विदाई देना इस परंपरा को छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाता है.



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