जिस पेशाब को हम नाली में बहाते हैं वो उगल सकता है सोना, जानिए कैसे बदलेगी हमारी पूरी दुनिया?

जिस पेशाब को हम नाली में बहाते हैं वो उगल सकता है सोना, जानिए कैसे बदलेगी हमारी पूरी दुनिया?


दुनिया भर में इस समय फर्टिलाइजर के दाम आसमान छू रहे हैं. खेतों में केमिकल खाद डालने से मिट्टी लगातार बंजर होती जा रही है. ऐसे गंभीर संकट के दौर में पूरी दुनिया एक हैरान करने वाले समाधान की तरफ देख रही है. वैज्ञानिक अब इंसानी यूरिन को लिक्विड गोल्ड यानी तरल सोना बता रहे हैं. एक आम इंसान हर साल लगभग 500 लीटर यूरिन पैदा करता है. इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम जैसे बेहद कीमती पोषक तत्व पाए जाते हैं. ये तीनों तत्व फसलों के बेहतर विकास के लिए सबसे ज्यादा जरूरी माने जाते हैं. दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी आज केमिकल खाद से उगे अनाज पर निर्भर है. लेकिन युद्ध और ग्लोबल संकट के चलते यह खाद बहुत महंगी हो चुकी है. इसी वजह से अब पीसाइक्लिंग का नया दौर शुरू हो रहा है. इंसानी यूरिन को प्रोसेस करके खेतों के लिए बेहतरीन खाद में बदला जा रहा है.

क्या रोज टॉयलेट में बहाया जाने वाला पानी सच में सोने जितना कीमती है?

हर दिन हम जिस यूरिन को फ्लश करके बहा देते हैं वो असल में पोषक तत्वों का खजाना है. हमारा शरीर भोजन से जरूरी पोषण सोखने के बाद बाकी बचे तत्वों को यूरिन के रास्ते बाहर निकाल देता है. वैज्ञानिक रिसर्च बताती है कि घर से निकलने वाले कुल गंदे पानी में यूरिन का हिस्सा केवल एक प्रतिशत होता है. लेकिन इस छोटे से हिस्से में पूरे सीवेज का लगभग सारा नाइट्रोजन मौजूद होता है.

इसके साथ ही इसमें सीवेज का आधा फास्फोरस भी पाया जाता है. पौधों को तेजी से बढ़ने और हरा-भरा रहने के लिए सबसे ज्यादा नाइट्रोजन की जरूरत होती है. फास्फोरस पौधों की जड़ों को मजबूत बनाता है और पोटेशियम उन्हें बीमारियों से लड़ने की ताकत देता है.

जब हम इसे साधारण सीवेज में मिला देते हैं तो ये सारे कीमती तत्व बेकार पानी में घुल जाते हैं. फिर उन्हें अलग करना बहुत ज्यादा मुश्किल और खर्चीला हो जाता है. अगर इस यूरिन को सीधे अलग कर लिया जाए तो यह किसी भी केमिकल खाद से बेहतर काम कर सकता है.

क्या पुराने जमाने के लोग भी खेती के लिए इंसानी कचरे का इस्तेमाल करते थे?

  • यूरिन को खाद की तरह इस्तेमाल करने का यह विचार कोई बिल्कुल नया नहीं है. हजारों साल पहले प्राचीन ग्रीस, रोम और चीन की पुरानी सभ्यताओं में इसका खूब इस्तेमाल होता था. उस दौर में आधुनिक टॉयलेट और पाइपलाइन सिस्टम मौजूद नहीं थे. लोग अपने घरों में बर्तनों और गड्ढों में यूरिन जमा करते थे.
  • शहरों में रात के समय कर्मचारी घर-घर जाकर इस इंसानी कचरे को इकट्ठा करते थे. इसे उस जमाने में नाइट सॉइल कहा जाता था. इसके बाद इस खाद को गाड़ियों में लादकर दूर देहात के खेतों में पहुंचाया जाता था. उन्नीसवीं सदी में जब आधुनिक सीवेज सिस्टम बना तो बीमारियों में भारी कमी आई. लेकिन इस बदलाव ने इंसानी सोच को पूरी तरह बदल दिया.
  • लोग जिस यूरिन को अनमोल संसाधन मानते थे उसे अचानक केवल गंदगी समझा जाने लगा. बाद के दौर में पक्षियों की बीट यानी गुआनो से खाद बनाने की होड़ मची. जब वह प्राकृतिक भंडार खत्म होने लगा तो वैज्ञानिकों ने लैब में केमिकल खाद बनाने की नई राह खोज ली.

केमिकल खाद ने हमारी धरती और पर्यावरण को किस तरह से बर्बाद किया है?

बीसवीं सदी की शुरुआत में वैज्ञानिकों ने हैबर-बॉश प्रोसेस के जरिए सिंथेटिक नाइट्रोजन फर्टिलाइजर तैयार किया. इस आविष्कार ने फसलों की पैदावार को कई गुना बढ़ा दिया. लेकिन इस केमिकल खाद ने पर्यावरण के सामने बहुत बड़ा संकट भी खड़ा कर दिया है. नाइट्रोजन खाद बनाने के लिए बहुत भारी मात्रा में नेचुरल गैस और ऊर्जा जलानी पड़ती है. इससे हवा में भारी कार्बन उत्सर्जन होता है.

वहीं दूसरी तरफ सिंथेटिक फास्फोरस बनाने के लिए फास्फेट चट्टानों का खनन किया जाता है. दुनिया में यह खनिज बहुत सीमित जगहों पर ही बचा है. मोरक्को के कब्जे वाले पश्चिमी सहारा में इसके सबसे बड़े भंडार मौजूद हैं. जब किसान खेतों में बहुत ज्यादा केमिकल खाद डालते हैं तो उसका बड़ा हिस्सा बारिश के पानी में बहकर नदियों और झीलों में चला जाता है. वहां जाकर यह केमिकल जहरीले शैवाल पैदा करता है. पानी में ऑक्सीजन खत्म होने से लाखों मछलियां तड़पकर मर जाती हैं. यह सिलसिला पूरी जलीय व्यवस्था को बर्बाद कर रहा है.

महंगे फर्टिलाइजर और युद्ध के संकट के बीच यूरिन कैसे बन सकता है सहारा?

  • मौजूदा समय में दुनिया भर में भू-राजनीतिक तनाव और लड़ाइयों ने सप्लाई चेन को तोड़ दिया है. हालिया युद्धों के कारण फर्टिलाइजर के दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं. कई देशों के लिए अब बाहर से महंगी खाद मंगाना आसान नहीं रह गया है. उदाहरण के तौर पर ऑस्ट्रेलिया की जमीन बहुत पुरानी और पोषक तत्वों के मामले में बेहद कमजोर है.
  • वहां अपनी फसलों को उगाने के लिए हर साल 35 से 40 लाख टन केमिकल खाद आयात करनी पड़ती है. स्थानीय स्तर पर वहां खाद का उत्पादन लगभग शून्य है. सामान्य दिनों में बाहर के देशों से खाद मंगाना ठीक लगता है. लेकिन जब दुनिया भर में संकट आता है तो ऐसी निर्भरता पूरे देश की खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाल देती है.
  • ऐसे नाजुक हालात में अपने स्थानीय संसाधनों की तरफ लौटना ही सबसे सुरक्षित रास्ता बचता है. इंसानी यूरिन एक ऐसा संसाधन है जो हर देश में मुफ्त और भरपूर मात्रा में मौजूद है. इसका सही इस्तेमाल करके किसान अपनी लागत को आधा कर सकते हैं.

क्या घर के टॉयलेट और पब्लिक यूरिनल से इस लिक्विड गोल्ड को जमा करना मुमकिन है?

यूरिन को खाद बनाने के लिए सबसे जरूरी कदम इसे सामान्य टॉयलेट के पानी से अलग रखना है. जब यूरिन सीवेज के पानी में मिल जाता है तो यह नाइट्रस ऑक्साइड जैसी खतरनाक गैस बनाता है. यह गैस कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना ज्यादा खतरनाक ग्रीनहाउस गैस है. इसके अलावा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाली गैसें दुनिया भर की एविएशन इंडस्ट्री के बराबर प्रदूषण फैलाती हैं.

अगर हम यूरिन को अलग कर लें तो शहरों के सीवेज प्लांट पर लोड बहुत कम हो जाएगा. इसके लिए घरों और सार्वजनिक जगहों पर खास तरह के यूरिन डाइवर्टिंग टॉयलेट लगाने होंगे. इन टॉयलेट में यूरिन और सॉलिड वेस्ट के लिए अलग-अलग रास्ते बने होते हैं. पब्लिक यूरिनल तो पहले से ही केवल यूरिन इकट्ठा करने का बेहतरीन जरिया हैं. छोटे स्तर पर लोग अपने घर के गार्डन में भी यूरिन का सीधा इस्तेमाल कर सकते हैं. बस इसे सही मात्रा में पानी के साथ मिलाकर पौधों की जड़ों में डालना होता है.

इस अनोखे मॉडल पर रिसर्च और ट्रायल शुरू कर चुके हैं दुनिया के बड़े देश

दुनिया भर के वैज्ञानिक अब इस दिशा में तेजी से कदम आगे बढ़ा रहे हैं.

  • अमेरिका में रिच अर्थ इंस्टीट्यूट नाम का संगठन पिछले दस सालों से पीसाइक्लिंग का बड़ा कम्युनिटी प्रोग्राम चला रहा है. वे हजारों लीटर यूरिन जमा करके उससे सुरक्षित और गंधहीन खाद तैयार करते हैं.
  • यूरोप में स्विट्जरलैंड का एक प्रसिद्ध स्टार्टअप वूनानिक्सस भी इस तकनीक पर शानदार काम कर रहा है. वे यूरिन को प्रोसेस करके बाजार में बिकने लायक बेहतरीन फर्टिलाइजर बना रहे हैं.
  • यूनाइटेड किंगडम, स्वीडन और साउथ अफ्रीका के बड़े स्पोर्ट्स स्टेडियम में भी इसके ट्रायल किए जा रहे हैं. इन स्टेडियमों में मैच देखने आने वाले लाखों दर्शकों के यूरिन को सीधे अलग टैंक में स्टोर किया जाता है.
  • ऑस्ट्रेलिया में भी ब्रिस्बेन और सिडनी के बड़े पार्कों में यूरिन से बनी खाद का सफल परीक्षण चल रहा है. इस खाद से उगे पेड़-पौधे सामान्य पौधों की तुलना में ज्यादा तेजी से और स्वस्थ तरीके से बढ़ रहे हैं. यह प्रयोग साबित करता है कि यह मॉडल पूरी तरह व्यावहारिक है.

क्या हिचक भुलाकर लोग पेशाब से उगे अनाज को खाने के लिए तैयार होंगे?

इस पूरे प्रोजेक्ट को बड़े पैमाने पर लागू करने में सबसे बड़ी रुकावट लोगों की मानसिक झिझक है. ज्यादातर लोगों को यूरिन से उगे अनाज या सब्जियों को खाने के ख्याल से ही अजीब लगता है. समाज में इसे सिर्फ एक गंदी चीज माना जाता है. इसके अलावा यूरिन में मौजूद दवाओं के अंश और बैक्टीरिया को साफ करना भी एक बड़ी वैज्ञानिक चुनौती है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि सही हीटिंग और पाश्चराइजेशन तकनीक से इसे पूरी तरह सुरक्षित बनाया जा सकता है. प्लंबिंग नियमों में बदलाव करके नए मकानों में अलग पाइपलाइन लगाना जरूरी किया जा सकता है. धीरे-धीरे लोगों को यह समझाना होगा कि हमारी फसलें किसी केमिकल से नहीं बल्कि प्राकृतिक चक्र से फलती-फूलती हैं. प्रकृति में वेस्ट जैसा कुछ भी नहीं होता है. अगर हम अपनी पुरानी सोच को बदल लें तो नाली में बहने वाला यह पानी हमारे खेतों को हमेशा हरा-भरा रख सकता है. यह तकनीक भविष्य की खेती का सबसे बड़ा हथियार साबित होगी.



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