दिल्ली. पश्चिम बंगाल की रहने वाली नीलम साव इस बार दिल्ली के एक मेले में अपनी हाथ से बनी ज्वेलरी लेकर पहुंची हैं. टेराकोटा, मिट्टी, जूट, कपड़े और अलग-अलग तरह के मोतियों से बनी उनकी ज्वेलरी में काफी वैरायटी देखने को मिलती है. लेकिन इन खूबसूरत गहनों के पीछे सिर्फ कारोबार नहीं, बल्कि करीब 15 साल की मेहनत और संघर्ष की कहानी है. नीलम बताती हैं कि उन्हें शुरू से ही अपने हाथों से चीजें बनाना पसंद था.
घर में जब कोई सामान नहीं होता था, तब भी वे अपनी तरफ से कुछ न कुछ बनाने की कोशिश करती थीं. मिट्टी और दूसरी चीजों से कुछ नया बनाने का शौक धीरे-धीरे इतना बढ़ा कि उन्होंने इसे अपना काम बनाने का फैसला किया.
शादी के बाद घर से शुरू किया काम, लेकिन रास्ता आसान नहीं था
शादी के बाद नीलम ने ज्वेलरी बनाना शुरू किया. उस समय उन्हें मेलों और प्रदर्शनियों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी. उनके पति उनकी बनाई ज्वेलरी दुकानों पर लेकर जाते थे. दुकानदारों से सामान बिकने के बाद पैसे देने की बात होती थी. लेकिन कोई तय बाजार नहीं था और यह भी पता नहीं होता था कि सामान कब बिकेगा. इसी वजह से कुछ समय बाद उन्होंने काम रोक दिया. फिर एक हस्तशिल्प मेले में जाने का मौका मिला.
वहां उन्होंने देखा कि हाथ से बने सामान की अपनी अलग पहचान और मांग है. यहीं से उन्हें अपने काम को दोबारा शुरू करने की उम्मीद मिली. नीलम ने संबंधित कार्यालय से संपर्क किया, पहचान पत्र बनवाया और धीरे-धीरे मेलों में हिस्सा लेना शुरू किया. इस पूरे सफर में उनके पति ने भी उनका साथ दिया. आज दोनों मिलकर इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं.
छोटी शुरुआत से अपना घर बनाने तक का सफर
नीलम के लिए यह काम सिर्फ पैसे कमाने का जरिया नहीं रहा. उन्होंने बताया कि मुश्किलों के बीच उन्होंने अपना खुद का घर भी बनाया. घर में चार कमरे हैं, जिन्हें उन्होंने किराये पर दिया हुआ है. इससे उन्हें अलग से आमदनी होती है. वे कहती हैं कि इस सफर में उनके पति ने उनका बहुत साथ दिया. घर बनाने का हौसला भी उन्हें पति से मिला. नीलम के लिए अपने दम पर घर खड़ा करना उनकी 15 साल की मेहनत की बड़ी उपलब्धियों में से एक है.
आज 20-25 महिलाएं जुड़ी हैं, किसी के हाथ में मिट्टी तो किसी के मोती
नीलम ने जब काम शुरू किया था, तब शुरुआत बहुत छोटी थी. आज उनके साथ करीब 20-25 लड़कियां और महिलाएं काम करती हैं. कोई मिट्टी की ज्वेलरी बनाती है, कोई कपड़े का काम करती है तो कोई मोतियों से डिजाइन तैयार करती है. वह बताती हैं कि उन्होंने इस काम की शुरुआत करीब 50 रुपये से की थी.
आज कारोबार लाखों रुपये तक पहुंच गया है. हालांकि हर साल उनकी कमाई एक जैसी नहीं रहती, क्योंकि यह मेलों और बिक्री पर निर्भर करती है. कभी साल में एक बड़ा मेला मिलता है तो कभी दो-तीन जगह जाने का मौका मिल जाता है.
दिल्ली में टेराकोटा की बालियों से लेकर क्रिस्टल ज्वेलरी तक की मांग
दिल्ली के मेले में भी नीलम को अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है. उनके मुताबिक लोगों को टेराकोटा मिट्टी से बनी बालियां, मेटल की ज्वेलरी और क्रिस्टल से बनी ईयररिंग्स काफी पसंद आ रही हैं. उनका कहना है कि हर जगह लोगों की पसंद थोड़ी अलग होती है, इसलिए वह अलग-अलग तरह की ज्वेलरी तैयार करती हैं. यही वजह है कि उनके स्टॉल पर मिट्टी से लेकर जूट और मोतियों तक कई तरह के डिजाइन देखने को मिलते हैं.
लाखों की कमाई के बावजूद ऑनलाइन कारोबार के लिए नहीं मिल पाता समय
आज नीलम का कारोबार लाखों तक पहुंच गया है, लेकिन वह अभी ऑनलाइन बिक्री नहीं करतीं. इसकी वजह भी काफी सीधी है. कारोबार के साथ उन्हें घर और परिवार की जिम्मेदारियां भी संभालनी होती हैं. नीलम बताती हैं कि उनके बच्चे चौथी कक्षा में पढ़ते हैं. लंबे समय बाद काम के सिलसिले में दिल्ली आने पर उन्हें बच्चों को पीछे छोड़ने का थोड़ा दुख भी है. हालांकि उन्होंने बच्चों को रविवार को दिल्ली बुलाया है, ताकि वे मेले में उनके साथ समय बिता सकें और दिल्ली भी घूम सकें.
कभी घर की चारदीवारी में था हुनर, आज उसी से बनी अपनी पहचान
नीलम के लिए 15 साल का यह सफर आसान नहीं रहा. एक समय ऐसा भी था जब उनके हाथों में हुनर तो था, लेकिन उसे बाजार तक पहुंचाने का रास्ता नहीं था. आज वही हुनर उनके कारोबार की पहचान बन चुका है. आज नीलम खुद को अब सिर्फ घर संभालने वाली महिला के तौर पर नहीं देखतीं. अपने काम, अपनी कमाई और अपने साथ जुड़ी महिलाओं की वजह से उन्हें अपनी एक अलग पहचान मिली है. उनके चेहरे पर इस सफर की खुशी साफ दिखाई देती है.