Private College MBBS Fees: 771 बच्चों ने छोड़ा MBBS-BDS का सपना, प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की लूट के आगे हुए बेबस

Private College MBBS Fees: 771 बच्चों ने छोड़ा MBBS-BDS का सपना, प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की लूट के आगे हुए बेबस


नई दिल्ली (Gujarat MBBS Fees). डॉक्टर बनने का सपना देख रहे स्टूडेंट्स के लिए नीट पास करना इस सफर का पहला पड़ाव मात्र है. लेकिन जब यही सपना पैसों की कमी और भारी-भरकम फीस के आगे दम तोड़ने लगे तो स्थिति बेहद दर्दनाक हो जाती है. गुजरात से एक ऐसा ही चौंकाने वाला मामला सामने आया है. यहां मेडिकल और डेंटल कोर्स की काउंसलिंग के पहले 2 राउंड में ही कई स्टूडेंट्स ने अपनी पक्की सीटें छोड़ दीं क्योंकि वे प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की भारी-भरकम फीस चुकाने में असमर्थ थे.

मेडिकल एडमिशन कमेटी (ACPUGMEC) के आंकड़ों के मुताबिक, गुजरात में 771 स्टूडेंट्स ने एमबीबीएस और बीडीएस की सीटें मिलने के बावजूद एडमिशन कंफर्म नहीं कराया. वडोदरा के रहने वाले मेमन मोहम्मद शेख और किसान के बेटे उदय करावडरा जैसे कई युवा अब मजबूरन डॉक्टर बनने का सपना छोड़कर BHMS, बीएएमएस (BAMS) या फार्मेसी जैसे सस्ते कोर्स में एडमिशन ले रहे हैं. जानिए यह पूरा मामला क्या है और बच्चे इस आर्थिक संकट से कैसे निपट रहे हैं.

Private College MBBS Fees: भारी-भरकम फीस के चक्कर में टूट रहे सपने

प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की फीस आम परिवारों के बजट से बहुत बाहर है. ओपन कैटेगरी के स्टूडेंट मेमन मोहम्मद शेख को वडोदरा की पारुल यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस मिला था. लेकिन करीब 10 लाख रुपये सालाना फीस होने के कारण उन्हें यह सीट छोड़नी पड़ी. उनके पिता साड़ी की छोटी सी दुकान चलाते हैं. सरकारी स्कॉलरशिप और समुदाय से मदद मिलने के बावजूद पहले साल 6 लाख और आगे चलकर हर साल 10 लाख रुपये जुटाना उनके परिवार के बूते से बाहर था.

एमबीबीएस छोड़ आयुष और होम्योपैथी कोर्स चुन रहे छात्र

जब एमबीबीएस और बीडीएस की लाखों रुपये की फीस मिडिल क्लास और गरीब परिवारों पर भारी पड़ने लगती है तो छात्र मजबूरी में दूसरे रास्ते तलाशते हैं. नीट में 421 अंक हासिल करने वाले उदय करावडरा को अहमदाबाद के एसएएल मेडिकल कॉलेज में सीट मिली थी. लेकिन 11.68 लाख रुपये सालाना फीस (5 साल में करीब 55 लाख रुपये) होने के कारण उन्होंने इसे ठुकरा दिया. किसान पिता के बेटे उदय अब आयुर्वेद (BAMS) या होम्योपैथी की पढ़ाई करने का विचार कर रहे हैं, जहां फीस का बोझ काफी कम होता है.

एडमिशन कमेटी भी हैरान

राज्य के मेडिकल एडमिशन पैनल से जुड़े एक सीनियर अधिकारी का कहना है कि एमबीबीएस और बीडीएस कोर्स में इस तरह भारी संख्या में पक्की सीटें छोड़ा जाना पहले कभी नहीं देखा गया. अधिकारियों के अनुसार, भारी-भरकम फीस मुख्य चिंता बनकर उभरी है. इसके चलते स्टूडेंट्स तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे अलॉटेड सीट स्वीकार करें या अगले राउंड का इंतजार करें. कई स्टूडेंट्स अब डेंटल, फार्मेसी, आयुर्वेद और होम्योपैथी जैसे कोर्स को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे कम खर्च में डिग्री पूरी हो सके.

शिक्षा का बढ़ता खर्च और करियर की अनिश्चितताएं

यह मामला सिर्फ गुजरात या कुछ चुनिंदा मेडिकल स्टूडेंट्स तक सीमित नहीं है. यह देशभर की उस सच्चाई को उजागर करता है जहां मेडिकल शिक्षा सिर्फ रईसों या संपन्न लोगों के हाथ की चीज बनती जा रही है. लोन और भारी ब्याज के चक्कर में पड़कर परिवार कर्ज के जाल में फंस जाते हैं. यही वजह है कि स्टूडेंट्स अब प्रैक्टिकल रुख अपनाते हुए ऐसे कोर्स चुन रहे हैं जो उनकी जेब पर भारी न पड़ें और भविष्य में रोजगार की उम्मीद भी जगाएं.



Source link