नई दिल्ली (Gujarat MBBS Fees). डॉक्टर बनने का सपना देख रहे स्टूडेंट्स के लिए नीट पास करना इस सफर का पहला पड़ाव मात्र है. लेकिन जब यही सपना पैसों की कमी और भारी-भरकम फीस के आगे दम तोड़ने लगे तो स्थिति बेहद दर्दनाक हो जाती है. गुजरात से एक ऐसा ही चौंकाने वाला मामला सामने आया है. यहां मेडिकल और डेंटल कोर्स की काउंसलिंग के पहले 2 राउंड में ही कई स्टूडेंट्स ने अपनी पक्की सीटें छोड़ दीं क्योंकि वे प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की भारी-भरकम फीस चुकाने में असमर्थ थे.
Private College MBBS Fees: भारी-भरकम फीस के चक्कर में टूट रहे सपने
प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की फीस आम परिवारों के बजट से बहुत बाहर है. ओपन कैटेगरी के स्टूडेंट मेमन मोहम्मद शेख को वडोदरा की पारुल यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस मिला था. लेकिन करीब 10 लाख रुपये सालाना फीस होने के कारण उन्हें यह सीट छोड़नी पड़ी. उनके पिता साड़ी की छोटी सी दुकान चलाते हैं. सरकारी स्कॉलरशिप और समुदाय से मदद मिलने के बावजूद पहले साल 6 लाख और आगे चलकर हर साल 10 लाख रुपये जुटाना उनके परिवार के बूते से बाहर था.
एमबीबीएस छोड़ आयुष और होम्योपैथी कोर्स चुन रहे छात्र
एडमिशन कमेटी भी हैरान
राज्य के मेडिकल एडमिशन पैनल से जुड़े एक सीनियर अधिकारी का कहना है कि एमबीबीएस और बीडीएस कोर्स में इस तरह भारी संख्या में पक्की सीटें छोड़ा जाना पहले कभी नहीं देखा गया. अधिकारियों के अनुसार, भारी-भरकम फीस मुख्य चिंता बनकर उभरी है. इसके चलते स्टूडेंट्स तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे अलॉटेड सीट स्वीकार करें या अगले राउंड का इंतजार करें. कई स्टूडेंट्स अब डेंटल, फार्मेसी, आयुर्वेद और होम्योपैथी जैसे कोर्स को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे कम खर्च में डिग्री पूरी हो सके.
शिक्षा का बढ़ता खर्च और करियर की अनिश्चितताएं
यह मामला सिर्फ गुजरात या कुछ चुनिंदा मेडिकल स्टूडेंट्स तक सीमित नहीं है. यह देशभर की उस सच्चाई को उजागर करता है जहां मेडिकल शिक्षा सिर्फ रईसों या संपन्न लोगों के हाथ की चीज बनती जा रही है. लोन और भारी ब्याज के चक्कर में पड़कर परिवार कर्ज के जाल में फंस जाते हैं. यही वजह है कि स्टूडेंट्स अब प्रैक्टिकल रुख अपनाते हुए ऐसे कोर्स चुन रहे हैं जो उनकी जेब पर भारी न पड़ें और भविष्य में रोजगार की उम्मीद भी जगाएं.