एक बम और पूरा एयरफील्ड खत्म: ATC, रनवे, हेलिपैड, हैंगर, रडार, आर्म्स-ईंधन डिपो, बंकर, कमांड सेंटर

एक बम और पूरा एयरफील्ड खत्म: ATC, रनवे, हेलिपैड, हैंगर, रडार, आर्म्स-ईंधन डिपो, बंकर, कमांड सेंटर


युद्ध में किसी देश की वायुसेना की ताकत सिर्फ उसके लड़ाकू विमानों पर निर्भर नहीं करती. रनवे, टैक्सी ट्रैक, हैंगर, बंकर, रडार और ईंधन भंडार जैसे एयरफील्ड ढांचे भी बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. अगर इन्हें नुकसान पहुंचाया जाए तो दुश्मन के विमानों की उड़ान और संचालन प्रभावित हो सकता है. इन्हीं ठिकानों को दूर से निशाना बनाने के लिए भारत ने Smart Anti-Airfield Weapon यानी SAAW विकसित किया है.

यह नार्मल बम की तरह सिर्फ नीचे गिरने वाला हथियार नहीं है. यह एक हवा से जमीन पर मार करने वाला, सटीक निशाना लगाने वाला ग्लाइड बम है, जिसे लड़ाकू विमान से काफी दूरी से छोड़ा जा सकता है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने इसे स्वदेशी रूप से विकसित किया है.

क्या है SAAW?
SAAW का पूरा नाम Smart Anti-Airfield Weapon है. आसान भाषा में इसे ऐसा स्मार्ट बम समझ सकते हैं जिसे लड़ाकू विमान अपने लक्ष्य के काफी पास गए बिना भी छोड़ सकता है.

DRDO के मुताबिक यह 125 किलोग्राम वर्ग का हथियार है और इसकी अधिकतम मारक क्षमता करीब 100 किलोमीटर तक बताई गई है. इसे दुश्मन के एयरफील्ड से जुड़े महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है.

इसकी खासियत यह है कि विमान से छोड़े जाने के बाद यह अपने guidance system की मदद से तय लक्ष्य की ओर बढ़ता है. इसलिए इसे स्टैंड-ऑफ हथियार कहा जाता है.

किन ठिकानों को निशाना बना सकता है?
SAAW को खास तौर पर एयरफील्ड के महत्वपूर्ण जमीनी ढांचे के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए बनाया गया है, इसमें शामिल हैं:

  • रनवे
  • टैक्सी ट्रैक
  • बंकर
  • रडार
  • एयरफील्ड से जुड़े दूसरे महत्वपूर्ण ठिकाने

DRDO ने अपने परीक्षणों में इसे दुश्मन के एयरफील्ड के ऐसे लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम बताया है. यानी इसका मकसद सीधे दुश्मन के लड़ाकू विमान से मुकाबला करना नहीं, बल्कि उस विमान के उड़ान भरने और संचालन के लिए जरूरी जमीन पर मौजूद ढांचे को निशाना बनाना है.

100 किलोमीटर तक की दूरी से हमला
SAAW की सबसे महत्वपूर्ण खूबियों में से एक इसकी स्टैंड-ऑफ क्षमता है. उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार इसकी अधिकतम रेंज 100 किलोमीटर तक है.

इसका अर्थ है कि लड़ाकू विमान को लक्ष्य के ठीक ऊपर जाकर बम गिराने की जरूरत नहीं पड़ती. विमान लक्ष्य से दूरी बनाए रखते हुए हथियार छोड़ सकता है.  युद्ध की स्थिति में यह क्षमता महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि इससे विमान को दुश्मन के एयर डिफेंस क्षेत्र में बहुत अंदर तक जाने की जरूरत कम हो सकती है.

125 किलो का हथियार, लेकिन सटीक हमला
SAAW को हल्के और सटीक निर्देशित हथियार के रूप में विकसित किया गया है. DRDO ने इसे इसी श्रेणी के हथियारों की तुलना में हल्का बताया है. तकनीकी विवरण के अनुसार इसका:

  • कुल वजन करीब 125 किलोग्राम है,
  • लगभग 72.5 किलोग्राम का वारहेड इस्तेमाल किया जाता है
  • इसकी लंबाई लगभग 1.85 मीटर बताई गई है

इसमें लक्ष्य पर प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए प्रोग्रामेबल इम्पैक्ट-डिले फ्यूज जैसी तकनीक भी शामिल है.

GPS और भारतीय नेविगेशन से लक्ष्य तक पहुंचता है
SAAW के सैटेलाइट नेविगेशन आधारित संस्करण में नेविगेशन सिस्टम हथियार को उसके निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचाने में मदद करता है. INS/GPS और GAGAN आधारित मार्गदर्शन का इस्तेमाल किया जाता है. इस कॉम्बिनेशन का उद्देश्य हथियार की दिशा और स्थिति को लगातार निर्धारित करते हुए उसे लक्ष्य तक पहुंचाना है.

इसके अलावा DRDO ने SAAW के Electro-Optical (EO) संस्करण का भी परीक्षण किया है. 2021 के परीक्षणों में सैटेलाइट नेविगेशन और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर वाले दोनों संस्करणों का सफल परीक्षण किया गया था.

EO-SAAW क्या है?
SAAW का इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल संस्करण इसे और अधिक सटीक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. इस संस्करण में Imaging Infra-Red (IIR) seeker का इस्तेमाल किया गया.  यानी हथियार सिर्फ पहले से दिए गए निर्देशांक पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि अंतिम चरण में सेंसर की मदद से लक्ष्य को पहचानने और उस पर सटीक हमला करने की क्षमता बढ़ाता है.  DRDO ने 2021 में इस तकनीक वाले SAAW का परीक्षण किया था

EO-SAAW की सटीकता 3 मीटर से कम तक बताई गई है, जबकि सैटेलाइट नेविगेशन वाले संस्करण के लिए 7 मीटर से कम की सटीकता का उल्लेख है.

किन लड़ाकू विमानों से लॉन्च हो सकता है?
SAAW का विकास अलग-अलग भारतीय वायुसेना प्लेटफॉर्म से इस्तेमाल को ध्यान में रखकर किया गया है. पुराने परीक्षणों में इसे Jaguar से लॉन्च किया गया था और बाद में Hawk-Mk132 से भी सफल परीक्षण किया गया. रक्षा मंत्रालय की 23 सितंबर 2026 की जानकारी के अनुसार SAT-SAAW को Jaguar, Hawk और Su-30 MKI जैसे प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है.

SAAW और SAT-SAAW में क्या संबंध है?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है.  SAAW मूल हथियार परिवार का नाम है, जबकि SAT-SAAW इसका सैटेलाइट-नेविगेशन आधारित संस्करण है. रक्षा मंत्रालय ने 23 सितंबर 2026 को SAT-SAAW को हवा से जमीन पर मार करने वाला सटीक निर्देशित ग्लाइड बम बताया है। इसे DRDO ने डिजाइन और विकसित किया है.

इसलिए SAT-SAAW को एक अलग तरह की मिसाइल समझना सही नहीं होगा. यह मूल रूप से एयर-लॉन्च्ड प्रिसीजन ग्लाइड वेपन है.

SAAW को ‘मिसाइल’ क्यों नहीं कहा जाता?
यह फर्क भी महत्वपूर्ण है. SAAW को आधिकारिक तौर पर precision-guided glide bomb कहा गया है. मिसाइल और ग्लाइड बम में एक बड़ा अंतर उनकी उड़ान प्रणाली में होता है. ग्लाइड बम को विमान से छोड़े जाने के बाद उसके वायुगतिकीय डिजाइन और मार्गदर्शन प्रणाली की मदद से लक्ष्य तक पहुंचाया जाता है. SAAW इसी श्रेणी में आता है.

यानी यह मिसाइल नहीं, बल्कि एक स्मार्ट और निर्देशित ग्लाइड बम है.

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है SAAW?
SAAW की सबसे बड़ी उपयोगिता यह है कि यह वायुसेना को दुश्मन के एयरफील्ड पर हमला करने के लिए एक स्वदेशी स्टैंड-ऑफ विकल्प देता है.

कल्पना कीजिए कि किसी एयरबेस का रनवे, टैक्सी ट्रैक या बंकर महत्वपूर्ण लक्ष्य है. लड़ाकू विमान को उस लक्ष्य के बिल्कुल ऊपर जाकर बम गिराने के बजाय दूर से SAAW छोड़ा जा सकता है. हथियार अपने मार्गदर्शन तंत्र के जरिए लक्ष्य तक पहुंचता है.

यही वजह है कि SAAW को केवल एक बम के तौर पर नहीं, बल्कि दुश्मन के एयर ऑपरेशन को जमीन से बाधित करने वाले हथियार के रूप में देखा जा सकता है.

भारत की स्वदेशी हथियार क्षमता में एक और कदम
SAAW का विकास DRDO के लिए भी महत्वपूर्ण है. इसके अलग-अलग संस्करणों के परीक्षणों में सैटेलाइट नेविगेशन और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है.

23 सितंबर 2026 को रक्षा मंत्रालय ने SAT-SAAW के लिए BDL के साथ ₹810.79 करोड़ का अनुबंध भी किया है. इसमें 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का प्रावधान है और कुछ उप-प्रणालियों के स्वदेशीकरण की बात कही गई है. इसकी आपूर्ति 2027-28 और 2028-29 के दौरान निर्धारित की गई है.

रनवे हो, बंकर हो या टैक्सी ट्रैक—SAAW का मकसद दुश्मन के विमान को हवा में रोकना नहीं, बल्कि जमीन पर उसके उड़ान तंत्र को निशाना बनाना है. यही इसे भारतीय वायुसेना के स्टैंड-ऑफ हथियारों में खास बनाता है.



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