रील-नेगेटिव से डिजिटल कैमरे तक… देहरादून के विवेक ने 50 साल में अपनी आंखों से देखा बदलती फोटोग्राफी का पूरा दौर

रील-नेगेटिव से डिजिटल कैमरे तक… देहरादून के विवेक ने 50 साल में अपनी आंखों से देखा बदलती फोटोग्राफी का पूरा दौर


देहरादून: जिस उम्र में बच्चे खिलौनों के साथ खेलना सीखते हैं, उस उम्र में राजधानी दून के रहने वाले विवेक भाटिया कैमरे के पीछे खड़े होकर तस्वीर बनते हुए देखते थे. महज 5 साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता को नेगेटिव से तस्वीर तैयार करते देखा और धीरे-धीरे कैमरे की दुनिया उन्हें भी अपनी तरफ खींचने लगी. पढ़ाई के बाद बचा समय वह पिता की दुकान पर बिताते और काम में उनका हाथ बंटाते थे. यही सिलसिला आगे बढ़ा और करीब 15 साल की उम्र तक वह खुद फोटोग्राफी के काम को अच्छी तरह सीख चुके थे.

देहरादून की गलियों और पहाड़ों को कैमरे में कैद करते हुए विवेक भाटिया ने फोटोग्राफी के कई दौर देखे हैं. उन्होंने एनालॉग कैमरे और नेगेटिव के दौर से लेकर डिजिटल फोटोग्राफी तक का सफर तय किया है. करीब 50 साल से कैमरे के साथ उनका यह रिश्ता लगातार बना हुआ है. आज भी वह जब कैमरा लेकर निकलते हैं तो तस्वीर के साथ उस पल की कहानी को भी कैद करने की कोशिश करते हैं.

पिता को कैमरे के साथ देखकर फोटोग्राफी में आया मन

विवेक भाटिया ने लोकल 18 को बताया कि उनके पिता भारतीय सेना में थे. उन्होंने कम उम्र में सेना ज्वाइन की थी और करीब 14 साल तक सेवा देने के बाद वॉलंटरी रिटायरमेंट लेकर घर लौट आए. इसके बाद उन्होंने कैमरा तकनीक सीखी और साल 1976 में फोटोग्राफी का काम शुरू किया. देहरादून के रेसकोर्स में उन्होंने अपनी दुकान खोली थी.

उनकी दुकान पर उस समय कैमरे के साथ स्टूडियो और डार्क रूम भी हुआ करता था. उस दौर में मोबाइल फोन नहीं थे, इसलिए शहर के लोग तस्वीर खिंचवाने के लिए स्टूडियो ही पहुंचते थे. विवेक बताते हैं कि वह 5 साल के थे, जब अपने पिता को नेगेटिव से तस्वीर तैयार करते हुए देखते थे.

पिता की मदद करते-करते खुद सीख गए कैमरे का काम

विवेक बताते हैं कि कई बार दुकान पर काम इतना ज्यादा आ जाता था कि उनके पिता को खाना खाने और सोने तक का समय नहीं मिलता था. वह डार्क रूम में पूरी-पूरी रात तस्वीरें तैयार करते थे. यह देखकर विवेक ने भी उनकी मदद करने की सोची. स्कूल से आने के बाद पढ़ाई का काम पूरा करके वह पिता की दुकान पर पहुंच जाते थे. शुरुआत में वह छोटे-छोटे कामों में मदद करते थे, लेकिन धीरे-धीरे कैमरे और तस्वीर तैयार करने की तकनीक समझने लगे. उन्हें यह भी पता चलने लगा कि फोटो कैसे क्लिक करनी है, नेगेटिव कैसे तैयार करना है और फिर उसी नेगेटिव से तस्वीर कैसे डेवलप करनी है.

15 साल की उम्र में बन गए फोटोग्राफर

विवेक बताते हैं कि लगातार पिता के साथ काम करते हुए करीब 15 साल की उम्र तक उन्हें फोटोग्राफी का पूरा काम समझ में आने लगा था. अब वह खुद तस्वीरें क्लिक करने के साथ नेगेटिव तैयार करने और फोटो डेवलप करने का काम भी कर लेते थे. इसके बाद फोटोग्राफी उनके लिए सिर्फ पिता की मदद करने का काम नहीं रहा, बल्कि उनका अपना हुनर बन गया. पिता के निधन के बाद दुकान की जिम्मेदारी भी उन्होंने संभाली. समय के साथ फोटोग्राफी में बदलाव आते गए और उन्होंने भी नई तकनीक सीखना जारी रखा.

नेगेटिव से डिजिटल कैमरे तक देखा पूरा दौर

विवेक ने फोटोग्राफी के उस दौर को भी करीब से देखा है, जब एक तस्वीर लेने के बाद उसे तैयार होने में समय लगता था. नेगेटिव तैयार करने से लेकर डार्क रूम में फोटो डेवलप करने तक की पूरी प्रक्रिया का वह हिस्सा रहे हैं. बाद में फोटोग्राफी में डिजिटल तकनीक आई तो उन्होंने उसे भी सीखा. आज वह डिजिटल फोटोग्राफी के दौर में भी काम कर रहे हैं. करीब 50 साल के इस सफर में कैमरे और तस्वीरों को लेकर तकनीक जरूर बदली, लेकिन फोटोग्राफी के प्रति उनका लगाव अब भी बना हुआ है. देहरादून की गलियों और पहाड़ों में कैमरा लेकर निकलना आज भी उनके लिए उतना ही खास है, जितना बचपन में पिता की दुकान पर बैठकर कैमरे को देखना हुआ करता था.



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