पैरों में घुंघरू बांधे तो मिली डांट और मार… जिस जुनून को रोकना चाहते थे दादा जी, उसी कला ने आशीष को विदेशी मंचों तक दिलाई पहचान

पैरों में घुंघरू बांधे तो मिली डांट और मार… जिस जुनून को रोकना चाहते थे दादा जी, उसी कला ने आशीष को विदेशी मंचों तक दिलाई पहचान


नैनीताल: जिस उम्र में बच्चों को खिलौनों से खेलने का शौक होता है, उस उम्र में आशीष सिंह के पैरों में घुंघरुओं की आवाज बसने लगी थी. मंदिरों में कीर्तन और संगीत के बीच उनका मन नृत्य में लगता था. लेकिन परिवार के सभी लोगों को उनका नृत्य करना पसंद नहीं था. दादाजी की नाराजगी झेलनी पड़ी, ताने सुनने पड़े और डांट-पिटाई भी हुई. इसके बावजूद आशीष का नृत्य के प्रति लगाव कम नहीं हुआ. बचपन में शुरू हुआ यही सफर आज उन्हें देश के साथ चीन तक कथक के मंचों पर ले गया है.

वाराणसी के रहने वाले युवा कथक कलाकार आशीष सिंह पिछले करीब 10 साल से वृंदावन में कथक की साधना कर रहे हैं. अब वह नैनीताल पहुंचे हैं. यहां वह नई पीढ़ी को भारतीय शास्त्रीय नृत्य से जोड़ने के लिए काम कर रहे हैं. इसी कड़ी में नैनीताल के तल्लीताल स्थित वृंदावन स्कूल में 25 से 29 सितंबर तक निशुल्क कथक कार्यशाला आयोजित की जा रही है.

बचपन से ही नृत्य की ओर बढ़ा मन

आशीष का जन्म काशी के कबीरचौरा में हुआ था. वह बताते हैं कि जब वह काफी समय बाद अपने माता-पिता से मिले तो परिवार में खुशी का माहौल था. इसी मौके पर एक संगीत कार्यक्रम आयोजित किया गया था. इस कार्यक्रम में कथक नृत्यांगना सरला नारायण सिंह ने उन्हें गोद में लेकर होली नृत्य प्रस्तुत किया था. आशीष मानते हैं कि शायद कथक से उनके जुड़ाव की शुरुआत वहीं से हुई. बचपन में ही उनका मन नृत्य की ओर लगने लगा. आसपास के मंदिरों में कीर्तन होता तो वह वहां नृत्य करने लगते थे. हालांकि परिवार के कुछ लोगों को उनका यह शौक पसंद नहीं था. दादाजी की नाराजगी के बावजूद उनकी मां और दादी ने उनका साथ दिया. शुरुआत में आशीष ने लोकगीतों के जरिए नृत्य सीखा. धीरे-धीरे उनका रुझान कथक की ओर बढ़ता गया और यही कला उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गई.

बिरजू महाराज की शिष्या से सीखा कथक

कथक के प्रति बढ़ते लगाव के बाद आशीष ने इसकी बाकायदा शिक्षा लेनी शुरू की. उन्होंने बनारस में पद्म विभूषण पंडित बिरजू महाराज की शिष्या संगीता सिन्हा से कथक सीखा. इसके बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय से कथक में स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की. आशीष के लिए कथक सिर्फ नृत्य नहीं है. वह इसे वर्षों की साधना, अनुशासन और समर्पण से जुड़ी कला मानते हैं. उनके अनुसार कथक की परंपरा मंदिरों से शुरू हुई और आगे चलकर राजाओं के दरबारों और अलग-अलग मंचों तक पहुंची.

देश से चीन तक दे चुके हैं प्रस्तुति

आशीष सिंह ने देश के कई शहरों में कथक की प्रस्तुतियां दी हैं. इलाहाबाद, मुंबई, पुणे, कोलकाता और लखनऊ समेत कई शहरों के मंचों पर वह अपनी कला प्रस्तुत कर चुके हैं. इसके अलावा चीन में भी कथक की प्रस्तुति दे चुके हैं. आशीष का कहना है कि कथक को सिर्फ बड़े शहरों और बड़े मंचों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. वह चाहते हैं कि देश के दूरदराज इलाकों में रहने वाले युवा भी इस भारतीय शास्त्रीय नृत्य को सीखें और समझें.

2500 से ज्यादा लोगों को सिखा चुके हैं कथक

आशीष अब तक करीब 2500 लोगों को कथक का प्रशिक्षण दे चुके हैं. नैनीताल में चल रही निशुल्क कार्यशाला भी इसी प्रयास का हिस्सा है. उनका कहना है कि अगर युवा पीढ़ी भारतीय शास्त्रीय नृत्य को सीखेगी और समझेगी तो कथक की परंपरा आगे भी बनी रहेगी. वह अटक से कटक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक कथक की पहुंच बनाने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहे हैं. इसी कोशिश के तहत वह पहाड़ की नई पीढ़ी को भी इस कला से जोड़ना चाहते हैं.

बड़े मंचों से ज्यादा अब साधना पर ध्यान

कभी परिवार की नाराजगी और डांट-पिटाई के बीच शुरू हुआ आशीष का नृत्य का सफर आज देश-विदेश के मंचों तक पहुंच चुका है. पहले बड़े मंचों पर प्रस्तुति देना उनके सफर का हिस्सा था, लेकिन अब उनकी प्राथमिकता अपनी साधना है. आशीष बताते हैं कि वर्तमान में श्री राधारमण को अपनी कला से प्रसन्न करना ही उनकी साधना का प्रमुख उद्देश्य है. नैनीताल की यह कार्यशाला भी उनके लिए सिर्फ कथक सिखाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि इस कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की एक और कोशिश है.



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