मां बनने के बाद अपनों ही बच्चों की कातिल क्यों बन जाती है मां, क्या है बेंगलुरू का मामला?

मां बनने के बाद अपनों ही बच्चों की कातिल क्यों बन जाती है मां, क्या है बेंगलुरू का मामला?


बरसों के इंतजार के बाद घर में किलकारी गूंजी. एक साथ जुड़वा बेटियों ने जन्म लिया. बच्चों को जन्म देने वाली उमा देवी में तो जैसे उन बच्चियों की जान बसती थी, 4 महीने में न जाने ऐसा क्या बदला कि यही मां अपनी फूल की बच्चियों की कातिल बन गई. बीते 1 सितंबर को उमा देवी ने पहले अपनी बच्चियों को मारा और उसके बाद खुद भी जान देने की कोशिश की. परिवार ने उन्हें बचा लिया और बेंगलुरु के नीमहंस मानसिक स्वास्थ्य संस्थान में भर्ती कराया है.

उमा देवी की इस हालत का जिम्मेदार पोस्टपार्टम साइकोसिस को बताया गया है. यह ऐसी मानसिक स्थिति होती है जो डिलीवरी के बाद तेजी से महिलाओं को अपना शिकार बनाती है. पोस्टमार्टम हुए रिसर्च के मुताबिक हर 5 में से 1 महिला इस मानसिक अवस्था से प्रभावित है. हैरानी की बात तो यह है कि इनमें से ज्यादातर को समय पर इलाज भी नहीं मिल पाता. खुद नीमहंस मानसिक स्वास्थ्य संस्थान की ओर से कराए गए एक अध्ययन के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि पोस्टपार्टम से जूझने वाली तकरीबन 44 प्रतिशत महिलाओं को समय पर इलाज ही नहीं मिल पाता.

क्या था बेंगलुरु का मामला?

बेंगलुरु के रियल एस्टेट डीलर रामलिंगप्पा एसएच और पत्नी उमा देवी के घर मई में दो जुड़वा बच्चियों का जन्म हुआ था. रामलिंगप्पा के मुताबिक उमा देवी बच्चों का खूब खयाल रखती थी, लेकिन कुछ समय बाद ही उनका व्यवहार बदला नजर आने लगा. न तो रात में उमा सोतीं और न ही किसी और चीज का ध्यान रखतीं. वह कहने लगीं कि उन्हें बच्चों से डर लग रहा है.

वह इनकी देखभाल नहीं कर सकतीं. रामलिंगप्पा के हवाले से एक्सप्रेस ने लिखा है कि वह और उनकी मां बच्चों को संभालती थी, क्योंकि उन्हें उमा की तबीयत खराब होने का बहसास हो गया था. हम एक मनोचिकित्सक के पास भी गए, मगर कोई सुधार नहीं हुआ. इसके बाद 8 अगस्त को उन्हें नीमहंस ले गए. डॉक्टर ने यहां पोस्पार्टम डिप्रेशन के लक्षण बताए और दवां दीं. अस्पताल में उमा देवी को भर्ती करने को कहा गया, मगर वह तैयार नहीं हुईं.

उमा तब तक गंभीर शिकार नहीं हुई थीं. किसी दिन वह सही नजर आती थीं तो किसी दिन साफ दिखता था कि स्ट्रेस में है. 1 सितंबर को रामलिंगप्पा जरूरी काम से घर से बाहर गए थे. घर पर उमा की मां, रामलिंगप्पा की मां और दो बहनें भी थीं. रामलिंगप्पा की ओर से तलघट्टापुरा पुलिस में दी गई शिकायत के मुताबिक जब वह तकरीबन 3 बजे लौटे तो पता चला कि उमा देवी ने जुड़वा बच्चों के साथ खुद को कमरे में बंद कर लिया है. जब दरवाजा खोलकर देखा गया तो वह दुपट्टे से फंदा बना चुकी थीं. उमा को बचाया गया, बाद में पता चला कि वह अपनी दोनों बच्चियों की जान ले चुकी थीं.

क्या होता है पोस्टपार्टम साइकोसिस?

पोस्टपार्टम साइकोसिस एक गंभीर मानसिक स्थिति है. इसमें डिलीवरी के बाद महिला की मानसिक स्थित पूरी तरह बिगड़ जाती है. आम तौर पर यह डिलीवरी के दो सप्ताह के अंदर शुरू होता है. यह एक मेडिकल इमरजेंसी है, क्योंकि ये मां और शिशु दोनों के लिए खतरा होती है. ऐसे में महिलाओं को ऐसी चीजें दिखाई व सुनाई दे सकती है जो वास्तव में नहीं होती हैं. महिलाएं यहां तक सोच सकती हैं कि बच्चा उनका नहीं है. वह खुद को भी नुकसान पहुंचा सकती हैं और बच्चों को भी. इसमें इतनी तेजी से बदलाव आता है है कि महिलाओं के लिए लक्षणों को संभालना बहुत कठिन हो जाता है.

सामान्य हैं लक्षण जो कर दिए जाते हैं नजर अंदाज

पोस्टपार्टम के लक्षण सामान्य हैं, इसीलिए ज्यादातर लोग इन्हें नजर अंदाज कर देते हैं. नीमहंस में मनोचिकित्सा की प्रोफेसर और मदर-बेबी यूनिट की प्रभारी गीता देसाई के हवाले से एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक उदासी, चिंता, थकान, भूख न लगना और नींद आने में कठिनाई होना इसके लक्षण है. उन्हें ये लग सकता है कि वह बच्चे की देखभाल नहीं कर पा रही हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2017 में आई रिपोर्ट के मुताबिक पोस्टपार्टम की शिकार महिलाओं की संख्या 22 प्रतिशत यानी हर 5 में से हो सकती है.

क्यों इसका शिकार होती हैं महिलाएं?

पोस्टमार्टम साइकोसिस चिकित्सीय और सामाजिक दोनों कारणों से हो सकता है. मेडिकल रिसर्च के मुताबिक पोस्टपार्टम साइकोसिस एक गंभीर न्यूबायोलॉजिकल और जेनेटिक समस्या है. खासतौर ये हार्मोन में होने वाले बदलाव से होती है. डिलीवरी के बाद जब शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का स्तर बहुत बढ़ जाता है तब ब्रेन में एक तरह का केमिकल लोचा होता है. स्वीडन की नेशनल रजिस्ट्री में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक किसी महिला की बहन या माँ को यह समस्या है तो उसमें इस समस्या का जोखिम दस गुना ज्यादा बढ़ जाता है. खासतौर प्रसव के बाद नींद पूरी न होना इसे ज्यादा ट्रिगर करता है.

दूसरी वजह हैं एकल परिवार और अकेलापन. डिलीवरी के बाद महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर हुई रिसर्च को PMC ने जगह दी है. इसके मुताबिक संयुक्त परिवारों में बच्चों की देखभाल के लिए परिवार के बहुत लोग होते हैं, जबकि एकल परिवारों में यह जिम्मेदारी अकेली मां पर आ जाती है. इससे उसकी नींद पूरी नहीं होती और मानसिक और शारीरिक थकान चरम पर पहुंच जाती है. सबसे खास बात ये है कि महिलाओं को इसके लक्षणों का पता ही नहीं चलता कि आखिर उनके साथ क्या हो रहा है?



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