फसल, परिवार की खुशहाली और समृद्धि की कामना, युवतियां रखती हैं निर्जला व्रत
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सरगुजा में आदिवासी और स्थानीय समुदाय आज भी पूर्वजों से चली आ रही कर्मा पूजा की परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं. भादो महीने की एकादशी को मनाए जाने वाले इस पर्व में अच्छी फसल, परिवार की खुशहाली और समृद्धि की कामना की जाती है. अविवाहित युवतियां निर्जला व्रत रखती हैं और कर्मा पेड़ की डाल की पूजा करती हैं.
सरगुजा. सरगुजा में पूर्वजों से चली आ रही कर्मा पूजा की परंपरा को आदिवासी समुदाय आज भी निभा रहा है. यह पर्व अच्छी फसल की कामना के लिए मनाया जाता है, जिसमें अविवाहित युवतियां निर्जला व्रत रखती हैं. स्थानीय जानकार सिकंदर प्रजापति ने बताया कि कर्मा पूजा पूर्वजों के समय से चली आ रही एक परंपरा है. भादो महीने की 11वीं तिथि यानी एकादशी के दिन यह पूजा की जाती है. हर साल इसी तिथि पर यह पर्व मनाया जाता है. हिंदू समाज के मांझी, मजवार, कंवर, कुम्हार और गोंड समाज सहित कई समुदाय इस परंपरा में शामिल होते हैं. पूजा के बाद व्रत खोलने और प्रसाद बांटने की परंपरा भी कई जगहों पर निभाई जाती है.
कर्मा पूजा को प्रकृति और खेती से भी जोड़कर देखा जाता है. ग्रामीण मान्यताओं के अनुसार, धान की अच्छी फसल, गांव में सुख-शांति और समृद्धि की कामना के साथ कर्म देवता की पूजा की जाती है. इसे पूर्वजों से मिली परंपरा और मानवता से जुड़ी आस्था के रूप में माना जाता है.
निर्जला व्रत रखती हैं युवतियां
कर्मा पूजा के दिन अविवाहित युवतियां सुबह से निर्जला व्रत रखती हैं. पूरे दिन बिना खाना-पानी ग्रहण किए शाम तक व्रत किया जाता है. शाम के समय स्नान करने के बाद पूजा की तैयारियां शुरू होती हैं.
जंगल से लाई जाती है कर्म की डाली
शाम करीब 7 से 8 बजे के बीच कर्म की डाली जंगल से लाई जाती है. मान्यता के अनुसार, इसे जमीन पर नहीं रखा जाता. इसे कंधे पर लेकर घर लाया जाता है और आंगन में पूजा के लिए रखा जाता है. खास बात यह है कि कर्म की डाली को काटने के बजाय परंपरा के अनुसार तोड़कर लाया जाता है.
दूध से स्नान, फिर आंगन में स्थापना
घर लाने के बाद कर्म देवता को थाली में रखा जाता है और दूध से स्नान कराया जाता है. इसके बाद इसे घर के छप्पर में स्थापित किया जाता है.