मजदूरों पर तारिक रहमान ने चलवाईं लाठियां, असंतोष में तप रहा बांग्‍लादेश जलने लगा – exclusive Heavy Crackdown On Bangladesh Garment Factory Workers

मजदूरों पर तारिक रहमान ने चलवाईं लाठियां, असंतोष में तप रहा बांग्‍लादेश जलने लगा – exclusive Heavy Crackdown On Bangladesh Garment Factory Workers


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Bangladesh Revolt Part-2: बांग्‍लादेश की पहचान दुनियाभर में सस्‍ते रेडिमेड गारमेंट के एक्‍सपोर्टर के तौर पर है. रेडिमेड गारमेंट सेक्‍टर ढाका की अर्थव्‍यवस्‍था के लिए ऑक्‍सीजन की तरह है. सप्‍लाई बंद और हल में जान. बेहतर और उचित मेहनताने की मांग को लेकर बांग्‍लादेश कपड़ा फैक्‍ट्री में काम करने वाले हजारों लोग सड़कों पर आकर विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि इन कामगारों की डिमांड पर गौर करने के बजाय तारिक रहमान की अगुआई वाली सरकार ने उनपर लाठियां चलवा दीं. हालात को देखते हुए गारमेंट फैक्‍ट्रीज को बंद कर दिया गया है.

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बांग्‍लादेश की कपड़ा फैक्ट्रियों में काम करने वाले कामगारों ने जीवन-यापन लायक वेतन की मांग को लेकर हिंसक विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं. गाजीपुर में पुलिस और प्रदर्शनकारी आमने-सामने आ गए. (फोटो: Reuters)

Bangladesh Revolt Part-2: पड़ोसी देश बांग्‍लादेश एक बार फिर से जल उठा है. इस विरोध की मशाल कपड़ा फैक्ट्रियों में काम करने वाले कामगारों ने उठा ली है. रेडिमेड गारमेंट बांग्‍लादेश की इकोनॉमी के लिए ऑक्‍सीजन की तरह है. सप्‍लाई बंद और हलक में जान. ढाका की स्थिति अभी कुछ वैसा ही है. कपड़ा फैक्‍ट्र‍ियों में काम करने वाले मजदूरों और कारीगरों की ओर से न्‍यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग की जा रही है. दूसरी तरफ, प्रधानमंत्री तारिक रहमान की अगुआई वाली सरकार ने इस मुद्दे से निपटने के बजाय प्रदर्शनकारी कामगारों पर लाठियां चलवा दीं और आंसू गैस के गोले दगवा दिए. इससे माहौल और भी बिगड़ गया है. अब हालात ऐसे हैं कि नारायणपुर से लेकर गाजीपुर तक में आग लग गई है. हिंसक विरोध-प्रदर्शनों का दौर बेकाबू हो चुका है. बांग्‍लादेश की अर्थव्‍यवस्‍था को गत‍ि प्रदान करने वाली कपड़ा फैक्ट्रियां बंद कर दी गई हैं. इससे पहले जब ढाका में आग लगी थी तो शेख हसीना की सरकार उसमें स्‍वाहा हो गई थी. अब देखना है कि मौजूदा विरोध-प्रदर्शन की आंच की जद में कौन-कौन आता है.

बांग्लादेश में बेहतर वेतन की मांग को लेकर हजारों कपड़ा उद्योग श्रमिकों का आंदोलन हिंसक हो गया है. प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षा बलों ने आंसू गैस के गोले दागे और लाठीचार्ज किया. कई औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिकों और पुलिस के बीच झड़पों, पथराव तथा वाहनों में आगजनी की घटनाएं सामने आई हैं. हिंसक टकराव में दर्जनों श्रमिकों और सुरक्षाकर्मियों के घायल होने की खबर है. प्रधानमंत्री तारिक रहमान की नई सरकार के सामने यह अब तक की बड़ी आर्थिक और राजनीतिक चुनौती बनकर उभरा है. गाजीपुर, आशुलिया, सावर, मीरपुर और नारायणगंज समेत प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन का व्यापक असर पड़ा है. हालात बिगड़ने के कारण 400 से 670 तक कपड़ा इकाइयों को अपना कामकाज अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा है या उत्पादन रोकना पड़ा है. इससे देश के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में तनाव का माहौल है.

प्रदर्शनकारियों की क्‍या है डिमांड
प्रदर्शनकारी श्रमिकों की प्रमुख मांग न्यूनतम मासिक वेतन को मौजूदा 12,500 टका से बढ़ाकर 30,000 टका करना है. श्रमिक संगठनों का कहना है कि महंगाई और रोजमर्रा की जरूरतों की बढ़ती कीमतों के कारण मौजूदा वेतन में परिवार चलाना मुश्किल हो गया है. उनका तर्क है कि करीब आठ प्रतिशत मुद्रास्फीति के बीच खाद्य पदार्थों, परिवहन और आवास की लागत लगातार बढ़ रही है. कामगारों के मुताबिक उनकी कमाई का लगभग आधा हिस्सा मकान के किराये में और करीब एक चौथाई रसोई गैस जैसी जरूरी जरूरतों पर खर्च हो जाता है. ऐसे में बच्चों की पढ़ाई, पौष्टिक भोजन और अन्य बुनियादी जरूरतों के लिए पर्याप्त पैसे नहीं बचते. सरकार की ओर से गठित वेतन बोर्ड भी अब तक इस विवाद का समाधान निकालने में सफल नहीं हुआ है.

नारायणपुर में भी कपड़ा फैक्‍ट्री में काम करने वाले कामगार हिंसक विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं. (फोटो: Reuters)

बांग्‍लादेश के लिए कितना बड़ा संकट
बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए यह संकट इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश के कुल निर्यात में रेडीमेड गारमेंट (आरएमजी) उद्योग की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक है. इस क्षेत्र से करीब 40 लाख श्रमिकों की आजीविका जुड़ी हुई है. उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि उत्पादन लंबे समय तक बाधित रहने से अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के ऑर्डर की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. इससे शिपमेंट में देरी, ऑर्डर रद्द होने और वैश्विक बाजार में बांग्लादेश की प्रतिस्पर्धी स्थिति कमजोर पड़ने का खतरा है.

विपक्ष का क्‍या रवैया
इस बीच श्रमिक आंदोलन ने राजनीतिक रूप भी ले लिया है. जमात-ए-इस्लामी ने 30,000 टका न्यूनतम वेतन की मांग को जायज बताते हुए प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया है. नेशनल सिटिजन पार्टी ने भी श्रमिकों के प्रति एकजुटता जताई है. वहीं, सरकार ने आंदोलन के पीछे प्रतिबंधित अवामी लीग के तत्वों की कथित घुसपैठ और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने की साजिश का आरोप लगाया है. हालांकि, श्रमिक नेताओं और विपक्षी दलों ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि आंदोलन की असली वजह आर्थिक बदहाली और बढ़ती महंगाई है. ऐसे में औद्योगिक क्षेत्रों में जारी तनाव ने तारिक रहमान सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.



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