ECINet से लेकर फॉर्म-6 तक! विवाद के बाद चुनाव आयोग ने कितने फैसले बदले

ECINet से लेकर फॉर्म-6 तक! विवाद के बाद चुनाव आयोग ने कितने फैसले बदले


EC Changed Many Decissions: बीते सितंबर में चुनाव आयोग के भीतर गंभीर अनबन की खबर आई थी. इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में दावा किया था कि दो चुनाव आयुक्तों ने आयोग के कई फैसलों पर अपनी असहमति दर्ज करवाई थी. उस रिपोर्ट के बाद विपक्ष लगातार मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है. विपक्ष आयोग पर पक्षपात का आरोप लगा रहा है. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है. विपक्ष लगातार आंदोलन कर रहा है और कह रहा है कि आयोग के कई फैसले असंवैधानिक हैं. खैर, ये सब विपक्ष के आरोप हैं. इसका फैसला तो केवल सुप्रीम कोर्ट ही कर सकता है कि आयोग के फैसले संवैधानिक हैं या नहीं. इस बीच चुनाव आयोग ने भी कई कदम उठाए हैं. माना जा रहा है कि मीडिया रिपोर्ट के बाद आयोग ने उठ रहे सवालों को ठीक करने की कोशिश में ये कदम उठाए हैं. इस क्रम में आयोग ने एक-एक कर अपने फैसलों में कई बदलाव किए हैं.

पांच हफ्ते में बदले कई नियम

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बाद पांच हफ्तों के भीतर आयोग ने लगभग सभी मुद्दों पर कदम उठाए. बैठकों की कार्यवाही से लेकर अधिकारियों की विदेश यात्राओं, नए आईटी पोर्टल और मतदाता सूची के प्रबंधन तक में बदलाव किए गए.

अब आयोग की हर बैठक से पहले सदस्यों को एजेंडा भेजना और बैठक के बाद कार्यवाही का विवरण जारी करना अनिवार्य कर दिया गया है. पहले दोनों आयुक्तों ने शिकायत की थी कि न तो एजेंडा साझा किया जा रहा था और न ही बैठक की कार्यवाही का रिकॉर्ड दिया जाता है. इसी तरह अधिकारियों की विदेश यात्राओं के लिए भी अब आयोग की मंजूरी जरूरी होगी. दोनों आयुक्तों ने बिना अनुमति विदेश जाने वाले अधिकारियों पर सवाल उठाए थे.

नए पोर्टल के लिए आयोग की मंजूरी जरूरी

आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग यानी डीजी आईटी के कामकाज पर भी आपत्ति जताई गई थी. आरोप था कि विभाग आयोग को जानकारी दिए बिना नए आईटी मॉड्यूल और पोर्टल तैयार कर रहा था. अब ऐसे सभी प्रस्ताव पहले अधिकारियों की समिति के सामने रखे जाएंगे. इसके बाद आयोग की मंजूरी ली जाएगी.

ECINet के कामकाज की जांच के लिए भी 14 अक्टूबर को एक समिति बनाई गई है. इसमें वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त, अन्य वरिष्ठ और उप निर्वाचन आयुक्त, चार राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारी तथा आईआईटी बॉम्बे और आईआईएससी बेंगलुरु के दो विशेषज्ञ शामिल हैं. समिति यह जांच करेगी कि ECINet का संचालन संबंधित कानूनों और नियमों के मुताबिक हो रहा है या नहीं.

दरअसल, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 29 मई को ही ECINet के ऑडिट की मांग की थी. उन्होंने मतदाता सूची के डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकृत होने पर चिंता जताई थी. सुखबीर सिंह संधू ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया था और 14 अगस्त को दर्ज किया था कि इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.

ECINet तक अधिकारियों के एक्सेस बढ़े

ECINet को लेकर एक बड़ी आपत्ति यह थी कि सॉफ्टवेयर के जरिए जमीनी स्तर के अधिकारियों के अधिकार सीमित किए जा रहे थे. मतदाता सूची से जुड़े फैसलों की कानूनी जिम्मेदारी निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO), जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) और मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) की होती है. लेकिन सॉफ्टवेयर पर नियंत्रण केंद्रीय स्तर पर होने से उनके कामकाज में बाधा आ रही थी.

अब आयोग ने सॉफ्टवेयर में चार अहम बदलाव किए हैं. महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस. चोकलिंगम ने 24 सितंबर को ये बदलाव सुझाए थे. इसके तहत मतदाता सूची में नाम के मिलान या तार्किक विसंगति के मामलों में व्यक्तिगत सुनवाई अब अपवाद होगी. बूथ लेवल अधिकारी (BLO) मतदाताओं के घर जाकर दस्तावेज जुटा सकेंगे. मतदाता पहले से तय 13 श्रेणियों के अलावा दूसरे दस्तावेज भी जमा कर सकेंगे. ERO तार्किक विसंगति वाले मामलों में खुद फैसला ले सकेंगे. उन्हें हर मामला जिला निर्वाचन अधिकारी के पास भेजने की जरूरत नहीं होगी. साथ ही, पिछली SIR मतदाता सूची का अंश अपलोड करना भी अनिवार्य नहीं रहेगा.

गोवा के 97 मतदाताओं के नाम जुड़े

ECINet की तकनीकी खामी का एक मामला गोवा में सामने आया था. ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए गए 97 लोगों ने जरूरी दस्तावेज जमा किए थे. स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों ने उनके नाम बहाल करने की मंजूरी भी दे दी थी. लेकिन सॉफ्टवेयर में नाम दोबारा जोड़ने का विकल्प नहीं था. गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने सात दिनों में आठ बार आयोग को पत्र लिखा, लेकिन अंतिम मतदाता सूची में इन लोगों के नाम नहीं जुड़ सके.

अब आयोग ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इनके नाम शामिल कराने की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है. आयोग के हलफनामे के मुताबिक 97 में से 88 लोगों ने फॉर्म-6 भरा है और उनके आवेदन स्वीकार कर लिए गए हैं. छह लोग विदेश में हैं, जबकि तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट हैं.

फॉर्म-6 के साथ SIR का घोषणा पत्र नहीं

मतदाता सूची से छूटे लोगों के नाम जोड़ने के लिए आयोग ने दो और कदम उठाए हैं. 29 सितंबर को उन राज्यों में विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया गया, जहां SIR पूरा हो चुका है. इसका मकसद छूटे हुए पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना है. इसके अलावा 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SSR) कराया जा रहा है. इसका मुख्य उद्देश्य 2027 में 18 साल की उम्र पूरी करने वाले युवाओं को मतदाता सूची में जोड़ना है. इस दौरान फॉर्म-6 भरने वालों को SIR से जुड़ा घोषणा पत्र नहीं देना होगा.



Source link