ट्रंप मैजिक फुस्स क्यों हुआ? कौन सी गलती रिपब्लिकन पर पड़ी भारी? अमेरिकी जनता में गुस्से की वजह क्या

ट्रंप मैजिक फुस्स क्यों हुआ? कौन सी गलती रिपब्लिकन पर पड़ी भारी? अमेरिकी जनता में गुस्से की वजह क्या


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ट्रंप मैजिक अमेरिका में फुस्स क्यों हुआ? कौन सी गलती रिपब्लिकन की नाव ले डूबी

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US Mid term Election 2026: अमेरिका के 2026 के मिडटर्म चुनावों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है. डेमोक्रेटिक पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट, दोनों पर ही कंट्रोल हासिल कर लिया है. इसमें खास बात यह है कि डेमोक्रेट्स ने उन राज्यों में भी रिपब्लिकन कैंडिडेट्स को शिकस्त दी, जिन्हें कभी ट्रंप और उनकी पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता था. हालांकि इस नतीजे को केवल सत्ता में मौजूद पार्टी के खिलाफ जनता की नाराजगी मान लेना ही काफी नहीं होगा. इसके पीछे ईरान के साथ जारी जंग, महंगाई, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें, ट्रंप की टैरिफ नीति, सरकार पर करप्शन के आरोप और खुद ट्रंप की सियासत जैसे कई सारे कारण हैं.

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अमेरिका में मिडटर्म चुनाव के बाद ट्रंप ने भी स्वीकार किया कि ईरान युद्ध भी एक अहम वजह रही, जिससे रिपब्लिकन पार्टी को शिकस्त झेलनी पड़ी. हालांकि, उन्होंने अपने सैन्य फैसले को सही ठहराने से परहेज नहीं किया. अब सवाल है कि आखिर दो साल पहले जिस राजनीतिक गठबंधन ने ट्रंप को दूसरी बार राष्ट्रपति बनाया था, वह इतनी जल्दी कमजोर कैसे पड़ गया? क्या अमेरिकी जनता को ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ पॉलिसी से मोहभंग हो गया है? और क्या यह हार दो साल बाद 2028 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले रिपब्लिकन पार्टी के लिए बड़े खतरे का संकेत है?

रिपब्लिकन पार्टी की हार के पीछे जिन मुद्दों की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, उनमें ईरान युद्ध सबसे अहम है. ट्रंप ने 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में अमेरिका को विदेशी युद्धों से दूर रखने और अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देने का वादा किया था. उनकी राजनीति का एक बड़ा आधार ‘अमेरिका फर्स्ट’ रहा है. इसका मतलब था कि अमेरिका को दूसरे देशों के विवादों में उलझने के बजाय अपने नागरिकों, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए. लेकिन ईरान के साथ युद्ध ने इसी राजनीतिक संदेश पर सवाल खड़े कर दिए. खुद ट्रंप ने भी रिपब्लिकन पार्टी की हार में ईरान का मुद्दा होना स्वीकार किया.

ईरान वार को लेकर ट्रंप प्रशासन की रणनीति और उसके खत्म होने की समयसीमा भी लगातार सवालों के घेरे में रही. कभी ट्रंप ने सैन्य कार्रवाई बढ़ाने की चेतावनी दी, तो कभी कहा कि वह जब चाहें युद्ध खत्म कर सकते हैं. लेकिन अमेरिकी जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि आखिर इस युद्ध का अंत कब होगा और इससे अमेरिका को क्या हासिल होगा? डेमोक्रेटिक का तर्क रहा कि एनर्जी मार्केट प्रभावित हो रहा है और आम अमेरिकी को महंगे ईंधन की कीमत चुकानी पड़ रही है. यानी जिस युद्ध को ट्रंप ने अमेरिकी सुरक्षा और हितों के लिए जरूरी बताया, उसी को विपक्ष ने अमेरिकी परिवारों पर बढ़ते आर्थिक बोझ से जोड़ दिया.

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ट्रंप की 2024 की चुनावी जीत के पीछे एक बड़ा मुद्दा अमेरिका की अर्थव्यवस्था था. उस समय अमेरिकी वोटर्स का एक बड़ा वर्ग महंगाई, महंगे किराने के सामान, मकान और ईंधन की कीमतों से परेशान था. ट्रंप ने वादा किया था कि वह सत्ता में लौटते ही महंगाई पर काबू पाएंगे और अमेरिकी परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधारेंगे. लेकिन 2026 के मिडटर्म चुनाव तक यह मुद्दा उनके खिलाफ चला गया. महंगाई का असर लोगों के रोजमर्रा के जीवन से है.

ट्रंप की आर्थिक नीति का एक अहम हिस्सा आयात पर टैरिफ यानी दूसरे देशों से आने वाले सामान पर टैक्स लगाना रहा है. ट्रंप का तर्क था कि दूसरे देशों से आने वाले सामान पर शुल्क बढ़ाने से अमेरिकी कंपनियों को फायदा होगा. प्रोडक्शन बढ़ेगा, रोजगार के नए मौके पैदा होंगे, विदेशी कंपनियां अमेरिकी बाजार में कम्पटीशन के लिए लोकल लेवल पर इनवेस्ट करने को मजबूर होंगी. लेकिन इससे मामला ही उलट गया. जब आयातित सामान पर शुल्क बढ़ता है तो उसका असर सिर्फ विदेशी कंपनियों पर नहीं पड़ता. कई बार आयात करने वाली अमेरिकी कंपनियां भी इसकी अतिरिक्त लागत ग्राहकों से वसूलती हैं. इससे बाजार में सामान महंगा हो सकता है. इसके अलावा दूसरे देशों की जवाबी कार्रवाई से अमेरिकी निर्यातकों को भी नुकसान पहुंच सकता है.

ट्रंप की राजनीतिक लोकप्रियता का एक बड़ा कारण उनका यह दावा रहा है कि वह अमेरिकी जनता के हितों को सबसे ऊपर रखते हैं. उनके समर्थकों को लगता था कि वह अमेरिका को दूसरे देशों के बीच युद्ध और अंतरराष्ट्रीय मामलों में उलझने से बचाएंगे. वह देश की सीमाओं, रोजगार, व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देंगे. लेकिन ईरान युद्ध के लंबा खिंचने से इस ग्रुप के अंदर भी विरोधाभास पैदा हुआ. एक तरफ ट्रंप अमेरिका को विदेशी युद्धों से दूर रखने की बात करते रहे, दूसरी तरफ उनकी सरकार एक लंबे सैनिक संघर्ष में उलझ गई. इससे रिपब्लिकन पार्टी के अंदर भी असहज स्थिति पैदा हुई.

इस चुनाव में महंगाई और ईरान युद्ध के साथ भ्रष्टाचार का मुद्दा भी काफी अहम रहा. डेमोक्रेटिक पार्टी ने ट्रंप प्रशासन और उनके परिवार के आर्थिक हितों को लेकर सवाल उठाए. चुनाव प्रचार में यह मुद्दा भी उठाया गया कि जब आम अमेरिकी परिवार महंगाई से जूझ रहे हैं, तब राष्ट्रपति और उनके करीबियों की संपत्ति और कारोबारी हितों को लेकर लगातार चर्चा क्यों हो रही है. खासतौर पर ट्रंप परिवार के क्रिप्टो कारोबार और उससे जुड़े आर्थिक लाभों को लेकर डेमोक्रेट्स ने सवाल उठाए. विपक्ष ने इस मुद्दे को आम आदमी की आर्थिक परेशानी से जोड़कर पेश किया. उसका तर्क था कि सरकार को जनता की जेब की चिंता होनी चाहिए, ना कि सत्ता से जुड़े लोगों के कारोबारी हितों की.

मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने दोनों सदनों में बढ़त हासिल कर कांग्रेस पर अपना कंट्रोल स्थापित कर लिया. ये नतीजे सिर्फ मौजूदा सरकार के लिए चेतावनी नहीं हैं, बल्कि 2028 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी अहम संकेत देते हैं. ट्रंप संविधान के तहत तीसरी बार राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ सकते. ऐसे में रिपब्लिकन पार्टी को 2028 के लिए नया चेहरा और नई चुनावी रणनीति तैयार करनी होगी. लेकिन पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती ट्रंप के राजनीतिक आधार को बचाए रखने की होगी. अगर युवा, हिस्पैनिक और अश्वेत मतदाताओं के बीच रिपब्लिकन समर्थन इसी तरह कमजोर बना रहता है तो 2028 में पार्टी के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

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