‘क्या आपको लगता है कि हमारे भविष्य को रोशन करने वाले क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग के लिए भारत को दूसरे देशों पर निर्भर रहना चाहिए? मुझे तो बिल्कुल नहीं लगता!’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2814 करोड़ की क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग स्कीम के बारे में कुछ ऐसे बात की. उन्होंने साफ साफ मैसेज दिया कि भारत अब किसी के भरोसे नहीं बैठने वाला. भारत अब भविष्य की तकनीक के मामले में किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएगा. जो हमारे पास नहीं है, हम खुद बनाएंगे. तो क्या है ये स्कीम?
क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग सपोर्ट स्कीम के बारे में बताते हुए पीएम मोदी ने लिखा, लिथियम, निकल, कोबाल्ट… ये ईवी, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और डिफेंस के लिए बेहद जरूरी हैं. फिर भी, हम रिफाइंड सामग्रियों के आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं. इसे दूर करने के लिए कैबिनेट ने एक योजना को मंजूरी दी है. हम नए क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग प्लांट लगाएंगे. निवेश को बढ़ावा देने के लिए कैपिटल सब्सिडी दी जाएगी. ज्यादा घरेलू वैल्यू एडिशन करेंगे और मजबूत सप्लाई चेन बनाएंगे.
दरअसल, लिथियम, निकल और कोबाल्ट जैसे जिन खनिजों को आज के दौर का नया सोना कहा जाता है, उन पर अब तक चीन जैसे कुछ गिने-चुने देशों का ही कब्जा रहा है. लेकिन अब सरकार ने इस एकाधिकार को हमेशा के लिए चकनाचूर करने की पूरी तैयारी कर ली है. बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट ने 2814 करोड़ रुपये के भारी-भरकम बजट के साथ क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग सपोर्ट स्कीम को मंजूरी दे दी.
दूसरों पर निर्भरता क्यों है खतरनाक?
अभी तक समस्या यह रही है कि दुनिया में इन खनिजों को खदानों से निकालकर इस्तेमाल के लायक बनाने यानी प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग का काम सिर्फ चीन जैसे कुछ ही देशों में होता है. जब कोई भी जियोपॉलिटिकल टेंशन होती है तो चीन जानबूझकर सप्लाई रोक देता है. इससे इकॉनमी और सिक्योरिटी के लिए बड़ा खतरा पैदा हो जाता है. भारत अब तक इन्हीं रिफाइंड मिनरल्स के लिए इंपोर्ट पर बहुत ज्यादा निर्भर रहा है, क्योंकि देश में इन्हें प्रोसेस करने के कारखाने न के बराबर हैं.
सरकार का प्रोजेक्ट है क्या?
- इस योजना पर 2026-27 से 2030-31 तक यानी पांच साल में 2814 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे. इस योजना के तहत भारत में क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग के लिए नए कारखाने लगाए जाएंगे. जो कंपनियां ये प्लांट लगाएंगी, सरकार उनके कुल इन्वेस्टमेंट का 30% हिस्सा बतौर कैपिटल सब्सिडी देगी.
- योजना के तहत कुल 4 प्रोसेसिंग प्लांट लगाए जाएंगे. इनमें से दो लिथियम प्रोसेसिंग प्लांट होंगे. इनमें हर एक की क्षमता कम से कम 30 किलोटन होगी. दो निकल प्रोसेसिंग प्लांट होंगे. हर एक की क्षमता 50 किलोटन होगी.
- सरकार एक लिथियम प्लांट लगाने वाली कंपनी को अधिकतम 500 करोड़ रुपये और एक निकल प्लांट लगाने वाली कंपनी को 900 करोड़ रुपये तक की आर्थिक मदद देगी.
(खास बात निकल उत्पादन के दौरान ही उप-उत्पाद या बाय-प्रोडक्ट के रूप में कोबाल्ट भी निकाला जा सकेगा.)
कैसे चुनी जाएंगी कंपनियां?
सरकार का पैसा सही जगह लगे, इसके लिए कंपनियों का चुनाव दो चरणों में होगा. पहले चरण में देखा जाएगा कि कंपनी के पास ऐसा प्लांट लगाने की तकनीकी क्षमता है या नहीं. जो कंपनियां पहले चरण में पास होंगी, वे दूसरे चरण में जाएंगी. यहां लो कॉस्ट का फॉर्मूला लागू होगा. यानी जो कंपनी सरकार से सबसे कम सब्सिडी या सहायता मांगेगी, उसे ही यह प्लांट लगाने का ठेका मिलेगा. सब्सिडी तीन किस्तों में दी जाएगी.
भारत को क्या फायदे होंगे?
- देश में ही क्रिटिकल मिनरल्स की रिफाइनिंग होने से हमारी सप्लाई चेन मजबूत होगी और हम ग्लोबल झटकों से बच सकेंगे.
- हमें विदेशों से महंगे रिफाइंड उत्पाद नहीं खरीदने पड़ेंगे, जिससे भारी विदेशी मुद्रा की बचत होगी.
- खदानों से निकले कच्चे माल को देश में ही शुद्ध करके उच्च गुणवत्ता वाले यौगिकों में बदला जा सकेगा.
- नए कारखाने लगने से देश में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और आत्मनिर्भर भारत का सपना सच होगा.