IIT-IIM की डिग्री छोड़ क्यों गीता पढ़ाने लगे आचार्य प्रशांत? इंसान की जिंदगी को लेकर कही ये बड़ी बातें

IIT-IIM की डिग्री छोड़ क्यों गीता पढ़ाने लगे आचार्य प्रशांत? इंसान की जिंदगी को लेकर कही ये बड़ी बातें


इंसान की जिंदगी का मकसद क्या है? क्या धर्म का असली अर्थ पूजा-पाठ, परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं तक सीमित है या फिर इसका संबंध खुद को जानने और अपने भीतर के अहंकार को समझने से है? क्या समाज को बेहतर बनाने के लिए पहले व्यक्ति का बदलना जरूरी है? और अगर इंसान अपनी जिंदगी में दुख झेल रहा है, तो क्या वह सचमुच खुश है या उसने खुद को खुश होने का भ्रम दे रखा है? ऐसे ही कई सवालों पर आचार्य प्रशांत ने खुलकर अपनी बात रखी. बातचीत के दौरान उन्होंने धर्म, अध्यात्म, अहंकार, आत्मज्ञान, पुनर्जन्म और जीवन के उद्देश्य जैसे विषयों पर अपने विचार साझा किए. उन्होंने यह भी बताया कि उनके लिए धर्म का वास्तविक लक्ष्य व्यक्ति को उसकी पहचान और उसके भीतर चल रहे द्वंद्व से परिचित कराना है.

आचार्य प्रशांत ने गीता और संत कबीर के विचारों का उल्लेख करते हुए समझाया कि इंसान के पास बुद्धि है, लेकिन जब यही बुद्धि अहंकार के अधीन हो जाती है, तो वह अपने ही जीवन को मुश्किल बना लेता है. उन्होंने अपनी यात्रा, आईआईटी-आईआईएम की पढ़ाई, लोगों के सवालों और अपने काम के उद्देश्य पर भी विस्तार से बात की. इस बातचीत में उन्होंने कई ऐसे सवाल उठाए, जो सुनने में असहज लग सकते हैं, लेकिन इंसान को अपनी जिंदगी, अपनी खुशियों और अपनी मान्यताओं पर दोबारा विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं.

आपको अपनी जिंदगी का मकसद मिल गया?

आचार्य प्रशांत: अगर आप जिंदा हैं, आपके पास जिंदगी है, तो आप अपने आसपास की दुनिया और लोगों को देखते हैं. अगर वहां आपको बहुत दुख और अन्याय दिखाई देता है, तो मकसद अपने आप सामने आ जाता है. उसे खोजना नहीं पड़ता, वह आपके सामने ही होता है. आज हमारी दुनिया जैसी है और उसमें जितनी विषमताएं हैं, जिस गति से हम विनाश की ओर बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए मैं समझता हूं कि सिर्फ मुझे ही नहीं, हर व्यक्ति को अपना मकसद स्पष्ट दिखाई देना चाहिए. करने के लिए बहुत कुछ है. दुनिया को समझना है, खुद को समझना है. मैं यही काम कर रहा हूं. लोगों को समझा रहा हूं कि वे कौन हैं. जब वे खुद को समझते हैं, तो दुनिया में जो जरूरी और सार्थक है, उसे करने लगते हैं. यही मेरे काम का मकसद है.

आप कैसे मापेंगे कि जिस कोशिश में आप निकले हैं, वह सार्थक हुई? अगर आप कह रहे हैं कि दुनिया विनाश की तरफ जा रही है, तो क्या आप तब मानेंगे कि आपकी कोशिश कामयाब हुई, जब दुनिया का विनाश रुक जाएगा?

आचार्य प्रशांत: देखिए, हमारा काम लोगों के साथ है, व्यक्तियों के साथ है. हम उनके भीतर जो चल रहा है, जो अंधेरा है, उसे हटाने का काम करते हैं. अब किसी व्यक्ति के भीतर का अंधेरा कितना कम हुआ है, इसे बाहर से साफ-साफ जानना पहली बात तो संभव नहीं है. इसकी गवाही तो वही व्यक्ति दे सकता है कि उसके जीवन में कितना परिवर्तन आया है. इस तरह की गवाहियां हमारे पास लाखों की तादाद में हैं. रोज आती हैं, शायद करोड़ों की तादाद में होंगी.अभी अक्टूबर चल रहा है और दो महीने बाकी हैं. उसके बाद एक बिलियन, मैं एक मिलियन नहीं कह रहा हूं, एक बिलियन और यह लाइव है. इसके अलावा रिकॉर्डिंग वाले सत्रों के लगभग आधा बिलियन मिनट हैं. और यह सब तब है, जब इससे लोगों को कोई डिग्री नहीं मिलनी, कोई नौकरी नहीं मिलनी और न ही कोई सर्टिफिकेट मिलना है. वे यह सब इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें इससे फायदा हो रहा है.

उन्हें क्या फायदा हो रहा है?

आचार्य प्रशांत: आप ही बताइए, कोई व्यक्ति जिसके पास बुद्धि और तर्क है, अगर उसे फायदा दिखाई नहीं देगा, तो क्या वह बार-बार आकर इसमें हिस्सा लेगा और दूसरों को भी लेकर आएगा? फायदा क्या है, इसे एक उदाहरण से समझिए. आपके सामने चाय रखी हुई है. आप यह जानना चाहेंगे कि यह साफ है या नहीं? बिल्कुल जानना चाहेंगे. इसी तरह आपके यहां जो कुछ रखा हुआ है, आप यह जानना चाहेंगे कि वह साफ है या नहीं. वह आपके भीतर है, इसलिए उसे जानना और भी जरूरी है. बस यही फायदा है और सबसे बड़ा फायदा भी यही है.

अगर हर इंसान अपने साथ बेहतर तरीके से जीने लगेगा, तो समाज भी अच्छा हो जाना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: गीता को आए हुए सैकड़ों-हजारों साल हो गए. फिर भी वह हमें अच्छा समाज क्यों नहीं दे पाई? लेकिन जब गीता इतने सालों से मौजूद है, तो आपको कैसे पता कि आज जैसा समाज है, वैसा ही रहता अगर गीता नहीं होती? हो सकता था कि समाज इससे भी खराब होता. हो सकता था नहीं, ऐसा होता ही.

हम कहां से आए हैं? यह बहुत साधारण-सी बात है. हम जंगल से आए हैं. आज आपके सामने कोई भी उच्चतर मूल्य न होता, कोई सही बात दिखाने वाला और आईना दिखाने वाला न होता, तो इंसान की प्रकृति उससे क्या करवा सकती है, इसका उदाहरण एक किताब में मिलता है.

उस किताब का नाम लॉर्ड ऑफ द फ्लाइज है. यह हमारे पाठ्यक्रम में 11वीं-12वीं में थी. इसमें कुछ छोटे बच्चों की कहानी है. द्वितीय विश्व युद्ध के समय की बात है. कुछ बच्चे एक प्लेन से कहीं जा रहे होते हैं. प्लेन क्रैश हो जाता है और वे एक द्वीप पर पहुंच जाते हैं. बच्चों की उम्र करीब 5-7 साल से लेकर 12-14 साल तक होती है. कुछ ही महीनों में वे इतने बर्बर हो जाते हैं कि भयानक घटनाओं को अंजाम देने लगते हैं.

उनमें से एक बच्चे का नाम पिगी होता है. वे उसका सिर काटकर एक बांस पर टांग देते हैं. उसके आसपास बहुत सारी मक्खियां जमा हो जाती हैं और बच्चे उसके चारों ओर नाचने लगते हैं. इसी दृश्य से उस उपन्यास का नाम लॉर्ड ऑफ द फ्लाइज आया है.

यह कहानी यही बताने के लिए है कि अगर साधु, ज्ञानी और समझाने वाले लोग न होते, अगर गीताएं न होतीं, तो हमारी क्या हालत होती? संत कबीर ने इसे बहुत सुंदर तरीके से कहा है:

‘आग लगी आकाश में, झर-झर गिरे अंगार.
न होते साधुजन, जल मरता संसार.’

आप कहते हैं कि आज दुनिया में इतने चोर-उचक्के घूम रहे हैं. हम कभी कृतज्ञता दिखाकर यह क्यों नहीं कह पाते कि अगर वे लोग नहीं होते, तो शायद हम सब भी चोर-उचक्के होते? लेकिन इंसान तो फिर भी मस्त रहता है.

आचार्य प्रशांत: इंसान मस्त नहीं रहता. पशुओं के पास बुद्धि नहीं है, इसलिए अहंकार भी नहीं है. मनुष्य के पास बुद्धि भी है और अहंकार भी. जब इस अहंकार को बुद्धि का साथ मिल जाता है, तो यह बहुत कातिलाना हो जाता है. इस अहंकार को आईना दिखाने का जो काम करता है, उसे धर्म कहते हैं. यही काम हम अपने मिशन में कर रहे हैं. अब आप खुद बताइए कि यह कितना जरूरी है और कितना नहीं.

आप कह रहे हैं कि यही धर्म है, तो फिर धर्म के नाम पर बाकी जो कुछ चल रहा है, वह क्या है?

आचार्य प्रशांत: वह कुछ नहीं है. वे विश्वास की पद्धतियां हैं, किस्से-कहानियां हैं. इसे ऐसे समझिए कि कोई चीज बहुत साफ हो, लेकिन बरसों और सदियों की यात्रा में उस पर इतनी धूल जम जाए कि उसका असली केंद्र दिखाई ही न दे. चारों तरफ सिर्फ धूल दिखाई दे. जो व्यक्ति दूर से देख रहा है, जिसे उस चीज को परखना नहीं आता, जो उसका परीक्षण नहीं करता, वह उस धूल को ही उस चीज की सच्चाई समझ लेता है. श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि आग होती है, लेकिन धुएं के कारण उससे ताप का पता नहीं चलता और प्रकाश तो बिल्कुल दिखाई नहीं देता. धुआं भी उसी आग से निकल रहा होता है, लेकिन अगर आप दूर खड़े होकर देखेंगे, तो आपको आग दिखाई ही नहीं देगी. धर्म के साथ भी यही हुआ है.

धर्म का केंद्र सिर्फ और सिर्फ आत्मज्ञान से जुड़ा है. मैं स्वयं को जानूं, मुझे पता चले कि मैं कौन हूं. अहंकार का विगलन ही धर्म का एकमात्र वास्तविक लक्ष्य है. इसके अलावा कुछ नहीं.

अगर धर्म के केंद्र के ऊपर ये सब चीजें चढ़ गईं, तो क्या धर्म का केंद्रीय तत्व इतना ताकतवर नहीं था कि वह ऐसा होने से रोक पाता?

आचार्य प्रशांत: वह एकदम दुर्बल है. एकदम दुर्बल. क्योंकि किसी चीज में कितना बल होगा, यह वह तत्व तय नहीं करता, आप तय करते हैं. मान लीजिए यहां कोई बहुत अच्छी चीज रखी है. वह पौष्टिक है, आसानी से पचती है. दूसरी तरफ चटपटा खाना रखा है. अब मैं तय करूंगा कि किसे ज्यादा मूल्य देना है.

एक बहुत सुंदर, पौष्टिक और सुपाच्य चीज रखी है, जिसे खाने से मेरा बहुत अच्छा हो सकता है. वह बहुत सस्ती भी है. दूसरी तरफ चटपटा खाना रखा है, जो बहुत महंगा है. अब मैं ही तय करूंगा कि किसकी कीमत ज्यादा है. आप यह नहीं कह सकते कि एक चीज पांच रुपये की है और दूसरी पांच सौ रुपये की. वह पांच रुपये की इसलिए है, क्योंकि मैं तय कर रहा हूं कि मैं उसके पांच रुपये से ज्यादा नहीं दूंगा. दूसरी चीज कचरा है, लेकिन मैं तय कर रहा हूं कि उसके पांच सौ रुपये दूंगा.

सत्य का मूल्य और धर्म का मूल्य तय करने वाला भी तो अहंकार ही है, यानी आप और मैं. वास्तविक धर्म अहंकार का विगलन करता है, लेकिन धर्म का मूल्यांकन भी अहंकार को ही करना है. इन दोनों बातों को जोड़िए और सोचिए कि इससे क्या निकलता है.

वास्तविक धर्म अहंकार को क्षीण करेगा, दुर्बल करेगा, काटेगा और गलाएगा. दूसरी ओर, वास्तविक धर्म को कितना सम्मान और मूल्य देना है, यह भी अहंकार को ही तय करना है. अब अहंकार क्यों वास्तविक धर्म को सामने लाएगा, उसे इज्जत देगा और आदर देगा? अगर उसे पता है कि वास्तविक धर्म तो उसे ही गलाने वाला है, तो वह ऐसा क्यों करेगा? हम हर घटिया चीज की ऊंची कीमत लगा देते हैं और सच्चाई यह है कि सच्चाई को पूछने वाला ही कोई नहीं है.

आप कहते हैं कि यह कंडीशनिंग का असर है, माइंड की कंडीशनिंग है. लेकिन आप जो बता रहे हैं, क्या यह भी माइंड की कंडीशनिंग नहीं है?

आचार्य प्रशांत: नहीं, माइंड कुछ नहीं होता. मस्तिष्क है और मस्तिष्क अपना काम करता रहता है. मस्तिष्क शरीर का उसी तरह हिस्सा है, जैसे दिल और फेफड़े. यह भी शरीर का एक अंग है. इसे ब्रेन कहते हैं. इसमें विचार उठते हैं, भावनाएं पैदा होती हैं और कई तरह की इलेक्ट्रोकेमिकल प्रक्रियाएं होती रहती हैं. लगभग वैसी ही प्रक्रियाएं, जैसी शरीर के दूसरे हिस्सों में होती हैं.

जब अहंकार जाकर ब्रेन पर कब्जा कर लेता है, तब वह सब होने लगता है, जिसे हम कहते हैं कि भावनाएं काबू में नहीं आ रही हैं या विचार हिंसा की तरफ जा रहे हैं. माइंड का अपने आप में कोई दोष नहीं है. माइंड का जो केंद्र है, वह अहंकार बन बैठता है. अहंकार जितना गड़बड़ होगा, माइंड उतना ही ज्यादा भटका हुआ होगा.

हम बार-बार माइंड-माइंड कहते हैं. मैं इस बात पर क्यों टोकता हूं? क्योंकि माइंड की बात करके हम ईगो यानी अहंकार की बात करने से साफ बच निकलते हैं.

आपने कॉन्शियसनेस की बात कही. कॉन्शियसनेस बहुत सीधी-सी बात है. मैं देखने वाला हूं, यानी दृष्टा. आप मुझे दिखाई दे रहे हैं, इसलिए आप दृश्य हैं. ठीक है? हम दोनों के बीच जो घटित हो रहा है, यह जो पूरा घटनाक्रम है, दृष्टा और दृश्य के बीच जो संबंध है, वही कॉन्शियसनेस है. कॉन्शियसनेस हमेशा डुअलिस्टिक होती है. उसके दो छोर होते हैं. एक देखने वाला और दूसरा उसका दृश्य. यही कॉन्शियसनेस है.

ऐसा नहीं हो सकता कि हमारा इस दुनिया में आने का कोई मकसद ही न हो?

आचार्य प्रशांत: आपने बहुत खूबसूरत बात कही. आखिरी बात बिल्कुल यही है. इसीलिए धर्म का काम आपको कोई नया मकसद, प्रयोजन या उद्देश्य देना नहीं है. धर्म का काम है कि आप जिन मकसदों को पकड़कर चल रहे हैं, उनका परीक्षण किया जाए.

आप अभी एक काल्पनिक बात कर रहे हैं कि हमारा कोई मकसद ही नहीं है. लेकिन अभी आप यहां हैं. यहां से जाएंगे और अपने कई मकसदों के पीछे भागेंगे. सवाल यह है कि क्या वे वास्तव में आपके हैं या उधार के हैं? क्या वे आपके भीतर किसी और ने डाल दिए हैं, यानी इम्प्लांटेड हैं?

यह सवाल पूछने के बाद धर्म थोड़ा मुस्कुराता है और कहता है कि अच्छा, यह बताइए कि जिसे आप ‘मैं’ कहते हैं, क्या वह भी आपका है? मकसद तो बाहरी और पराए हैं ही, लेकिन जिसे आप ‘मैं’ कहते हैं, वह भी पराया है.

इसलिए धर्म का काम आपको कोई नया मकसद देना नहीं होता. आपके फिलहाल जो मकसद हैं, उद्देश्य हैं, कामनाएं हैं और पहचानें हैं, धर्म उन्हीं की जांच-पड़ताल करता है. अंततः जब यह दिखाई देने लगता है कि ये सारे मकसद व्यर्थ हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई मकसद ही नहीं बचता. बल्कि व्यक्तिगत मकसद नहीं बचता. इसके बाद भी व्यक्ति काम करता है, उसके मकसद होते हैं, लेकिन वह यह नहीं कहता कि ये मकसद मेरे अपने हैं.

हम संत कबीर की बात कर रहे थे. वह कहते हैं, ‘सुखिया सब संसार है, खाए और सोए. दुखिया दास कबीर है, जागे और रोए.’ आखिर वह क्यों रो रहे हैं?

आचार्य प्रशांत: लोग इसलिए रोते हैं क्योंकि उनकी कामनाएं पूरी नहीं होतीं. उनके व्यक्तिगत लक्ष्य और स्वार्थ पूरे नहीं हो रहे होते हैं, इसलिए वे रोते हैं. लेकिन कबीर क्यों रो रहे हैं? वह इसलिए रो रहे हैं क्योंकि वे दुनिया का दुख देख रहे हैं. अब यही उनका मकसद बन गया है.

आपको कब अंदाजा हुआ कि यही आपका मकसद है?

आचार्य प्रशांत: यह कोई एक बार की चीज नहीं होती कि एक बार हो गई और बस हो गई. इस बात का खंडन करना भी बहुत जरूरी है कि एन्लाइटनमेंट हो गई. हां, हां, हां. मेरे देखने में ऐसी कोई चीज होती ही नहीं है.

देखिए, हमारी सारी बात अहंकार के इर्द-गिर्द घूम रही है. बात शुरू भी इसी से हुई थी. अहंकार आता कहां से है? बच्चा पैदा हुआ और पैदा होते ही उसमें ‘मैं’ का भाव रहता है. अहंकार से हमारा मतलब यहां घमंड वगैरह नहीं है. इतना तो आप लोग समझ ही रहे होंगे. अहंकार का अर्थ है ‘मैं’ का भाव, अहमता, आई एमनेस, यानी मैं हूं, अपनी अस्मिता का एहसास, अपने होने का एहसास.

यह भाव कब आता है? बच्चा पैदा होता है, तभी उसमें यह भाव रहता है. बल्कि बच्चा जब गर्भ में होता है, तब भी उसे अपने होने का पता लगने लगता है. यानी अहंकार शरीर के साथ पैदा होने वाली चीज है. हम यह नहीं कह रहे कि वह शरीर का उत्पाद है, लेकिन निश्चित रूप से वह शरीर के साथ ही पैदा होता है, को-आराइज करता है. शरीर है, तो अहंकार है. आपको ऐसा शरीर नहीं मिल सकता, जिसमें ‘मैं’ का भाव न हो.

उदाहरण के लिए, आप जानते हैं कि यह आप हैं और यह कुर्सी है. इतना तो बच्चे को भी पता होता है कि यह मैं हूं और यह पालना है. आप पालने को छुएंगे, तो बच्चा शायद प्रतिक्रिया न करे, लेकिन उसके शरीर को छुएंगे, तो वह प्रतिक्रिया करेगा. वह जान गया है कि यह मैं हूं.

इसलिए जब तक शरीर रहेगा, तब तक यह ‘मैं’ का भाव भी रहेगा, क्योंकि यह शरीर के साथ ही आया है. लगभग वैसे ही, जैसे जब तक शरीर रहेगा, तब तक आंतें रहेंगी. हालांकि यह उदाहरण पूरी तरह ठीक नहीं है, क्योंकि आंतें भौतिक होती हैं और अहंकार उस तरह भौतिक नहीं है. आप पेट खोलेंगे, तो आंतें दिखाई देंगी. शरीर को कहीं से भी खोलेंगे, तो अहंकार नहीं दिखेगा कि यह अहंकार की कोई ग्रंथि है. मैं सिर्फ उदाहरण देकर समझा रहा हूं.

अगर एन्लाइटनमेंट से हमारा आशय यह है कि अहंकार हमेशा के लिए मिट गया, तो शरीर रहते यह संभव नहीं है. हां, अहंकार के विगलन की एक अनंत यात्रा जरूर की जा सकती है. जब तक शरीर है, यह यात्रा चलती रहेगी.

यह यात्रा सिर्फ एक दिशा में नहीं होती. अहंकार माया है. आप यह नहीं कह सकते कि मैंने इसे इतना घटा दिया है और अब यह घटा ही रहेगा. आप अगले दिन सोकर उठेंगे, तो यह फिर थोड़ा बढ़ सकता है. ठीक वैसे ही, जैसे आप यह नहीं कह सकते कि आज आपने व्यायाम कर लिया, तो अब अगले हफ्ते तक व्यायाम करने की कोई जरूरत नहीं है.

यह किसी डिग्री की तरह नहीं है कि एक बार अहंकार के विगलन की डिग्री हासिल कर ली, तो अब जीवनभर के लिए छुट्टी हो गई. अगर आप बेखबर हुए, तो फिसलेंगे और गिरेंगे. आप यह नहीं कह सकते कि कल तो मैं होश में था, फिर आज क्यों गिर रहा हूं? कल होश में थे, इसलिए कल बच गए. आज बेहोश हो जाएंगे, तो आज गिरेंगे.

इसलिए फाइनल एन्लाइटनमेंट जैसी कोई चीज मुझे नहीं लगती. यह रोज का काम है. यह किसी की एक बार में नहीं हो सकती. यह आपके प्रेम और ईमानदारी की बात है कि लगातार स्वयं पर नजर रखें और अहंकार के विगलन की दिशा में, उसे क्षीण करने की दिशा में बढ़ते रहें.

बहुत सारे महापुरुषों ने अहंकार को क्षीण करने का काम किया है. अभी हम संत कबीर की बात कर रहे थे, अभी हम भगवद्गीता की बात कर रहे थे. दुनिया भर का आध्यात्मिक और दार्शनिक साहित्य हम अपनी गीता कम्युनिटी के छात्रों के साथ पढ़ते हैं. निश्चित रूप से ये वे लोग थे, जिन्होंने अहंकार को लगातार क्षीण किया. उनकी प्रतिबद्धता ही सब कुछ है. वही राह महत्वपूर्ण है, जिस पर आपको लगातार बढ़ते जाना है. जो मंजिल की उम्मीद करेगा, वह धोखा खाएगा.

तो आप कह रहे हैं कि आप किसी मंजिल पर नहीं पहुंचे हैं? आप महापुरुष हैं?

आचार्य प्रशांत: नहीं, बिल्कुल भी नहीं. आदमी आदमी बन जाए, इंसान बन जाए, यही बहुत बड़ी बात है. हममें से ज्यादातर लोग अहंकारिक पशु बनकर जीते हैं.

मेरी एक उक्ति है, जो हमारे छात्रों को बहुत पसंद आती है. हम कहते हैं, ‘फॉरगेट एन्लाइटनमेंट, बी ह्यूमन फर्स्ट.’ तुम्हें यह धोखा हो गया है कि तुम इंसान हो और अब तुम इंसान से उठकर भगवान बनना चाहते हो कि साहब, हम तो एन्लाइटेंड हो जाएंगे. मैं कहता हूं कि तुम्हें धोखा हो गया है कि तुम इंसान हो. तुम पशुओं से बदतर हो. आध्यात्मिक यात्रा का उद्देश्य तुम्हें भगवान बना देना नहीं है, उसका उद्देश्य तुम्हें इंसान बनाना है.

सवाल: आपने कहा कि इंसान जानवरों से बदतर हो सकता है. जानवर नीचे क्यों हैं? वे तो मस्त रहते हैं, खुश रहते हैं. क्या पता वे इवोल्यूशन की हमसे ऊपर वाली स्टेज हों?

आचार्य प्रशांत: नहीं, मनुष्य में संभावना है कि वह पशुओं से बहुत ऊपर भी जा सकता है. दुर्भाग्य की बात है कि ज्यादातर मनुष्य उस संभावना का इस्तेमाल नहीं करते.

देखिए, पशु और मनुष्य का थोड़ा तुलनात्मक अध्ययन कर लेते हैं. पशु के पास शारीरिक संस्कार होते हैं. उसका शरीर संस्कारित है और उसे पता है कि उसे क्या करना है. अब आप शेर से कहेंगे कि घास खाओ, तो वह नहीं खा पाएगा. उसे जाकर किसी को मारना है, उसका खून बहाना है. इसी तरह बंदर यह नहीं पूछता कि मैं कौन हूं, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है, मेरा मकसद क्या है या मुझे मुक्ति कैसे मिलेगी. वह यह सवाल नहीं करता कि क्या व्यक्ति इन्हीं बंधनों में फंसे रहकर जीने के लिए पैदा होता है.

जानवरों के साथ समस्या यह है कि उनके भीतर ये प्रश्न उठते ही नहीं. यह समस्या है या नहीं? तभी तो हम उन्हें पशु बोलते हैं. पशु का अर्थ है, जो बंधा हुआ है. निष्पक्ष तौर पर देखें, तो वे यह जान ही नहीं सकते कि जीवन क्या है और क्या नहीं. इसीलिए उनका जीवन जैसा लाखों-करोड़ों साल पहले चलता था, वैसा ही चलता रहता है.

वे अधिक से अधिक शारीरिक पाश में बंधे हुए हैं. उनके पास मानसिक, मनोवैज्ञानिक और अहंकारिक बंधन बहुत कम हैं. इसीलिए अहंकार के बंधन भी उनके पास बहुत कम हैं.

मनुष्य के पास संभावना है. वह भी पशु की तरह शारीरिक संस्कार और बंधन लेकर ही पैदा होता है. इस मामले में दोनों के पास शारीरिक बंधन हैं. लेकिन मनुष्य अपने शारीरिक बंधनों के ऊपर मानसिक बंधन भी लाद लेता है. इस तरह वह पशुओं से भी बदतर हो जाता है.

हालांकि मनुष्य के पास यह संभावना भी है कि वह अपने मानसिक बंधनों को काट सके. उसे यह अवसर मिला है कि वह पशुओं से ऊपर उठ सकता है. लेकिन उसके साथ यह खतरा भी है कि वह पशुओं से बहुत नीचे गिर सकता है.

पशु जैसा पैदा होता है, वैसा ही मरता है. आप यह नहीं कहेंगे कि यह पापी कुत्ता है. कुत्ता कुत्ता ही पैदा हुआ था और कुत्ता ही मर गया. आप यह भी नहीं कहेंगे कि देखो, फलां बैल जा रहा है और यह बुद्धत्व को प्राप्त हो गया है. बैल बैल पैदा हुआ था और बैल ही मरेगा.

इसलिए पशु के पास ऊर्ध्वाधर तल पर ऊपर उठने की कोई संभावना नहीं होती. यह उसका सौभाग्य भी है. वह न ऊपर उठ सकता है और न नीचे गिर सकता है. मनुष्य ऊपर भी उठ सकता है और नीचे भी गिर सकता है. दुर्भाग्य से ज्यादातर लोग नीचे गिरने का फैसला करते हैं. इसीलिए मैं कह रहा हूं कि ज्यादातर मनुष्य पशुओं से भी गिरे हुए होते हैं.

जब आप लोगों तक अपनी बात पहुंचाते हैं, तो वह भी एक ब्रांडिंग के जरिए हो रही है. आप एपी फ्रेमवर्क या एपी क्यों लगाते हैं? क्या यह भी अहंकार नहीं है?

आचार्य प्रशांत: अहंकार शून्य नहीं हो सकता, लेकिन वह क्षीण हो सकता है. दूसरी ओर, वह बहुत विशाल और मोटा भी हो सकता है. अहंकार अपने आप को लगातार फुलाता भी रहता है.

कई तरह की कहानियों से अहंकार फूलता है. मान्यताओं से, अपनी पहचान से, इस बात से कि मैं यह हूं, मैं वह हूं, मेरे साथ ऐसा हुआ था, मुझे आगे यह करना है, मेरा अतीत ऐसा है, भविष्य के ऐसे सपने हैं. यही सब बातें मेरी पहचान बन जाती हैं. इस तरह अहंकार फूलता है.

अहंकार हमेशा रहेगा, बस आप अपने ऊपर लादा हुआ बोझ उतारते चलिए. जो कुछ भी लाद रखा है, उसे उतारते चलिए. ट्रैवल लाइटली, हल्के होते चलिए.

जब भी मनुष्य कुछ करेगा, तो वास्तव में उसे करने वाला उसका अहंकार ही होगा. मैं इसका अपवाद कैसे हो सकता हूं? सवाल यह है कि उस अहंकार की गुणवत्ता क्या है और वह क्या करने जा रहा है?

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अपने आप को कहते हैं कि भाई, तू मेरी शरण में आ जा, मामेकं शरणं व्रज. तो आप क्या बोलोगे? वो अपना व्यक्तिगत अहंकार दिखा रहे हैं कि बाकी सबको छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ. सारे धर्मों का त्याग करके अर्जुन मात्र मेरी शरण में आ जाओ. तो कोई बिल्कुल कह सकता है कि ये तो अपने आप को व्यक्तिगत रूप से सबसे श्रेष्ठ घोषित कर रहे हैं. इसी तरीके से आप किन्हीं भी संत कवियों के पास चले जाइए, उनकी रचनाओं में उनका अपना नाम मौजूद होता है. तो क्या ये कोई व्यक्तिगत ब्रांडिंग हो रही है?

आचार्य प्रशांत: नहीं. ये कुछ व्यावहारिक कदम हैं, जो उठाने पड़ते हैं ताकि उनकी जो रचना है, उसकी शुद्धता बची रहे. एकदम याद करिए, हमने शुरू में ही क्या कहा था कि धर्म बड़ी नाजुक चीज है. सत्य हम कह देते हैं, सत्य में उजाले, पर व्यावहारिक जगत में सत्य कोमल, सुंदर फूल या नवजात बच्चे जैसा होता है. उसकी बड़ी रक्षा करनी पड़ती है. उसकी रक्षा करने के लिए कुछ व्यावहारिक कदम उठाने पड़ते हैं.

तो उसमें ये सब बात आती है कि आपने अपना कोई दर्शन सामने रखा है, तो आप उसके साथ अपना नाम रख देते हो. एपी फ्रेमवर्क नहीं रखोगे तो उसका वैसे ही दुरुपयोग हो जाएगा, जैसे इतने न जाने धर्मग्रंथों के साथ हुआ है. कोई उसको उठाकर उसमें न जाने क्या मिला करके क्या-क्या कर सकता है. ये हुआ तो है, इतिहास की पूरी धारा में हमने होते देखा है.

श्रुति है. सनातन धर्म के केंद्र में श्रुति ग्रंथ आते हैं. उनको हमने पीछे छोड़ दिया. उनकी जगह हम न जाने क्या-क्या पढ़ने लग गए. और पीछे ही नहीं छोड़ा, हम बहुत अच्छे से जानते हैं कि उनमें हमने कितने बाहरी, पराये प्रक्षिप्त अंश लाकर जोड़ दिए. तो जरूरी होता है कि ये जो नवजात शिशु है, ये जो नन्हा कोमल फूल है, इसकी रक्षा की जाए. और रक्षा ही नहीं की जाए, इस बात को आगे बढ़ाया जाए. उसके लिए जो व्यावहारिक कदम उठाने पड़ते हैं, वो उठाए जाएं.

बात आगे बढ़ाने की आपने बात की. एक बड़ी वजह शायद मुझे लगता है कि आपकी बात ज्यादा लोगों तक पहुंचने की ये भी है कि एक आईआईटी-आईआईएम का ब्रांड है. लोग सुनते हैं आईआईटी-आईआईएम तो मान लेते हैं कि हां भाई, आदमी पढ़ा-लिखा और समझदार तो होगा ही. जबकि वो सिर्फ एक एग्जाम क्लियर करने की बात है. आपने एग्जाम क्लियर किया, कई लोगों को मौका नहीं मिला होगा, वो नहीं कर पाए. तो ये भी तो समाज की कमजोरियां ही हैं कि इस तरह का ब्रांड लगा देना किसी के साथ कि भाई, ये इस कॉलेज से निकले हैं. इसलिए हो सकता है आप आईआईटी-आईआईएम से नहीं होते, तब भी आप यही बात कर पाते?

आचार्य प्रशांत: भारत में उल्टा चलता है. आप ज्यादातर उन लोगों को देखिए जो धर्म के ऊंचे शिखरों पर आज जमकर बैठे हुए हैं. ज्यादातर लोगों को देखिएगा और बताइएगा कि क्या वो आईआईटी-आईआईएम हैं? लोग अगर आईआईटी-आईआईएम देख रहे होते तो उस ओर क्यों जाते? जो छठी फेल हैं, वो दूसरे वाले लोग हैं. आईआईटी-आईआईएम वाले लोग तो वहां जाते हैं ना, जो खुद एमबीए वगैरह हैं.

नहीं, ऐसा नहीं है. मेरे पास बहुत साधारण वर्ग से लोग आ रहे हैं. ऐसा नहीं है कि मेरे पास कोई एलीट इंटेलेक्चुअल आ रहे हैं. आपने जो उदाहरण दिया, वो एकदम उल्टा पड़ रहा है. आप उन सारे लोगों को देखिए जिनको आप कहेंगे कि ये धर्म के प्रतिनिधि हैं. सारी भीड़ तो वहां लग रही है. मुझसे कई-कई गुना ज्यादा लोग आपको वहां मिलेंगे. लोगों में अगर आईआईटी-आईआईएम की कद्र होती तो यहां होते ना, वहां क्यों होते?

आईआईटी-आईआईएम से उल्टा पड़ता है. मुझ पर आक्षेप लगाया जाता है कि आप किसी धार्मिक परंपरा से तो आते नहीं, आप किस आश्रम से आए हैं, आपके गुरु कौन हैं? वो तो वो लोग लगाते हैं ना, जो उस… नहीं, ये पूरा समाज लगाता है क्योंकि पूरा समाज ऐसा है. तभी तो मुझे ये काम करने की जरूरत पड़ रही है. समाज सही होता तो मैंने टेक्नोलॉजी और मैनेजमेंट और यूपीएससी इसलिए थोड़ी करा था कि मैं एक दिन बैठकर लोगों को गीता पढ़ाऊंगा. मैंने समाज की दुर्दशा देखी तो मैंने कहा कि यही सबसे जरूरी काम है, यही करना पड़ेगा. जो टेक्नोलॉजी का काम है, वो करने के लिए और भी सक्षम लोग हैं. मैनेजमेंट के लिए और भी लोग हैं. पर ये काम कोई करने वाला नहीं है, तो मुझे अपने हाथ में लेना पड़ेगा.

समाज की दुर्दशा देखी, आपको इसमें मजा आने लगा. ऐसा भी तो हो सकता है?

आचार्य प्रशांत: मजा कहां से आ जाएगा? मैं वहां पर होता, जो आम कामनाएं होती हैं, हर आदमी की होती हैं, वो कामनाएं पूरी कर रहा होता. आप मुझे आज देख रहे हैं. आप मुझसे 23 साल बाद मिलने आए हैं, मेरे एमबीए के बाद. क्या आपको पता है कि उसके बाद की मेरी 15 साल की यात्रा कैसी रही थी? क्या मजेदार रही थी?

नहीं, पर दुनिया की नजर में मजेदार न हो, आपको मजा आ रहा हो, लोगों को अगर मुझे मजा आ रहा हो तो इसी से सिद्ध हो जाता है कि मैंने जो काम करा, उसका आईआईटी-आईआईएम से कोई ताल्लुक नहीं था. उसका मेरे व्यक्तिगत संतोष से, मेरी व्यक्तिगत ईमानदारी से ताल्लुक था.

मैं वही कह रहा हूं कि मैंने कहा कि कोई नहीं आ रहा है मुझे सुनने के लिए, तो भी जो सच्चा काम है, वो मुझे करने दो. और इस सच्चाई के कारण मेरे पास लोग आए हैं. आईआईटी-आईआईएम की वजह से आपकी बात अगर मैं मान भी लूं, कोई आ भी जाएगा तो टिकेगा नहीं. मैं उनसे रोज बात कर रहा हूं, वो मुझे रोज परख रहे हैं और मेरी सारी बात जिज्ञासा, प्रश्नों, प्रयोग और परीक्षण पर आधारित है.

मैं कहता हूं दुनिया को परखो, खुद को परखो और जो तुम्हें खुद को परखने को कह रहा है, उसको भी परखो. आप भी तो बैठकर मुझे परख ही रहे हैं ना? तो आईआईटी-आईआईएम होने से ऐसा थोड़ी होगा कि आप कहेंगे कि नहीं-नहीं, आपके पास 23-25 साल पुरानी डिग्रियां हैं, आपने तब ये किया था, आपने यूपीएससी क्लियर किया था, तो आप जो भी बोल रहे हैं महाराज, वो सर्वमान्य है. ऐसा तो कुछ नहीं है.

मेरी तो रोज परीक्षा होती है. जितनी किसी आम आदमी की नहीं होती, जितनी न यूनिवर्सिटी में बैठे फिलॉसफी के प्रोफेसरों की होती है, न तथाकथित बाबाओं की होती है. सबसे ज्यादा परीक्षा मेरी ही होती है. मुझे उस परीक्षा से रोज गुजरना पड़ता है. 25 साल पहले मैंने जो परीक्षा उत्तीर्ण की थी, वो मेरे काम नहीं आ रही है. मैं आज आपके सामने बैठकर जो परीक्षा उत्तीर्ण कर रहा हूं, वो मेरे काम आ रही है.

वो 25 साल पहले वाला प्रशांत, वो प्रशांत आचार्य प्रशांत के सामने अगर आज बैठ जाए इस कुर्सी पर मेरी जगह, तो उससे आप क्या कहेंगे? वो खुश होगा. मैं उससे कहूंगा कि अगर इसके जैसा कोई तुम्हारी उम्र में मिला होता तो इसके लिए मैं अपनी जान दे देता.

वो खुश होगा आपको देखकर?

आचार्य प्रशांत: जरूरी नहीं है, क्योंकि मेरे सामने जो भी आता है, मैं सबसे पहले उसकी खुशियों पर ही सवाल उठाता हूं. तो वो मुझे देखकर खुश नहीं होते हैं. मैं तो पूछता हूं कि क्या है जिसकी ओर भागे जा रहे हो? क्या तुम्हारी कामनाएं हैं? क्या सोचते हो कि पा लोगे तो सुख मिल जाएगा? आओ, उसको परखते हैं.

मैं नहीं कहता कि वो गलत है, पर आओ परखते हैं. और परखने का काम तुम खुद करोगे. मैं बस एक माहौल बनाऊंगा, जिसमें तुम परख पाओगे. मैं तुम्हें आईना दिखाऊंगा. आंखें तुम्हारी होंगी, चेहरा तुम्हारा होगा, तुम्हें ही देखना है. हां, इस आईने को देखने के बाद अगर तुम भाग जाते हो तो तुम मुझसे नहीं भागे हो, तुम उससे भागे हो जो तुम्हें इस आईने में दिखाई दिया है.

यही बात मैं उस प्रशांत से भी बोलता. लेकिन एक बात पक्की है, जैसा वो था, मुझे जैसे उसकी स्मृति है, आईआईटी वाले प्रशांत की, उसको अगर इसके जैसा कोई मिला होता तो बहुत आसान हो जाती जिंदगी उसके लिए. मुझे बहुत भटकना पड़ा, मुझे बहुत ज्यादा संघर्ष करना पड़ा. अब जाकर मीडिया की नजरों में आने लगा हूं. अज्ञातवास था, बहुत लंबा अज्ञातवास था.

मैं बहुत लोगों तो छोड़ दीजिए, जो मेरे बैच के साथी थे, मैं उनसे भी कटा हुआ था. और ये वो समय होता है जब आम आदमी अपनी जिंदगी देख रहा होता है, करियर देख रहा होता है, कहां-कहां आगे बढ़ रहा होता है. ये सब कर रहा होता है.

इसलिए कटे हुए थे कि देखना नहीं चाहते थे?

आचार्य प्रशांत: नहीं, मैं समझ रहा था, मैं पढ़ रहा था. मैं एक छोटे समूह के साथ होता था, उनसे बातें करता था. मुझे कोई जल्दी नहीं थी कि मैं बड़ा हो जाऊं, बड़ा मिशन चला दूं, लोगों के सामने आ जाऊं. मैं पहले ईमानदारी…

उस समय व्हाट्सऐप ग्रुप वगैरह इतना ज्यादा चलते नहीं थे. ईमेल वाली चीज थी या कोई फोन कर ले तो. और वो सब ज्यादा तब होता है जब कामनाओं के तार जुड़े होते हैं. आपसे दो-चार जो मेरे निकट के दोस्त थे, उनसे बातचीत होती रहती थी. बाकी गेट-टुगेदर हैं, रीयूनियन हैं, नेटवर्किंग है, इससे मैं बिल्कुल दूर चला गया था. बहुत कम संपर्क रह गया था.

दो-चार लोगों को छोड़कर, जो अपने बहुत निजी दोस्त होते हैं, उनको छोड़कर… वो निजी दोस्त नहीं कहते थे कि क्या कर रहे हो? अरे, खूब कहते थे, रोज कहते थे. कहते थे, क्या तुम्हारा पोटेंशियल था, क्या तुम्हारा टैलेंट था? भारत में तीन आई हैं, आईआईटी, आईआईएम, आईएएस. हां, बोलते थे कि सब निकालने के बाद अब तुम ये कहां भटक रहे हो? ये कौन-सी किताबें पढ़ रहे हो? बहुत सारी किताबें तुम पढ़ रहे होते थे, जो आसानी से मिलती नहीं थीं. किताबें लाने के लिए 500-700 किलोमीटर जाकर कहीं पर रुककर दो-चार दिन किताब लेकर आता था.



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