दिवाली पर इस प्रसिद्ध महालक्ष्मी मंदिर में निभाई जाती है सदियों पुरानी अनोखी परंपरा, जानें क्या है यह अद्भुत रहस्य

दिवाली पर इस प्रसिद्ध महालक्ष्मी मंदिर में निभाई जाती है सदियों पुरानी अनोखी परंपरा, जानें क्या है यह अद्भुत रहस्य


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दिवाली पर इस प्रसिद्ध महालक्ष्मी मंदिर में निभाई जाती है सदियों पुरानी परंपरा

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Mahalaxmi Temple Diwali Traditions: दिवाली के पावन अवसर पर देश के एक प्रसिद्ध महालक्ष्मी मंदिर में सदियों पुरानी अनोखी परंपरा निभाई जाती है. इस परंपरा के पीछे एक बेहद दिलचस्प और अद्भुत रहस्य छिपा हुआ है, जिसके बारे में जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे. यह मंदिर अपनी इस विशेष और प्राचीन प्रथा के कारण श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था और आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. आइए जानते हैं इस अनोखी परंपरा और उसके रहस्य के बारे में.

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Mahalaxmi Temple Diwali Traditions: दिवाली का पर्व आने में अब बस कुछ ही दिन बचे हैं और अब ज्यादातर पंच दिवसीय दीपावली महापर्व की तैयारियां भी अंतिम पड़ाव पर हैं. इस दिन घरों से लेकर मंदिरों तक मां लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. लेकिन महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में स्थित प्रसिद्ध श्री महालक्ष्मी यानी अंबाबाई मंदिर में दिवाली के अवसर पर एक अनोखी और सदियों पुरानी परंपरा निभाई जाती है, जो भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई मुराद माता जरूर पूरी करती हैं. यही वजह है कि दिवाली के मौके पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. आइए जानते हैं दिवाली के दिन इस मंदिर में कौन सी परंपरा निभाई जाती है…

मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण
महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में विराजमान श्री अंबाबाई मंदिर (महालक्ष्मी मंदिर) ऐसा ही एक पावन और जागृत धाम है. मां महालक्ष्मी को समर्पित यह मंदिर ना सिर्फ एक धार्मिक स्थल है बल्कि इतिहास, आस्था और वास्तुकला का अद्भुत संगम भी है. मंदिर को लेकर मान्यता है कि यहां पर सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है और माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है. यह मंदिर महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में से एक है. हिंदू मान्यताओं के अनुसार, तिरुपति बालाजी की यात्रा के बाद कोल्हापुर अंबाबाई के दर्शन करना अत्यंत शुभ माना जाता है. इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण किरणोत्सव है, जो साल में दो बार होता है. इस दौरान डूबते हुए सूर्य की किरणें सीधे मंदिर के अंदर आकर देवी अंबाबाई के चरणों को स्पर्श करती हैं.

दिवाली पर निभाई जाती है यह परंपरा
दीपावली के अवसर पर श्री अंबाबाई मंदिर के शिखर पर विशेष रूप से दीया और मशाल जलाने की परंपरा है. वहीं नरक चतुर्दशी से लेकर कार्तिक मास (त्रिपुरारी पूर्णिमा तक) के दौरान मंदिर के शिखर पर विशेष दीपदान और मशाल जलाई जाती है. यह परंपरा कार्तिक स्नान और अनुष्ठानों का अहम हिस्सा है. इस दौरान श्रद्धालु भोर (सुबह जल्दी) में पंचगंगा नदी में स्नान करते हैं, दीपदान करते हैं और फिर मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

जलती हुई मशाल इस बात का प्रतीक
दीपावली की रात मंदिर के शिखर पर जो दीया या मशाल जलाई जाती है, वह अगली अमावस्या तक या तय तिथियों तक निरंतर जलती रहती है. शिखर पर जलती हुई मशाल इस बात का प्रतीक है कि माता महालक्ष्मी की कृपा से भक्तों के जीवन से अज्ञान, कठिनाइयां और आर्थिक तंगी का अंधकार दूर हो. पद्मपुराण आदि के अनुसार कार्तिक मास में विष्णु या शक्ति तीर्थस्थलों पर दीप जलाने से महान यज्ञों के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है.

दिवाली पर दर्शन करने की मान्यता
दीपावली के पावन दिनों में मां अंबाबाई को विशेष रूप से सुंदर और बहुमूल्य सोने के गहनों से सजाया जाता है. मंदिर की सजावट और रौनक देखते ही बनती है. भक्तों का यह अटूट विश्वास है कि दिवाली की रात या इस पावन समय पर मां अंबाबाई के दर्शन मात्र से कर्ज, आर्थिक तंगी और पैसों की समस्या दूर होती है तथा घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है. बता दें कि इस बार धनतेरस का पर्व 6 नवंबर दिन शुक्रवार को तो दिवाली का पर्व 8 नवंबर दिन रविवार को मनाया जाएगा.



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