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Nainital ki local news : मछलियों की कुछ प्रजातियां नैनी झील के लिए खतरा बन गई हैं. कॉमन कार्प और बिग हेड प्रजाति की मछलियां ज्यादा घातक हैं. इन मछलियों की प्रजातियों की संख्या नियंत्रित करने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है. झील में इन मछलियों की बढ़ती संख्या को जलीय पारिस्थितिकी के लिए चुनौती बन गई है. इनकी वजह से पानी की गुणवत्ता और झील में रहने वाली दूसरे जलीय प्रजातियों के प्राकृतिक आवास पर खतरा मंडराने लगा है. ऐसे में इनकी संख्या कम कर दूसरी जलीय प्रजातियों के संरक्षण और झील के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए काम शुरू हो गया है. इन मछलियों को झील से निकाला जा रहा है.
नैनीताल. उत्तराखंड की मशहूर नैनीझील को स्वच्छ और उसके पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. इसी कड़ी में इन दिनों झील में तेजी से बढ़ रही कुछ मछलियों की प्रजातियों की संख्या नियंत्रित करने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है. इसके तहत नैनीझील से प्रतिदिन मछलियां निकाली जा रही हैं. इनमें मुख्य रूप से कॉमन कार्प और बिग हेड प्रजाति की मछलियां शामिल हैं. झील में इन मछलियों की बढ़ती संख्या को जलीय पारिस्थितिकी के लिए चुनौती माना जा रहा है. ऐसे में इनकी संख्या कम कर दूसरी जलीय प्रजातियों के संरक्षण और झील के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने की दिशा में काम किया जा रहा है. दरअसल, नैनीझील केवल पर्यटन के लिए ही नहीं, यह अपने समृद्ध जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी जानी जाती है. झील में मछलियों की कई प्रजातियां मौजूद हैं, लेकिन कुछ प्रजातियों की संख्या में तेजी से वृद्धि होने के कारण दूसरी जलीय प्रजातियों और प्राकृतिक व्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका है.
पारिस्थितिक तंत्र के लिए खतरा
झील से कॉमन कार्प और बिग हेड मछलियों को बाहर निकालने के पीछे प्रमुख वजह इनकी बढ़ती संख्या है. कॉमन कार्प झील की तलहटी में भोजन तलाशती है. इस दौरान वह वहां मौजूद तलछट और जैविक व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है. इससे पानी की गुणवत्ता और झील में रहने वाली दूसरे जलीय प्रजातियों के प्राकृतिक आवास पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है. बिग हेड प्रजाति की अधिक संख्या भी झील के पारिस्थितिक संतुलन के लिहाज से अनुकूल नहीं मानी जा रही है.
मंगुरा मछली को लेकर भी विभाग सतर्क
झील में कॉमन कार्प और बिग हेड के अलावा मंगुरा मछली की मौजूदगी को लेकर भी विभाग सतर्क है. ग्लोबल एक्वा ट्रीटमेंट टेक्नोलॉजी की ओर से झील में इस प्रजाति की तलाश की जा रही है. विभाग के सुपरवाइजर आनंद सिंह कोरंगा लोकल 18 से बताते हैं कि नैनीझील के पारिस्थितिक तंत्र के लिए मंगुरा मछली की मौजूदगी चुनौती बन सकती है. इसे नियंत्रित करने के लिए विशेष निगरानी रखी जा रही है. अब तक झील में केवल एक मंगुरा मछली दिखाई दी है, जबकि अन्य मछलियों की तलाश जारी है.
झील में छोड़ी गईं 21 हजार नई मछलियां
एक ओर जहां झील में कुछ मछलियों की बढ़ती संख्या को नियंत्रित किया जा रहा है, दूसरी तरफ जलीय जैव विविधता को बेहतर बनाने के लिए नई मछलियों के बीज भी छोड़े जा रहे हैं. अक्टूबर 2026 में पंतनगर विश्वविद्यालय की टीम ने नैनीझील में करीब 21 हजार मछलियां छोड़ी थीं. इनमें 15 हजार सिल्वर कार्प, पांच हजार गोल्डन महाशीर और एक हजार बुनियस प्रजाति की मछलियां शामिल थीं. इस पहल का उद्देश्य झील में जलीय प्रजातियों की विविधता को बढ़ावा देना और पारिस्थितिक संतुलन को बेहतर बनाना है.
इन प्रजातियों को बढ़ावा
आनंद सिंह कोरंगा के मुताबिक, विभाग की ओर से नैनीझील के संरक्षण और यहां मौजूद मछलियों की प्रजातियों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए लगातार काम किया जा रहा है. झील से बिग हेड, कॉमन कार्प और मंगुरा जैसी मछलियों को नियंत्रित करने के साथ महाशीर, सिल्वर कार्प और चौकुनिया समेत अन्य प्रजातियों के बीज भी डाले गए हैं. झील से अलग-अलग प्रजातियों की मछलियां प्रतिदिन निकाली जाती हैं. इनकी मात्रा कुंतलों में होती है. विभाग का कहना है कि नैनीझील में मछलियों की सभी प्रजातियों के संरक्षण और नियंत्रण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है. इसके लिए झील में मौजूद मछलियों की संख्या, उनकी प्रजातियों और उनके प्रभाव पर लगातार नजर रखी जा रही है.