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Why US Attack on Qeshm Island: अमेरिका-इजरायल के बीच कई दिनों से इस बात को लेकर वार्ता चल रही थी कि ईरान पर दोबारा से हमले कब शुरू किए जाएं? आखिरकार सीजफायर को तोड़ते हुए अमेरिका की सेनाओं ने ईरान के मजबूत किले केश्म पर हमला कर दिया. अमेरिका की ओर से कहा गया कि ये डिफेंसिव कार्रवाई थी लेकिन लड़ाई एक बार फिर से शुरू होने से तेल और गैस के सस्ते होने का सपना छोड़ना पड़ेगा.
ईरान-अमेरिका युद्ध फिर छिड़ा.
US Attack on Iran: ईरान-अमेरिका के बीच चल रहा सीजफायर तब टूट गया, जब ईरान के रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण आइलैंड को अमेरिकी सेना ने सुबह-सुबह ठोक दिया. अमेरिका ने होर्मुज के दिल कहे जाने वाले केश्म द्वीप पर हमले किए, जिसके बाद यहां 5 धमाकों की आवाजें सुनाई दी हैं. CNN को तीन अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि यह कार्रवाई पूरी तरह से डिफेंसिव थी लेकिन सवाल ये उठता है कि आखिर अमेरिका ने यही इलाका अटैक करने के लिए क्यों चुना?
इस अटैक का मकसद इलाके में अमेरिकी विमानों और संपत्तियों की सुरक्षा करना था. एक अधिकारी के मुताबिक ईरान ने अमेरिकी एयरक्राफ्ट पर सरफेस टु एयर मार करने वाली मिसाइलें दागी थीं, जिसके जवाब में अमेरिका ने यह कदम उठाया. वॉल स्ट्रीट जर्नल ने सबसे पहले इस ऑपरेशन का खुलासा किया. ये रिपोर्ट ये भी कहती है कि अमेरिका की ओर से ईरान पर ऐसे छोटे-छोटे हमले पहले भी चुपके से किए जा चुके हैं. यह कोई बड़ा युद्ध अभियान नहीं था, बस ईरान को वॉर्निंग थी.
यह घटना अमेरिकी चुनाव के ठीक एक दिन पहले हुई, जबकि माना ये जा रहा था कि अमेरिका अगर हमले की योजना बना भी चुका है, तो चुनाव के बाद ही करेगा. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उसी दिन सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरान के साथ समझौता हो सकता है. हालांकि फॉक्स न्यूज पर उन्होंने कहा कि अभी असली युद्ध नहीं चल रहा. उन्होंने इसे काफी नरम युद्ध बताया और जोर दिया कि दोनों पक्ष समझौता चाहते हैं. उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कहा कि दोनों देशों के बीच कुछ प्रगति हुई है, लेकिन अमेरिका के पास सैन्य और गैर-सैन्य दोनों विकल्प मौजूद हैं.
केश्म द्वीप रणनीतिक तौर पर भी है महत्वपूर्ण. (रॉयटर्स)
अगर यह सीमित कार्रवाई बड़े युद्ध में बदल गई तो सबसे बड़ा असर तेल और गैस की कीमतों पर पड़ेगा. हॉर्मुज बंद होने या उसमें खतरा बढ़ने से तेल की सप्लाई तुरंत प्रभावित होगी. वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें आसानी से 20-30 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं. पहले भी जब इस इलाके में तनाव बढ़ा था तो ब्रेंट क्रूड 10-15 डॉलर प्रति बैरल उछल चुका है. युद्ध छिड़ने पर यह उछाल और तेज हो सकता है. गैस की कीमतें भी बढ़ेंगी क्योंकि कई देश LNG के लिए इसी रास्ते पर निर्भर हैं। महंगा तेल और गैस महंगाई बढ़ाएगा, खासकर पेट्रोल-डीजल और बिजली के बिलों में. भारत, चीन, जापान और यूरोप जैसे बड़े आयातक देशों की अर्थव्यवस्था पर सीधा दबाव पड़ेगा. ट्रप प्रशासन चाहता है कि किसी तरह समझौता हो जाए क्योंकि महंगाई का असर अमेरिका में भी है. बस बात इतनी सी है कि वो दबाव से ईरान को कितना झुका पाएंगे, ये देखना होगा.
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