PM2.5 Vs PM10: कौन ज्यादा खतरनाक, सांस के साथ शरीर में कैसे घुसते हैं ये कण?

PM2.5 Vs PM10: कौन ज्यादा खतरनाक, सांस के साथ शरीर में कैसे घुसते हैं ये कण?


PM2.5 Vs PM10:  दिल्ली की हवा एक बार फिर जहरीली होने लगी है. पिछले हफ्ते भारी बारिश के बाद लोगों को पॉल्युशन से कुछ राहत मिली थी. लेकिन अब हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं. दो नवंबर सोमवार की सुबह दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी एक्यूआई 300 के पार पहुंच गया. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक सुबह 7.05 बजे दिल्ली का एक्यूआई 307 दर्ज किया गया. रविवार को 24 घंटे का औसत 261 था. वहीं, शुक्रवार को बारिश के बाद एक्यूआई घटकर 60 तक आ गया था.

इस प्रदूषण की कहानी सिर्फ एक्यूआई के आंकड़े तक सीमित नहीं है. दिल्ली के ज्यादातर निगरानी केंद्रों पर प्रदूषण के लिए PM2.5 प्रमुख कारण है. सोमवार की सुबह 58 में से 51 केंद्रों पर PM2.5 मुख्य रूप से प्रदूषण के लिए जिम्मेदार रहा. बाकी सात केंद्रों पर PM10 का स्तर प्रमुख कारण था. आखिर PM2.5 और PM10 में क्या अंतर है? इनमें से कौन ज्यादा खतरनाक है? क्या दोनों का असर फेफड़ों पर ही पड़ता है या ये शरीर के दूसरे अंगों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं? दिल्ली जैसे शहर में इन दोनों चीजों को समझना क्यों जरूरी है?

PM2.5 और PM10 क्या हैं?

हवा में धूल, धुआं, कालिख और दूसरे पदार्थों के बेहद छोटे कण मौजूद रहते हैं. इन्हें पार्टिकुलेट मैटर यानी पीएम कहा जाता है. इनके आकार के आधार पर इन्हें अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है. PM10 ऐसे कणों को कहते हैं जिनकी साइज 10 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है. सड़क की धूल, निर्माण कार्य, मिट्टी और औद्योगिक गतिविधियां इनके प्रमुख स्रोत हो सकते हैं.

दूसरी तरफ PM2.5 उन कणों को कहते हैं जिनकी साइज 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है. ये इतने छोटे होते हैं कि सामान्य आंखों से दिखाई नहीं देते. ईंधन जलने, वाहनों के धुएं, उद्योगों और आग जलने की अन्य प्रक्रियाओं से ऐसे कण निकल सकते हैं. हवा में मौजूद कुछ गैसों के बीच रासायनिक प्रतिक्रियाओं से भी PM2.5 बन सकता है.

इनके आकार का अंतर समझने के लिए बाल का उदाहरण ले सकते हैं. इंसान के एक बाल की मोटाई करीब 70 माइक्रोमीटर हो सकती है. इस लिहाज से PM2.5 का अधिकतम आकार बाल की मोटाई से लगभग 28 गुना छोटा है.

PM2.5 को ज्यादा खतरनाक क्यों माना जाता

दोनों तरह के कण सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं. लेकिन PM2.5 का छोटा आकार उसे ज्यादा चिंताजनक बनाता है. PM10 के कण सांस के रास्ते शरीर में पहुंचकर फेफड़ों में जमा हो सकते हैं. इससे सांस की नली में जलन, सूजन और सांस लेने में परेशानी हो सकती है. PM2.5 के कण फेफड़ों के काफी अंदर पहुंच जाते हैं. ये ब्लडस्ट्रीम को प्रभावित करते हैं. इसी ब्लडस्ट्रीम के जरिए ऑक्सीजन रक्त तक पहुंचता है. इसके बाद PM2.5 का असर सिर्फ सांस की प्रणाली तक सीमित नहीं रह जाता. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक PM2.5 और PM10 दोनों ही स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं. लेकिन PM2.5 के कणों का फेफड़ों में गहराई तक पहुंचना और रक्तप्रवाह में प्रवेश करना उन्हें खास तौर पर खतरनाक बनाता है.

शरीर को क्या-क्या नुकसान पहुंचा सकते हैं ये कण?

प्रदूषित हवा में सांस लेने का असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता. यह प्रदूषण के स्तर, उसके संपर्क में रहने की अवधि और व्यक्ति की सेहत पर निर्भर करता है. PM2.5 के संपर्क में आने से अस्थमा बढ़ सकता है. फेफड़े कमजोर हो सकते हैं और सांस से जुड़े इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है. लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने का संबंध हृदय रोग, स्ट्रोक, फेफड़ों के कैंसर जैसी बीमारियों से भी है.

बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से हृदय या फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे लोगों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि स्वस्थ व्यक्ति प्रदूषण से सुरक्षित हैं. लंबे समय तक खराब हवा में सांस लेने से उन्हें भी नुकसान हो सकता है. PM10 को भी हल्के में नहीं लिया जा सकता. ये कण आंखों, नाक और गले में जलन पैदा कर सकते हैं. सांस की पुरानी बीमारियों से जूझ रहे लोगों की परेशानी बढ़ा सकते हैं.

दिल्ली में PM2.5 का बढ़ना क्या संकेत देता है?

दो नवंबर की सुबह दिल्ली के 58 निगरानी केंद्रों में से 51 पर PM2.5 के कारण एक्यूआई बहुत खराब श्रेणी में पहुंचा है. एक दिन पहले 57 में से 46 केंद्रों पर यही स्थिति थी. इससे पता चलता है कि राजधानी के ज्यादातर निगरानी केंद्रों पर महीन कण प्रदूषण की प्रमुख समस्या बने हुए थे.



Source link