हर कदम पर टूटे पैर की बाधा, पर हौसले से निशाना साधती है 13 साल की सुकर्मणी; ओलंपिक तक पहुंचने का सपना

हर कदम पर टूटे पैर की बाधा, पर हौसले से निशाना साधती है 13 साल की सुकर्मणी; ओलंपिक तक पहुंचने का सपना


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Inspiring story: बात अब सपनों की उड़ान और उसके आसमानी लक्ष्य की. यह कहानी है खूंटी की 13 साल की एक दिव्यांग ट्राइबल तीरंदाज की, जिसने महज तीन साल में अपना एक पैर गंवाने के बावजूद ओलंपियन तीरंदाज बनने का सपना देखा है. यहां तक कि गरीबी भी इस नन्हीं तीरंदाज का हौसला नहीं तोड़़ पाई है. खूंटी की सुकर्मणी टूटी ने सिखाया है कि हालात कैसे भी हों, लेकिन जिंदगी का एक लक्ष्य जरूर होना बेहद जरूरी है.

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खूंटी जिले के कालामाटी स्थित पीएम श्री कस्तूरबा बालिका विद्यालय की आठवीं कक्षा की छात्रा सुकर्मणी टूटी का लक्ष्य एक ओलंपियन तीरंदाज बनना है. ट्राइबल तीरंदाज सुकर्मणी ने बताया कि महज तीन साल की उम्र में एक हादसे की वजह से सुकर्मणी को अपना एक पैर गंवाना पड़ा. 11 साल की उम्र में उसे एक आर्टिफिशियल पैर लगाया गया. लेकिन, अब वह आर्टिफिशियल पैर भी निचले हिस्से में टूट चूका है. हालांकि, फिलहाल मरम्मत के लिहाज से उसे चिपका दिया गया है.

दिव्यांग तीरंदाज सुकर्मणी को 15 दिसंबर को पैरा नेशनल गेम्स में शामिल होने के लिए केरल के कोच्चि रवाना होना है. लेकिन, उससे पहले सुकर्मणी को स्टेट लेवल चैंपियनशिप से क्वालिफाई करना होगा. पीएम श्री कस्तूरबा बालिका विद्यालय की वार्डन मीनू बड़ाइक ने बताया कि दिव्यांग छात्रा सुकर्मणी टूटी के लिए नये आर्टिफिशियल पैर की व्यवस्था खूंटी जिला प्रशासन की ओर से की जा रही है. इसके लिए खूंटी डीसी खुद पहल कर रहे हैं.

पीएम श्री कस्तूरबा बालिका विद्यालय, खूंटी की रिसोर्स शिक्षक चैताली पाठक ने बताया कि दिव्यांग बच्चों के लिए स्कूल प्रबंधन और जिला प्रशासन की ओर से खास ख्याल रखा जाता है और उनकी जरूरत के तमाम सामानों को भी समय पर उपलब्ध कराया जाता है.

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ट्राइबल तीरंदाज सुकर्मणी टूटी के सामने फिलहाल दो समस्या है. पहली तो यह कि उसे जल्द से जल्द नया आर्टिफिशियल पैर मिल जाए, ताकि उसके कदमों सफर थोड़ा आसान हो जाए. जिसको लेकर खूंटी जिला प्रशासन की ओर से इसको लेकर पहल शुरू कर दी गयी है.

दूसरी समस्या यह है कि प्रैक्टिस के लिए उसके पास आर्चरी का कोई संसाधन नहीं है. उसे प्रैक्टिस के लिए अपने कोच आशीष कुमार और दानिश अंसारी पर निर्भर रहना पड़ता है. क्योंकि इन दोनों कोच के स्कूल आने पर ही सुकर्मणी को तीर धनुष यानि आर्चरी का संसाधन उपलब्ध हो पाता है.

सुकर्मणी ने बताया कि उसका सपना ओलंपियन दीपिका कुमारी जैसा तीरंदाज बनना है. जिसके लिए उसे संसाधन की जरूरत है. सुकर्मणी के माता पिता खूंटी के मरंगहदा पंचायत के जोरदाग गांव के रहने वाले हैं. जहां वह खेतीबाड़ी और दिहाड़ी मजदूरी करते हैं. सुकर्मणी के दो बड़े भाइयों में एक रोजगार के लिए मुंबई पलायन कर चुका है, जबकि दूसरा भाई खूंटी में ही एक फास्ट फूड की दुकान में काम करता है.

अब सुकर्मणी अपनी शारीरिक चुनौतियों के बीच एक तीरंदाज के रूप में अपने सुनहरे सपने को पूरा करना चाहती है. अब देखना यह है कि उसके इस सपने में सरकार का यह व्यवस्था किस तरह और कितने दूर तक साथ देती है.

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