बागेश्वर: उत्तराखंड की पहाड़ी जिंदगी, पलायन का दर्द और बुजुर्गो के अकेलेपन को पर्दे पर उतारने वाली फिल्म पायर इन दिनों दर्शकों के बीच चर्चा में बनी हुई है. फिल्म में आमा-बूबू के किरदार लोगों को भावुक कर रहे हैं. करीब 80 और 75 वर्ष के बुजुर्ग दंपती की भूमिका निभाने वाले दोनों कलाकारों ने अपने सहज और स्वाभाविक अभिनय से दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई है.
फिल्म की कहानी ऐसे बुजुर्ग दंपती के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनका बेटा रोजगार की तलाश में अपना गांव छोड़कर बाहर चला जाता है. समय बीतता जाता है, लेकिन बेटा घर वापस नहीं लौटता है. वहीं गांव में अकेले रह गए आमा-बूबू हर दिन अपने बेटे की राह देखते हैं. उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें न केवल अपनों की कमी खलती है, बल्कि पहाड़ों से हो रहे पलायन की पीड़ा भी झेलनी पड़ती है.
फिल्म में बूबू का किरदार पदम सिंह कापड़ी ने निभाया है, जबकि आमा की भूमिका हीरा देवी ने निभाई है. दोनों ही पेशेवर अभिनेता नहीं हैं. पदम सिंह कापड़ी भारतीय सेना में हवलदार रह चुके हैं और सेवानिवृत्ति के बाद खेतीबाड़ी करते थे. वहीं हीरा देवी गृहिणी हैं. वह खेतीबाड़ी के साथ पशुपालन भी करती हैं, और लोकगीतों में उनकी रुचि रही है. दोनों कलाकार पिथौरागढ़ जिले की बेरीनाग तहसील के रहने वाले हैं. दुख की बात यह है कि दोनों अपने-अपने असल जीवनसाथी को कुछ साल पहले खो चुके हैं.
किस गांव पर बनी है फिल्म पायर
फिल्म की शूटिंग पिथौरागढ़ जिले की बेरीनाग तहसील के पुराना थल गांव में हुई है. वहीं फिल्म की मूल कहानी का विचार निर्देशक विनोद कापड़ी को वर्ष 2017 में मुनस्यारी के पास ट्रेकिंग के दौरान मिला था. इस दौरान उनकी मुलाकात एक बुजुर्ग दंपती से हुई थी, जो गांव में लगभग अकेले रहते थे. उनके बच्चे रोजगार की तलाश में बाहर चले गए थे. बुजुर्ग दंपति का नाम तुलसी देवी और पदम सिंह था. बुजुर्ग दंपती की जिंदगी, उनका अकेलापन और एक-दूसरे के प्रति उनका लगाव निर्देशक के मन में बस गया. इसी वास्तविक अनुभव ने फिल्म की कहानी को जन्म दिया.
असल जिंदगी में पति-पत्नी नहीं हैं आमा-बूबू
फिल्म की सबसे दिलचस्प बात यह है कि पर्दे पर पति-पत्नी का किरदार निभाने वाले पदम सिंह और हीरा देवी असल जिंदगी में पति-पत्नी नहीं हैं. हीरा देवी विधवा हैं, जबकि पदम सिंह की पत्नी का निधन हो चुका है. शुरुआत में हीरा देवी किसी दूसरे पुरुष के साथ पत्नी का किरदार निभाने को लेकर सहज नहीं थीं. हालांकि, परिवार और फिल्म की टीम के समझाने के बाद वह इस भूमिका के लिए तैयार हुई. दोनों ने अभिनय की पारंपरिक दुनिया से बाहर रहते हुए अपने अनुभवों और स्वाभाविक भाव-भंगिमाओं से किरदारों को जीवंत बना दिया.
निर्देशक विनोद कापड़ी ने फिल्म में पेशेवर कलाकारों के बजाय पहाड़ के वास्तविक परिवेश में रहने वाले लोगों को मौका दिया. यही वजह है कि फिल्म में पहाड़ी जीवन, भाषा, रहन-सहन और बुजुर्गो की भावनाएं बेहद स्वाभाविक नजर आती हैं. फिल्म केवल एक बुजुर्ग दंपती की कहानी नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के गांवों से लगातार हो रहे पलायन और पीछे छूट रहे माता-पिता की पीड़ा को भी सामने लाती है.
फिल्म के जरिए यह सवाल भी उठता है कि बेहतर भविष्य की तलाश में गांव छोड़कर जाने वाली युवा पीढ़ी के पीछे अपने घरों में अकेले रह गए बुजुर्गो की सुध कौन लेगा. आमा-बूबू के किरदार इसी सामाजिक हकीकत को दर्शकों के सामने रखते हैं. इन दोनों कलाकारों का सहज अभिनय और फिल्म की भावुक कहानी लोगों को अपनी जिंदगी से जुड़ी हुई महसूस होती है.