10 साल में क्रमपाठी 15 साल में घनपाठी,जानिए कैसे तैयार होते हैं विद्वान
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Telangana News: तेलंगाना के कोत्तूरु ताडेपल्ली गांव में आज भी सदियों पुरानी गुरुकुल परंपरा जीवित है. यहां विद्यार्थी 10 से 25 साल तक कठिन साधना और अनुशासन के साथ वेदों का अध्ययन करते हैं. जानिए कैसे क्रमपाठी, घनपाठी और भाष्याचार्य जैसी विशेष उपाधियां हासिल करते हैं यहां के विद्यार्थी.
तेलंगाना. पड़ोस में स्थित एक छोटा सा शांत गांव है कोत्तूरु ताडेपल्ली, चारों तरफ हरियाली और शांत माहौल के बीच बसा यह गांव आज अपनी एक बेहद खास और ऐतिहासिक पहचान के लिए जाना जाता है. यहां स्थित श्री षण्मुख वेद विद्यालयम भारतीय ज्ञान परंपरा और वैदिक अध्ययन का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है. आधुनिक दौर की भागदौड़ से दूर इस गांव में प्राचीन गुरुकुल परंपरा पूरी निष्ठा के साथ आज भी जीवित है.
श्री षण्मुख वेद विद्यालयम से मिली जानकारी अनुसार, आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में जिस तरह उच्च शिक्षा और शोध पूरा करने पर शोधार्थियों को पीएचडी या डॉक्टर की उपाधि से सम्मानित किया जाता है ठीक उसी तरह इस गांव के गुरुकुल में भी वेदों के अध्ययन के स्तर के अनुसार विशिष्ट उपाधियां प्रदान की जाती हैं. यहां अध्ययनरत विद्यार्थियों को कई वर्षों तक कड़े अनुशासन, ब्रह्मचर्य और साधना के दौर से गुजरना पड़ता है.
वेदों का अध्ययन कई चरणों में बंटा हुआ
डॉ. कप्पगंतु रामकृष्ण अनुसार गुरुकुल में वेदों का अध्ययन कई चरणों में बंटा हुआ है, प्रारंभिक संहिता और क्रम पाठ के लगभग दस वर्षों के अध्ययन के बाद विद्यार्थी को क्रमपाठी या अवधानी की उपाधि प्राप्त होती है. इसके बाद का चरण बेहद कठिन और जटिल माना जाता है जिसे जटा और घन पाठ कहा जाता है. इस स्तर तक पहुंचने में 12 से 15 साल का समय लगता है, जो विद्यार्थी इस चरण को सफलता से पूरा कर लेते हैं उन्हें घनपाठी कहा जाता है. आगे के विशेष अध्ययन के बाद सलक्षण घनपाठी और वेदों के गूढ़ अर्थ व दर्शन का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने पर विद्वान भाष्याचार्य कहलाते हैं.
कोत्तूरु ताडेपल्ली में वेदों की शिक्षा सिर्फ किताबों के सहारे नहीं दी जाती, यहां वेदों को कंठस्थ कराने की पारंपरिक श्रुति पद्धति का पालन होता है. विद्यार्थी गुरु के मुख से सुनकर मंत्रों के सही उच्चारण, लय और स्वर भेद को पूरी तरह याद करते हैं. इस व्यवस्था से मंत्रों की शुद्धता सदियों तक सुरक्षित रहती है. गांव का शांत ग्रामीण परिवेश वैदिक अध्ययन के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करता है. यहां से पारंपरिक शिक्षा पूरी कर निकलने वाले विद्वान देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर प्राचीन ज्ञान का प्रचार-प्रसार करते हैं. अपनी इसी अनूठी पहचान के कारण कोत्तूरु ताडेपल्ली आज वैदिक विद्वानों को गढ़ने वाले एक प्रतिष्ठित ग्रामीण केंद्र के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ रहा है.