नई दिल्ली: एस्ट्रोनॉमर्स ने ब्रह्मांड के सबसे कम उम्र के ग्रह की खोज की पुष्टि कर दी है. इस नवजात ग्रह का नाम एलियास 2-24 बी रखा गया है. यह बेबी प्लैनेट दस लाख साल से भी कम पुराना है. यह अभी भी अपने तारे के चारों तरफ फैली धूल और गैस की विशालकाय डिस्क में तेजी से चक्कर काट रहा है. चिली की डिएगो पोर्टलेस यूनिवर्सिटी और हवाई स्थित केक ऑब्जर्वेटरी के पुराने डेटा एनालिसिस से इस रहस्यमयी ग्रह का सच सामने आया है. यह विशालकाय ग्रह हमारे बृहस्पति यानी जुपिटर के बराबर भारी है. यह पृथ्वी से करीब 450 प्रकाश वर्ष दूर मौजूद है. इस अनोखी खोज ने साबित कर दिया है कि ग्रह बनने के हमारे मौजूदा नियम अभी भी अधूरे हैं.
आखिर इस बेबी प्लैनेट ने पुराने रिकॉर्ड कैसे तोड़ दिए?
अंतरिक्ष में अब तक जितने भी सबसे युवा ग्रह मिले थे, उनकी उम्र कम से कम 50 लाख साल आंकी गई थी. इसमें पीडीएस 70 और विस्पिट 2 तारों के चक्कर काट रहे चार ग्रह शामिल थे. एलियास 2-24 बी की उम्र 10 लाख साल से भी कम पाई गई है.
धूल और गैस के घने बवंडर के बीच वैज्ञानिकों ने इसे कैसे ढूंढा?
किसी भी नए ग्रह को उसके शुरुआती दौर में देखना नामुमकिन सा काम माना जाता है. तारे जब पैदा होते हैं, तब उनके आसपास गैस, धूल और बर्फ की मोटी परत घूमती रहती है. ग्रह इसी मलबे के आपस में टकराने और जुड़ने से आकार लेते हैं. इस मलबे के घने घेरे की वजह से सामान्य टेलीस्कोप से भीतर देखना असंभव होता है. हवाई में स्थित डब्ल्यूएम केक ऑब्जर्वेटरी के कोरोनाग्राफ ने इस काम को मुमकिन बनाया.
कोरोनाग्राफ तारे की तेज चमक को ब्लॉक कर देता है. इससे उसके आसपास मौजूद बेहद धुंधले ऑब्जेक्ट्स को देखना आसान हो जाता है. लीड रिसर्चर एंड्रिया बर्नार्डी ने बताया कि ग्रह डिस्क के अंदर खाली जगह बनाते हुए आगे बढ़ते हैं. टीम ने बिल्कुल उसी गैप के अंदर इस नए ग्रह को खोज निकाला.
यह तस्वीर ‘एलियास 2-24 b’ (Elias 2-24 b) को दिखाती है, जो अब तक खोजा गया सबसे नया एक्सोप्लैनेट है. यह अपने युवा होस्ट स्टार के चारों ओर गैस और धूल की डिस्क के अंदर अभी भी बढ़ रहा है. डिस्क से पदार्थ जुपिटर के आकार वाले इस ग्रह पर जमा हो रहा है. यह ग्रह डिस्क में एक बड़े गैप में स्थित है, जो विशाल ग्रहों के बनने की मुख्य थ्योरी का समर्थन करता है. (Image Credit: W. M. Keck Observatory/Adam Makarenko)
एक दशक पुराना रहस्य केक ऑब्जर्वेटरी के डेटा से कैसे सुलझा?
- इस रहस्य की शुरुआत करीब दस साल पहले चिली के अल्मा टेलीस्कोप से हुई थी. अल्मा ने एलियास 2-24 तारे के चारों तरफ मौजूद डिस्क में एक अजीबोगरीब खाली गैप देखा था. इसके बाद वेरी लार्ज टेलीस्कोप ने उस गैप में रोशनी का एक बेहद हल्का सा बिंदु नोटिस किया. उस समय वैज्ञानिकों में इस बात पर बहस छिड़ गई कि क्या यह सच में कोई ग्रह हो सकता है.
- मौजूदा थ्योरी कहती है कि तारे से इतनी दूर और इतने कम समय में जुपिटर जैसा ग्रह बन ही नहीं सकता. हमारे सौरमंडल में जुपिटर को बनने में करीब 50 लाख साल लगे थे. यह नया ग्रह अपने तारे से पृथ्वी और सूर्य की दूरी के मुकाबले 55 गुना ज्यादा दूर मौजूद है.
- बर्नार्डी की टीम ने 2018 और 2020 के आर्काइव डेटा का बारीकी से मिलान किया. इसके मोशन की जांच के बाद आखिरकार मुहर लग गई कि यह कोई इमेजिंग डिफेक्ट नहीं, बल्कि एक असली ग्रह है.
ब्रह्मांड का यह टाइम मशीन हमारे सौरमंडल के कौन से राज खोलेगा?
यह खोज वैज्ञानिकों के लिए किसी टाइम मशीन से कम नहीं है. आज हम जिस सौरमंडल में रहते हैं, वह अरबों साल पहले कैसा दिखता होगा, यह सिस्टम उसका जीता जागता सबूत है. अब तक खोजे गए 6,000 से ज्यादा एक्सोप्लैनेट्स में से ज्यादातर अरबों साल पुराने हैं. वे अपने तारों के बहुत करीब चक्कर काट रहे हैं.
ऐसा इसलिए है क्योंकि ट्रांजिट तकनीक से केवल नजदीकी और पुराने ग्रहों को आसानी से डिटेक्ट किया जा सकता है. नवजात ग्रहों के मामले में इंसान आज भी लगभग अंधा ही है. इस तरह के नए ग्रहों की स्टडी से यह समझने में भारी मदद मिलेगी कि हमारी धरती और बाकी ग्रह आखिर कैसे गैस के गुबार से ठोस दुनिया में तब्दील हुए थे.
नासा का नया रोमन स्पेस टेलीस्कोप इस खोज को कहां ले जाएगा?
एस्ट्रोनॉमर्स मानते हैं कि यह खोज स्पेस एक्सप्लोरेशन के एक नए युग की शुरुआत है. हाल ही में लॉन्च हुआ नासा का नैन्सी ग्रेस रोमन स्पेस टेलीस्कोप इस दिशा में गेमचेंजर साबित होने वाला है. रोमन टेलीस्कोप बेहद आधुनिक कोरोनाग्राफ से लैस है. यह उन छिपे हुए ग्रहों को भी आसानी से ढूंढ निकालेगा, जो आज के टेलिस्कोप्स की नजर से बच जाते हैं.
एलियास 2-24 बी मौजूदा टेलिस्कोप्स की आखिरी सीमा पर था. रोमन की मदद से तारे के बिल्कुल करीब मौजूद जुपिटर जैसे ग्रहों को भी सीधे देखा जा सकेगा. वैज्ञानिक अब असल समय में ग्रहों के जन्म की पूरी प्रक्रिया को अपनी आंखों से देखने के बेहद करीब पहुंच चुके हैं.