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उज्जैन के भाटपचलाना गांव में चने का विशाल पेड़ लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. ग्रामीण इसे 600 साल पुराना बताते हैं. मान्यता है कि इसके चने खाने से निःसंतान दंपतियों की मनोकामना पूरी होती है.
उज्जैन. खेती में चने की फसल छोटे-छोटे पौधों पर लहलहाती दिखाई देती है, लेकिन उज्जैन जिले के एक गांव में चने का ऐसा पेड़ मौजूद है, जिसे देखकर लोग हैरान रह जाते हैं. इसकी खासियत सिर्फ इसकी बनावट नहीं, बल्कि इससे जुड़ी सदियों पुरानी मान्यताएं भी हैं. बड़नगर तहसील के भाटपचलाना गांव में मौजूद इस पेड़ को स्थानीय लोग करीब 600 साल पुराना बताते हैं. ग्रामीणों के मुताबिक, यहां लगने वाले चने सामान्य चने से आकार में बड़े और रंग में काले होते हैं. पेड़ को देखने और इससे जुड़ी मान्यताओं के बारे में जानने के लिए दूर-दराज से लोग पहुंचते हैं.
आमतौर पर चने की फसल खेतों में छोटे पौधों के रूप में उगती है. कुछ महीनों में पौधों पर फलियां आती हैं और फसल पकने के बाद पौधे सूख जाते हैं. वहीं, भाटपचलाना का यह पेड़ अपनी अलग बनावट के कारण लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है. उज्जैन से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में पेड़ के पास एक छोटा चबूतरा भी बना है. ग्रामीणों के लिए यह स्थान प्राकृतिक कौतूहल के साथ आस्था का केंद्र भी है.
आठ से दस पीढ़ियों से देख रहे ग्रामीण
स्थानीय निवासी शाहरुख बताते हैं कि उनके परिवार की करीब आठ से दस पीढ़ियां इस पेड़ को देखती आ रही हैं. हालांकि, उनके परिवार को भी यह जानकारी नहीं है कि इसे किसने और कब लगाया था. गांव में प्रचलित मान्यता के अनुसार, यह पेड़ लगभग 600 साल पुराना है, लेकिन इसकी उम्र की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है. शाहरुख के मुताबिक, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान सहित दूसरे राज्यों से भी लोग यहां पहुंचते हैं. मान्यता है कि संतान की कामना रखने वाले लोग यहां आकर चने खाते हैं. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इससे उनकी मनोकामना पूरी हो सकती है.
दिसंबर में फलियों का इंतजार
गांव के ही निवासी असलम बताते हैं कि उनका बचपन इसी पेड़ के आसपास बीता है. उन्होंने इसे कभी पूरी तरह सूखा हुआ नहीं देखा. उनके अनुसार, पेड़ पर अब फूल आने लगे हैं और दिसंबर तक इनमें चने बनने लगेंगे. असलम का दावा है कि यहां लगने वाले चने सामान्य डॉलर चने से भी बड़े दिखाई देते हैं. इनका रंग काला होता है और स्वाद भी लोगों को पसंद आता है.
प्रकृति और लोकमान्यता का अनोखा संगम
भाटपचलाना का यह पेड़ गांव की अलग पहचान बन चुका है. एक ओर ग्रामीण पीढ़ियों से इसकी मौजूदगी की बात बताते हैं, तो दूसरी ओर इससे जुड़ी संतान प्राप्ति की मान्यता लोगों को यहां खींच लाती है. हालांकि, पेड़ की वास्तविक उम्र, इसकी वनस्पति संबंधी पहचान और चने जैसी फलियां आने के कारणों की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है. फिलहाल, यह पेड़ स्थानीय लोगों की आस्था और जिज्ञासा का अनोखा केंद्र बना हुआ है.