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Bihar News: बिहार में विकास के दावे किए जाते रहे हैं. लेकिन दरभंगा में सरकारी स्कूल की हालत बद से बदत्तर है. 1952 में बनाया गया स्कूल अब जर्जर हालत में है. सिर्फ दो कमरों में बच्चों को पढ़ना पड़ता है. कभी स्कूल के बाहर पेड़ के नीचे क्लास लगती है. कई बार प्रशासन को पत्र लिखे जा चुके हैं. लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई.
पेड़ के नीचे पढ़ते हैं बच्चे.
दरभंगाः ‘तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है. मगर ये आंकड़ा झूठा है, ये दावा खिताबी है.’ अदम गोंडवी की यह लाइनें दरभंगा के स्कूल पर सटीक बैठती हैं. दरअसल, दरभंगा में सरकारी स्कूल के बदहाली की तस्वीर सामने आई. सदर प्रखंड के भालपट्टी गांव में प्राथमिक विद्यालय भालपट्टी (कन्या) में बच्चों की पढ़ाई महज दो कमरों के सहारे चल रही है. साल 1952 में स्थापित इस विद्यालय का भवन जर्जर है. कमरों की कमी के कारण कई बार बच्चों को स्कूल परिसर के बाहर पेड़ के नीचे बैठाकर पढ़ाना पड़ता है. आसपास झाड़ियां और जंगल जैसी स्थिति है. ऐसे में बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी हुई है.
दो कमरों में चल रहा पूरा स्कूल
प्राथमिक विद्यालय भालपट्टी (कन्या) की स्थापना साल 1952 में हुई थी. इतने पुराने विद्यालय में आज भी पर्याप्त कमरे नहीं हैं. स्कूल के पास महज 13 धुर जमीन है, जिस पर दो कमरे बने हुए हैं. बच्चों की संख्या बढ़ने पर सभी को कमरों में बैठाना संभव नहीं हो पाता. ऐसे में शिक्षकों को पेड़ के नीचे कक्षाएं चलानी पड़ती हैं. विद्यालय भवन की हालत भी ठीक नहीं है. बच्चों को जर्जर कमरों में पढ़ना पड़ता है. वहीं, स्कूल परिसर के आसपास झाड़ियां और जंगलनुमा स्थिति बनी हुई है. स्थानीय स्तर पर सांप और दूसरे जंगली जीवों का खतरा भी बताया जा रहा है. स्कूल के पास बंदरों का झुंड भी घूमता दिखाई देता है.
कई बार विभाग को लिखा पत्र, फिर भी नहीं बनी बात
विद्यालय के प्रधान शिक्षक बसंत कुमार कामती और अन्य शिक्षकों का कहना है कि अतिरिक्त कमरों और भवन निर्माण के लिए कई बार शिक्षा विभाग को पत्र लिखा गया. इसके बावजूद अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई. शिक्षकों के मुताबिक, जमीन की कमी का हवाला देकर निर्माण की मांग आगे नहीं बढ़ पा रही है. स्कूल में मध्याह्न भोजन बनाने की व्यवस्था भी ठीक नहीं है. रसोई के लिए पर्याप्त जगह नहीं होने के कारण पन्नी टांगकर किसी तरह खाना बनाया जाता है. ऐसे में भोजन तैयार करने की व्यवस्था और उसकी गुणवत्ता को लेकर भी चिंता जताई जा रही है.
कब बदलेगी 74 साल पुराने स्कूल की तस्वीर?
इस विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चे बेहतर माहौल और सुरक्षित कक्षाओं के हकदार हैं. लेकिन कमरों की कमी और जर्जर भवन के कारण उन्हें रोजाना मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. शिक्षकों ने कई बार अपनी समस्या विभाग तक पहुंचाई है, लेकिन समाधान का इंतजार अब भी है. सवाल यह है कि साल 1952 में स्थापित इस विद्यालय को पर्याप्त कमरे और सुरक्षित भवन कब मिलेगा? आखिर कब बच्चों को पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ने की मजबूरी से मुक्ति मिलेगी?