OPINION: रोहिणी आचार्य के आइडिया में कितना इंट्रेस्ट लेंगे प्रशांत किशोर, आरजेडी-जनसुराज में गठबंधन हुआ तो बिहार में क्या होगा असर?

OPINION: रोहिणी आचार्य के आइडिया में कितना इंट्रेस्ट लेंगे प्रशांत किशोर, आरजेडी-जनसुराज में गठबंधन हुआ तो बिहार में क्या होगा असर?


बिहार विधान परिषद (MLC) चुनाव में एनडीए को नुकसान हुआ है. शिक्षक और स्नातक की 2 सीटें राजद के खाते में चली गईं तो प्रशांत किशोर की नेतृत्ववाली जन सुराज पार्टी ने विधानसभा के बाद विधान परिषद में भी खाता खोल लिया. 4-4 सीटों पर लड़कर भाजपा 2 जीती तो जेडीयू को सिर्फ एक सीट से ही संतोष करना पड़ा. 2 निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी बाजी मार ली. राष्ट्रीय दलों में कांग्रेस की सर्वाधिक दुर्गति हुई. 6 सीटों पर लड़कर भी उसे किसी सीट पर कामयाबी नहीं मिली.

कुल 8 सीटों के चुनाव में एनडीए के सिर्फ 3 उम्मीदवारों का जीत पाना इसलिए आश्चर्य पैदा करता है कि पिछले साल ही हुए विधानसभा चुनाव में एनडीए के घटक दलों ने 243 में 202 सीट जीतकर विपक्षी महागठबंधन को धूल चटा दी थी. पहले भाजपा के गढ़ बांकीपुर में उसके उम्मीदवार की हार और विधान परिषद चुनाव में 5 सीटों पर एनडीए की पराजय को सामान्य परिघटना मान लेना भूल होगी. एनडीए की पार्टियां यकीनन इस पर मंथन करेंगी. मंथन के निष्कर्ष के अनुरूप रणनीति भी बनानी होगी.

पढ़े-लिखे लोगों की नाराजगी

चूंकि विधान परिषद चुनाव में शिक्षक और स्नातक स्तर के वोटरों ने ही हिस्सा लिया, इसलिए अनुकूल नतीजे न आने को उनकी नाराजगी से जोड़ना असंगत नहीं होगा. हालांकि विधान परिषद चुनाव से सरकारों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता, लेकिन चिंता इस बात की होनी चाहिए कि इसके वोटर शिक्षत समाज के लोग होते हैं. समाज में उनका रसूख भी होता है. बिहार में भले हर चुनाव जाति के दायरे में ही होते हैं, लेकिन यह भी सच है कि पढ़ी-लिखी जमात अमूमन जातीय भावनाओं से परे सोचती है.

पिछले 6-8 महीनों से बिहार ही नहीं, बल्कि देश भर में सवर्णों का सरकार के प्रति गुस्सा चरम पर है. SC-ST कानून और UGC नियम को लेकर सवर्ण समाज समय-समय पर अपने गु्स्से का इजहार करता रहा है. इस तबके की नाराजगी को भुनाने के लिए विपक्षी पार्टियां कोई कसर नहीं छोड़ रहीं. इसलिए यह स्वीकार करने में किसी को हिचक नहीं होनी चाहिए कि विधान परिषद चुनाव में नडीए उम्मीदवारों की हार में यह भी एक बड़ा फैक्टर हो. ठीक वैसे ही, जैसे भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर के बाद ब्राह्मणों के गुस्से ने बांकीपुर में भाजपा को इसका एहसास करा दिया था.

रोहिणी आचार्य का आइडिया

विधान परिषद चुनाव के नतीजों से उत्साहित विपक्ष ने नई रणनीति पर काम भी शुरू कर दिया है. राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की बेटी और छपरा से लोकसभा का चुनाव लड़ चुकीं रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया पर एक आइडिया फ्लोट किया है. उनका यह आइडिया भले निजी स्तर का है, लेकिन इस पर सच में काम हुआ तो इसके दूरगामी रिजल्ट से इनकार नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा है कि प्रशांत किशोर और तेजस्वी यादव को साथ आ जाना चाहिए. इससे विपक्षी वोटों का बिखराव रुकेगा और भाजपा को हराना मुश्किल नहीं होगा. हालांकि प्रशांत किशोर इसके लिए तैयार होंगे, कहना मुश्किल है. इसलिए कि वे पहले से ही लालू के जंगल राज और तेजस्वी की शिक्षा को लेकर सवाल खड़े करते रहे हैं. रोहिणी के इस आइडिया का एक संकेत यह भी है कि राजद अब महागठबंधन के साथियों के भरोसे कामयाबी की उम्मीद छोड़ चुका है. उसे सत्ता सुख भोगना है तो उसे अपने में बदलाव लाने की जरूरत है.

तेजस्वी में मैच्योरिटी नहीं है

तेजस्वी का राजनीतिक जीवन महज 12 साल का है, लेकिन जिस सियासी माहौल में उनकी परवरिश हुई है और लालू जैसे उन्हें गुरु मिले हैं, उस हिसाब से उनमें मैच्योरिटी नहीं दिखती. नीरज कुमार से तनातनी के बीच जेडीयू ने जब अनंत सिंह और उनकी पत्नी का पार्टी से बाहर निकाल दिया तो उनके स्वागत के लिए राजद का दरवाजा खोलने के बजाय तेजस्वी ने तंज कसे. उन्हें गद्दारी का सनद तक दे दिया. कांग्रेस ने उनके लिए दरवाजा खोलने की बात जरूर कही.

अनंत सिंह ने भी कहा है कि वे राजद के साथ जाएंगे. पर, तेजस्वी ने उनके जले पर नमक छिड़कना ज्यादा जरूरी समझा. इस मामले में तो रोहिणी का आइडिया तेजस्वी से कहीं अधिक मैच्योर दिखता है. अनंत सिंह ने जिस तरह खुलकर जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार की मदद की और उन्हें 10 हजार वोट तक दिलाए, वैसे में वे रोहिणी के आइडिया को अमली जामा पहनाने में मददगार बन सकते हैं. वे प्रशांत किशोर और तेजस्वी यादव के बीच संवाद की कड़ी तो बन ही सकते हैं.

PK मानेंगे रोहिणी का प्रस्ताव?

राजनीति में कोई किसी का स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता. तमिलनाडु में सियासी स्वार्थ के लिए कांग्रेस ने झटके में एमके स्टालिन का साथ छोड़ दिया था. बिहार में ही नीतीश ने सियासी लाभ के लिए 2 बार भाजपा का साथ छोड़ा और राजद से रिश्ता जोड़ा. इसलिए प्रशांत किशोर के बारे में भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि राजनीतिक लाभ के लिए वे राजद से सटने का प्रस्ताव ठुकरा देंगे.

यह काल और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा. जिस तरह राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष एकजुट हो रहा है, उसमें आकर्षक प्रस्ताव या अवसर मिलने की बात हो तो प्रशांत किशोर भी शायद मना करें. तमिलनाडु में टीवीके के उदय के बाद कांग्रेस जैसे दल ने अगर अगर अपने भरोसेमंद साथी की परवाह नहीं की तो प्रशांत किशोर के बारे में दावे के साथ कोई कैसे कह सकता है कि उनका मन नहीं बदलेगा.



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